बीएमसी स्कूलों में 24 करोड़ की किताबों की खरीद पर सवाल, सितंबर में सप्लाई से कितना फायदा?
मुंबई बीएमसी स्कूलों में 24 करोड़ रुपये की किताबें खरीदने के प्रस्ताव पर बैठक में सवाल उठे। 45 दिन की सप्लाई, पुराने छात्र आंकड़ों, मराठी किताबों और सीधे प्रकाशकों से खरीद को लेकर नेताओं ने जवाब मांगा।
मुंबई। मुंबई बीएमसी के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों के लिए 24 करोड़ रुपये की नई किताबें खरीदने के प्रस्ताव को लेकर बीएमसी की बैठक में जमकर बहस हुई। कई बड़े नेताओं ने प्रशासन की इस योजना पर सवाल उठाते हुए पूछा कि जब किताबों की सप्लाई में 45 दिन का समय लगेगा और सितंबर का महीना बीत रहा है, ऐसे में पढ़ाई का आधा साल खत्म होने के बाद मिलने वाली किताबों से बच्चों को कितना फायदा होगा।
बैठक में नेताओं ने प्रशासन से पिछले दो वर्षों में बच्चों को उपलब्ध कराई जा रही किताबों के प्रभाव का रिपोर्ट कार्ड पेश करने की मांग की। उनका सवाल था कि इन किताबों से बच्चों की पढ़ाई में अब तक कितना सुधार आया है, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा या रिपोर्ट प्रशासन के पास है या नहीं।
नेताओं ने यह सुझाव भी दिया कि बीएमसी को किसी ठेकेदार के माध्यम से किताबें खरीदने के बजाय सीधे प्रकाशकों से किताबें खरीदनी चाहिए। उनका कहना है कि इससे जनता के पैसों की बड़ी बचत हो सकती है। इसके साथ ही मराठी भाषा की किताबों पर भी पूरा ध्यान देने की अपील की गई।
बैठक में बच्चों की संख्या के आंकड़ों को लेकर भी गंभीर मुद्दा उठाया गया। नेताओं का कहना है कि नए सत्र के लिए पुराने आंकड़ों के आधार पर किताबें छापना उचित नहीं है। यदि इस साल बच्चों की संख्या बढ़ गई तो नए बच्चे किताबों से वंचित रह सकते हैं।
इतनी बड़ी रकम की किताबों की छपाई और उनकी जांच का काम महज 45 दिनों में कैसे पूरा होगा, इस पर भी प्रशासन से सफाई मांगी गई। नेताओं ने किताबों की खरीद, छपाई और वितरण की प्रक्रिया को लेकर सवाल उठाते हुए समयबद्धता और बच्चों तक किताबें पहुंचने की व्यवस्था पर स्पष्टीकरण की मांग की।
दूसरी ओर, बीएमसी प्रशासन का कहना है कि वह नियमों के अनुसार काम कर रहा है। प्रशासन के मुताबिक, इन किताबों की वजह से पिछले वर्षों में बच्चों के परीक्षा परिणाम काफी अच्छे आए हैं।
अब 24 करोड़ रुपये की किताबों की खरीद के प्रस्ताव के साथ यह सवाल महत्वपूर्ण हो गया है कि सितंबर में शुरू होने वाली 45 दिन की सप्लाई प्रक्रिया के बाद ये किताबें बच्चों की पढ़ाई में कितनी उपयोगी साबित होंगी और पुराने आंकड़ों के आधार पर की जा रही व्यवस्था में नए विद्यार्थियों के लिए किताबों की उपलब्धता कैसे सुनिश्चित होगी।