अमिनगांव में एनएफआर के महाप्रबंधक चेतन कुमार श्रीवास्तव ने पारंपरिक खेल केंद्र का उद्घाटन किया।

मालीगांव। पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे (एनएफआर) ने रेल विरासत के संरक्षण और पारंपरिक खेलों के पुनर्जीवन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल की है। एनएफआर के महाप्रबंधक चेतन कुमार श्रीवास्तव ने 27 अक्टूबर, 2026 को पुराने अमिनगाँव रेलवे स्टेशन के विरासत स्थल पर पारंपरिक खेल केंद्र का उद्घाटन किया। एनएफ रेलवे स्पोर्ट्स एसोसिएशन (एनएफआरएसए) के सौजन्य से विकसित यह अपनी तरह की पहली सुविधा है, जिसके माध्यम से ऐतिहासिक रेलवे प्लेटफॉर्म को पारंपरिक खेलों के लिए समर्पित केंद्र में बदला गया है। यह पहल माननीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के 'विकास' और 'विरासत' को साथ लेकर चलने के विजन को दर्शाती है।

इस केंद्र में असम और पूर्वोत्तर के पारंपरिक खेलों को बढ़ावा दिया जाएगा। इनमें धोपखेल, तांग-गुटी, पेंग खेल, कोरी-खेल, रोशी-ताना, मणिपुर के मुकना और युबी लाकपी तथा मिजोरम का इनसुकनावम शामिल हैं। क्षेत्र के विभिन्न समुदायों से जुड़े ये खेल शारीरिक फुर्ती, आपसी जुड़ाव और जीवन-रक्षा कौशल का प्रतीक हैं। हालांकि, आधुनिकीकरण, डिजिटलीकरण और मुख्यधारा के व्यावसायिक खेलों के बढ़ते दबदबे के कारण इन पारंपरिक खेलों में भाग लेने वालों की संख्या लगातार कम होती जा रही है।

एनएफआरएसए की योजना इस केंद्र में नियमित रूप से पारंपरिक खेल गतिविधियां आयोजित करने और इन खेलों के संरक्षण के लिए काम कर रहे संगठनों के साथ समन्वय स्थापित करने की है। इसका उद्देश्य पारंपरिक खेलों के पुनरुद्धार के लिए समर्पित स्थान उपलब्ध कराना तथा राज्य और राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं एवं आयोजनों के आयोजन को संभव बनाना है।

उद्घाटन के अवसर पर महाप्रबंधक चेतन कुमार श्रीवास्तव ने बच्चों और खिलाड़ियों द्वारा स्टेशन के सक्रिय उपयोग के माध्यम से ऐतिहासिक स्थल को संरक्षित करने की एनएफआरएसए की पहल की सराहना की। उन्होंने विश्वास जताया कि यह केंद्र भावी पीढ़ियों के लिए इस स्थान को संरक्षित रखने, पारंपरिक खेलों को पुनर्जीवित करने और राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को तैयार करने में मदद करेगा।

वर्ष 1908 में स्थापित पुराना अमिनगाँव रेलवे स्टेशन स्वतंत्रता-पूर्व भारत में गुवाहाटी और पूर्वोत्तर के लिए एक प्रमुख प्रवेश द्वार था। लगभग आधा किलोमीटर लंबा और 25 मीटर चौड़ा इसका एकमात्र प्लेटफॉर्म उस समय असम-बंगाल रेलवे के प्रमुख आर्थिक और माल-परिवहन केंद्र के रूप में कार्य करता था। ऐतिहासिक असम मेल के माध्यम से चाय बागान मालिक, मिशनरी, व्यापारी, स्वतंत्रता सेनानी और अन्य यात्री यहां पहुंचते थे। इसके बाद वे फेरी से ब्रह्मपुत्र नद को पार करते थे।

इस स्टेशन का स्वतंत्रता आंदोलन से भी गहरा संबंध रहा है। महात्मा गांधी, जिन्हें प्यार से 'बापू' कहा जाता है, वर्ष 1921, 1926, 1934 और 1946 में असम यात्रा के दौरान यहां से गुजरे थे। वर्ष 1921 में असहयोग आंदोलन के दौरान अपनी यात्रा में उनके साथ देशभक्त तरुण राम फूकन भी थे। उन्होंने गांधीजी के भाषणों का अनुवाद किया था, जिससे हजारों लोग प्रेरित हुए। द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान ब्रिटिश और अमेरिकी सैनिकों ने भी इसी स्टेशन से होकर यात्रा की थी।

ईस्टर्न बंगाल रेलवे की अमिनगाँव-पांडु ट्रेन फेरी उत्तरी और दक्षिणी किनारों को जोड़ती थी। इस व्यवस्था में विशेष बार्जेस का इस्तेमाल किया जाता था, जिन पर पूरी की पूरी ट्रेनें और माल लादा जाता था। इस फेरी व्यवस्था के जरिए प्रतिदिन दोनों दिशाओं में 250 वैगनों तक का आवागमन होता था। यह रेल नेटवर्क कौनिया-धरला रूट से होते हुए तत्कालीन पूर्वी बंगाल के लालमोनिरहाट तक फैला हुआ था।

7 जून 1963 को इस स्टेशन पर आखिरी ट्रेन पहुंची। इसके अगले दिन, 8 जून 1963 से सरायघाट पुल पर रेल यातायात शुरू हो गया। इसके साथ ही फेरी के माध्यम से रेल परिवहन के उस ऐतिहासिक दौर का अंत हो गया।

ऐतिहासिक महत्व वाले इस रेलवे स्थल पर पारंपरिक खेल केंद्र की स्थापना के जरिए पूर्वोत्तर सीमांत रेलवे क्षेत्र की रेल विरासत और स्थानीय खेल परंपराओं, दोनों के संरक्षण की दिशा में काम कर रहा है। यह केंद्र पारंपरिक खेलों को नई पीढ़ी तक पहुंचाने, उनकी भागीदारी बढ़ाने और राज्य तथा राष्ट्रीय स्तर की प्रतियोगिताओं के लिए मंच उपलब्ध कराने के उद्देश्य से विकसित किया गया है।

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