मुंबई। मुंबई के बीएमसी अस्पतालों की बिगड़ती हालत को लेकर बीएमसी की बैठक में गहरी चिंता जताई गई। बैठक में नेताओं और अधिकारियों ने कहा कि जब तक अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, दवाओं की किल्लत और मरीजों के लंबे इंतजार जैसी बुनियादी समस्याएं दूर नहीं होतीं, तब तक महंगी नई सुविधाओं पर बड़ा खर्च करना उचित नहीं है। प्रशासन से सबसे पहले जरूरी और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने की मांग की गई।

कैंसर के महंगे इलाज से जुड़े एक प्रस्ताव पर चर्चा के दौरान नेताओं ने बीएमसी के खर्च को लेकर कई अहम सवाल उठाए। उन्होंने पूछा कि केवल कुछ मरीजों के महंगे इलाज पर बीएमसी इतना बड़ा बजट क्यों खर्च कर रही है। साथ ही यह भी सवाल उठाया गया कि इस इलाज के लिए आयुष्मान भारत या किसी अन्य सरकारी योजना से सहायता मिलेगी या नहीं। बीएमसी से इस संबंध में स्थिति पूरी तरह स्पष्ट करने की मांग की गई।

बैठक में यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी भी नई तकनीक का विरोध नहीं है, लेकिन कोई नया प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले भविष्य में उस पर होने वाले बजट और खर्च का सही आकलन करना जरूरी है। नेताओं ने कहा कि अस्पतालों में पहले से मौजूद बुनियादी समस्याओं के समाधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

बीएमसी अस्पतालों में डॉक्टरों को बनाए रखना भी बड़ी चुनौती के रूप में सामने आया। कम वेतन और अधिक काम के कारण अनुभवी डॉक्टर सरकारी नौकरी छोड़कर चले जाते हैं। ऐसे में मांग की गई कि डॉक्टरों की तनख्वाह, दवाओं के खर्च और पूरे अस्पताल प्रबंधन को लेकर एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की जाए।

बीएमसी से यह भी बताने को कहा गया है कि उसके पास कितने अस्पताल, बेड, आईसीयू और डॉक्टर मौजूद हैं। इन आंकड़ों के आधार पर अगले पांच साल के लिए एक मजबूत और बेहतर स्वास्थ्य योजना तैयार करने की जरूरत बताई गई। बैठक में उठे सवालों ने यह रेखांकित किया कि नई और महंगी चिकित्सा सुविधाओं के साथ सरकारी अस्पतालों में बुनियादी सेवाओं की मजबूती को भी प्राथमिकता देना जरूरी है।

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