तस्वीर में राजुरा तहसीलदार और पुलिस अधिकारी मानिकगड सीमेंट खदान के लोहे के गेट के पास खड़े हैं।

मानिकगड सीमेंट अल्ट्राटेक की कथित मनमानी से परेशान क्षेत्र के 8 से 10 गांवों के नागरिकों को छह साल के संघर्ष के बाद राहत मिली। राजुरा तहसीलदार ओमप्रकाश गोंड, पुलिस निरीक्षक शिवाजी कदम, मंडल अधिकारी कोंसनकर और पुलिस बल की मौजूदगी में मौके पर पंचनामा कर मानिकगड माइन्स के गेट क्रमांक 1, 2 और 3 खोल दिए गए। प्रशासन ने स्पष्ट चेतावनी दी कि अब इन गेटों पर ताले लगाकर रास्ता बंद नहीं किया जा सकेगा।

इस मामले को लेकर आबिद अली ने वर्ष 2019 में राजुरा के तहसीलदार के समक्ष शिकायत प्रस्तुत की थी। मामले की गहन जांच और पंचनामा करने के बाद तत्कालीन तहसीलदार ने 7 जुलाई 2020 को निर्णय लेते हुए आदेश पारित किया था। इसके खिलाफ मानिकगड सीमेंट कंपनी ने राजुरा के उपविभागीय अधिकारी के समक्ष अपील की। वर्ष 2022 में अपील पर आदेश पारित करते हुए तहसीलदार राजुरा के आदेश को कायम रखा गया।

इसके बाद कंपनी ने अपर जिलाधिकारी श्रीकांत देशपांडे के समक्ष अपील की। चार वर्ष तक स्थगन आदेश के कारण मामला लंबित रहा। बाद में अपर जिलाधिकारी ने आदेश पारित कर उपविभागीय अधिकारी राजुरा को मौके पर जांच और निरीक्षण करने के बाद नए सिरे से आदेश पारित करने का निर्णय दिया।

इसके आधार पर उपविभागीय अधिकारी श्री बालाजी कदम ने 23 जून 2026 को नया आदेश पारित किया। इसमें तत्कालीन तहसीलदार होली के 7 जुलाई 2020 के आदेश को कायम रखते हुए सार्वजनिक सड़क पर कंपनी द्वारा किए गए अनधिकृत अतिक्रमण और लोहे के गेट को हटाने का आदेश दिया गया।

60 दिनों की अपील अवधि समाप्त होने के बाद आदिवासियों ने 2 तारीख को धरना आंदोलन शुरू किया। नागरिकों की मांग के अनुसार तहसीलदार राजुरा श्री ओमप्रकाश गोंड, पुलिस निरीक्षक शिवाजी कदम, मंडल अधिकारी कोंसनकर सहित पंच और पुलिस बल मौके पर पहुंचे। मौके पर पंचनामा करने के बाद गेट क्रमांक 1, 2 और 3 खोल दिए गए।

प्रशासन ने कंपनी को आगे ताले या गेट लगाकर रास्ता बंद नहीं करने की चेतावनी दी। इस दौरान कंपनी के राय, नवीन कौशिक और अवधूत सक्सेना ने विवाद करने का प्रयास किया। उनके द्वारा यह कहे जाने पर कि यह रास्ता कंपनी का है, तहसीलदार गोंड ने राजस्व कानून के तहत कार्रवाई का रुख स्पष्ट किया, जिसके बाद सभी गेट खोल दिए गए।

इस कार्रवाई के बाद पिछले छह वर्षों से चल रहे संघर्ष को विराम मिला। नागरिकों में अपनी परेशानी से मुक्ति मिलने की भावना दिखाई दी। आंदोलनकारियों ने कहा कि कंपनी के परप्रांतीय कर्मचारियों की मनमानी पर रोक लगी है। साथ ही उन्होंने कहा कि गेट उखाड़कर फेंक दिए जाएं, तभी वे दोबारा बंद नहीं होंगे।

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