लातूर विकास पर शिवसेना उबाठा का सरकार पर हमला, अंबादास दानवे ने दागे तीखे सवाल
लातूर में शिवसेना उबाठा ने सरकार के खिलाफ जोरदार आंदोलन किया। अंबादास दानवे ने पानी, सूखा, किसान सहायता, रोजगार, एमआईडीसी और विकास कार्यों को लेकर सरकार पर गंभीर सवाल उठाए।
तस्वीर में शिवसेना नेता अंबादास दानवे लातूर में पत्रकारों से बात करते हुए और उनके आसपास कई माइक तथा समर्थक नजर आ रहे हैं।
लातूर में शिवसेना उद्धव बाळासाहेब ठाकरे पक्ष ने सरकार के खिलाफ ‘लातूरचा विकास तुमसे ना हो पायेगा!’ नारे के साथ बुधवार को महात्मा गांधी चौक में जोरदार आंदोलन किया। मराठवाड़ा के विकास को लेकर सरकार की घोषणाओं और उनके धीमे क्रियान्वयन पर सवाल उठाते हुए शिवसैनिकों ने जमकर नारेबाजी की और सरकार के प्रति आक्रोश जताया।
आंदोलन को संबोधित करते हुए शिवसेना नेता तथा विधान परिषद में विपक्ष के नेता आमदार अंबादास दानवे ने सरकार पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा, “मराठवाड़्यासाठी दोन मंत्रिमंडळ बैठकींत तब्बल ७८० घोषणा करण्यात आल्या. लातूर जिल्ह्यासाठी ३९ घोषणा झाल्या; मात्र प्रत्यक्षात केवळ दीड टक्का कामे प्रगतीपथावर आहेत. त्यामुळे लातूरकरांच्या हातात नेमके काय आले?” उन्होंने सवाल उठाया कि इतनी घोषणाओं के बावजूद लातूर के हिस्से में आखिर क्या आया।
लातूर के पानी के मुद्दे पर अंबादास दानवे ने उजनी और कृष्णा घाटी से पानी लाने की घोषणाओं पर सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा, “लातूरचा समावेश गोदावरी खोऱ्यात होतो. कृष्णा खोऱ्यातील पाणी लातूरला आणण्याच्या घोषणा करून लातूरकरांची दिशाभूल केली जात आहे. एका खोऱ्यातील पाणी दुसऱ्या खोऱ्यात वळविण्याच्या विषयावर वस्तुस्थिती जनतेसमोर स्पष्ट करणे आवश्यक आहे।”
उन्होंने कहा कि उजनी का पानी लातूर लाने की घोषणाएं कई बार की गईं, लेकिन आज तक लातूर को पानी की एक बूंद भी मिली या नहीं, इसका जवाब सरकार को देना चाहिए। धाराशिव में उजनी का पानी पहुंचने का दावा किए जाने पर भी उन्होंने कहा कि वहां भी पानी की एक बूंद नहीं पहुंची है। ऐसे में लातूर में पानी कब आएगा, यह सवाल उन्होंने सरकार के सामने रखा।
लातूर समेत पूरे मराठवाड़ा में बारिश के रुक जाने से खेती के सामने गंभीर संकट खड़ा हो गया है। सोयाबीन, तूर समेत खरीफ फसलें बारिश के अभाव में सूख रही हैं। आंदोलन के दौरान सरकार से तत्काल सूखा घोषित कर किसानों को आर्थिक सहायता देने की मांग की गई।
शिवसेना नेताओं ने कहा, “मागील वर्षी अतिवृष्टीने सोयाबीनचे नुकसान झाले आणि यावर्षी पावसाअभावी सोयाबीन हातातून जाण्याची वेळ आली आहे. शेतकरी संकटात असताना सरकार केवळ बघ्याची भूमिका घेत आहे. घोषणा नकोत, शेतकऱ्यांच्या खात्यावर प्रत्यक्ष मदत जमा करा।” उन्होंने कहा कि किसानों को घोषणाओं के बजाय सीधे उनके खातों में सहायता चाहिए।
शिवसेना ने चेतावनी दी कि जब तक लातूर जिले में सूखा घोषित कर किसानों को सहायता नहीं दी जाती, तब तक आंदोलन की धार कम नहीं की जाएगी।
लातूर की रेल कोच फैक्टरी के मुद्दे पर भी अंबादास दानवे ने सरकार को घेरा। उन्होंने कहा कि कारखाने में हजारों रोजगार उपलब्ध कराने के आश्वासन दिए गए थे, लेकिन स्थानीय युवाओं को अपेक्षित रोजगार नहीं मिल रहा है। उन्होंने कहा, “मुख्यमंत्र्यांनी लातूरमध्ये ५० हजार नोकऱ्यांचे आश्वासन दिले. प्रत्यक्षात स्थानिक तरुणांना किती रोजगार मिळाला, याचे उत्तर सरकारने द्यावे।”
अहमदपुर, चाकूर और जळकोट में एमआईडीसी स्थापित करने की घोषणाओं पर भी आंदोलनकर्ताओं ने सवाल उठाया। उन्होंने पूछा कि इन घोषणाओं को धरातल पर कब उतारा जाएगा। लातूर जिले में रोजगार, उद्योग, पानी, कृषि और बुनियादी सुविधाओं से जुड़े सवाल वर्षों से लंबित होने के बावजूद सरकार की ओर से ठोस निर्णय नहीं लिए जाने का आरोप लगाया गया।
शक्तिपीठ महामार्ग के मुद्दे पर भी शिवसेना ने सरकार को निशाने पर लिया। आंदोलन में कहा गया कि जनता की बुनियादी समस्याओं की अनदेखी कर शक्तिपीठ महामार्ग को आगे बढ़ाया जा रहा है। सरकार को पहले किसानों, पानी, रोजगार और उद्योग से जुड़े सवालों का समाधान करना चाहिए।
मराठवाड़ा के ऐतिहासिक संघर्ष का उल्लेख करते हुए अंबादास दानवे ने कहा कि इस भूमि ने निजामशाही के खिलाफ संघर्ष किया है। स्वामी रामानंद तीर्थ के विचारों की परंपरा, सशस्त्र क्रांति, वंदे मातरम् सत्याग्रह, मराठी स्कूलों और पुस्तकालयों के माध्यम से लातूर ने सामाजिक और राजनीतिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। उन्होंने कहा कि इसी तरह लातूरकरों के सवालों के लिए भी संघर्ष करने की आवश्यकता है।
सत्ताधारियों पर निशाना साधते हुए दानवे ने कहा, “भाजपच्या रूपाने आता मराठवाड्यात रझाकार आले आहेत।” उनके इस बयान से आंदोलन का राजनीतिक माहौल और गरमा गया।
आंदोलन के बाद शिवसेना के प्रतिनिधिमंडल ने लातूर जिले के विभिन्न लंबित मुद्दों को लेकर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा। इसमें सूखा घोषित करने, किसानों को तत्काल आर्थिक सहायता देने, पानी की समस्या का समाधान करने, रोजगार के अवसर पैदा करने और एमआईडीसी की घोषणाओं को धरातल पर उतारने सहित विभिन्न मांगें रखी गईं।
इस दौरान मराठा आरक्षण की मांग को लेकर आत्महत्या करने वाले युवक को श्रद्धांजलि भी अर्पित की गई।
आंदोलन में आमदार प्रविण स्वामी, आमदार कैलास पाटील, संपर्कप्रमुख रोहिदास चव्हाण, जिलाप्रमुख बालाजी रेड्डी, पप्पूभाई कुलकर्णी, डॉ. शोभा बेंजरगे, जयश्री उटगे, ॲड. राहुल मातोळकर, विष्णू साठे, दिनेश जावळे, बी. एन. डोंगरे, अविनाश रेशमे, सोमनाथ झुंजारे, बजरंग जाधव सहित शिवसेना के पदाधिकारी, अंगीकृत संगठनों के पदाधिकारी, शिवसैनिक और नागरिक बड़ी संख्या में मौजूद रहे।
घोषणाओं के बजाय वास्तविक विकास कार्य, आश्वासनों के बजाय किसानों के खातों में सहायता और पानी की राजनीति के बजाय स्थायी समाधान की मांग को लेकर शिवसेना उबाठा ने आंदोलन के माध्यम से सरकार से जवाब मांगा।