बॉम्बे के शेर फिरोजशाह मेहता: जिन्होंने रखी आधुनिक मुंबई और बीएमसी की नींव

फिरोजशाह मेहता ने बीएमसी की नींव से लेकर सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की स्थापना तक मुंबई के विकास में ऐतिहासिक योगदान दिया।

Update: 2026-08-04 14:37 GMT

तस्वीर में बाईं ओर फिरोजशाह मेहता का चित्र और दाईं ओर बृहन्मुंबई महानगरपालिका मुख्यालय के सामने उनकी प्रतिमा दिखाई दे रही है।

आज भारत की आर्थिक राजधानी मुंबई अपनी गगनचुंबी इमारतों, आधुनिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और देश की सबसे अमीर बीएमसी के लिए पहचानी जाती है, लेकिन इस आधुनिक शहर की मजबूत नींव रखने वाले महान स्वतंत्रता सेनानी, दूरदर्शी नेता और कानूनविद फिरोजशाह मेहता थे। 19वीं सदी में मुंबई के विकास का खाका तैयार करने वाले फिरोजशाह मेहता को उनकी निडरता, कुशाग्र बुद्धि और निस्वार्थ नेतृत्व के कारण 'बॉम्बे का बेताज बादशाह' और 'बॉम्बे का शेर' कहा जाता था।

उनके तर्कों और दृढ़ नेतृत्व के सामने ब्रिटिश शासन के बड़े-बड़े अधिकारी भी चुनौती महसूस करते थे। 4 अगस्त 1845 को मुंबई के एक प्रतिष्ठित पारसी परिवार में जन्मे फिरोजशाह मेहता शिक्षा के क्षेत्र में भी अग्रणी रहे। उन्होंने मुंबई के एल्फिंस्टन कॉलेज से अपनी शिक्षा पूरी की और पारसी समुदाय में एम.ए. की डिग्री हासिल करने वाले पहले भारतीय बने।

इसके बाद उन्होंने लंदन के प्रसिद्ध 'लिंकोल्न्स इन' से वकालत की पढ़ाई पूरी की और वर्ष 1868 में भारत लौटे। इंग्लैंड प्रवास के दौरान वे दादाभाई नौरोजी के विचारों से प्रभावित हुए और भारत की स्वतंत्रता तथा जनसेवा के लिए समर्पित हो गए।

मुंबई के सार्वजनिक प्रशासन को व्यवस्थित करने में फिरोजशाह मेहता की भूमिका ऐतिहासिक रही। 1870 के दशक में जब मुंबई का नागरिक प्रशासन अव्यवस्थित था, तब उन्होंने ब्रिटिश कमिश्नरों की मनमानी और तानाशाही के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी। उनकी इस ऐतिहासिक कानूनी लड़ाई के परिणामस्वरूप '1872 का बॉम्बे म्युनिसिपल अधिनियम' अस्तित्व में आया, जिसने जनप्रतिनिधियों और पार्षदों को प्रशासन में महत्वपूर्ण भूमिका दी।

इसी अधिनियम ने आधुनिक बीएमसी की नींव रखी, जिसके कारण उन्हें 'बॉम्बे नगर निगम का पिता' भी कहा जाता है। वे वर्ष 1884, 1885, 1905 और 1911 में चार बार मुंबई के मेयर चुने गए। उस समय मुंबई को मलेरिया और हैजा जैसी महामारियों से बचाने के लिए उन्होंने ड्रेनेज सिस्टम को मजबूत कराया। साथ ही तानसा और विहार झीलों से शहर में जलापूर्ति की योजना तैयार कर जल संकट के स्थायी समाधान की दिशा में कार्य किया।

अंग्रेजों पर आर्थिक निर्भरता कम करने और भारतीय व्यवसायों को बढ़ावा देने के उद्देश्य से फिरोजशाह मेहता ने सर सोराबजी पोचखानवाला के साथ मिलकर 50 लाख रुपये की शुरुआती पूंजी से 21 दिसंबर 1911 को भारत के पहले पूरी तरह स्वदेशी बैंक 'सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया' की स्थापना की। वे इस बैंक के पहले अध्यक्ष भी बने।

इसके अलावा बॉम्बे यूनिवर्सिटी के उप-कुलपति के रूप में उन्होंने उच्च शिक्षा के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण सुधार किए। राष्ट्र निर्माण और मुंबई शहर के विकास में फिरोजशाह मेहता का योगदान भारतीय इतिहास में हमेशा याद किया जाएगा। आधुनिक मुंबई की प्रशासनिक और सामाजिक संरचना तैयार करने में उनकी भूमिका आज भी एक महत्वपूर्ण अध्याय मानी जाती है।

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