सत्य और गुणों के सामने ही झुकाएं सिर, भय-लोभ से नहीं बदलनी चाहिए श्रद्धा: मुनि योगसागर
मुनि योगसागर जी महाराज ने कोटा में कहा कि श्रद्धा भय, आशा, स्नेह और लोभ से नहीं, सत्य व गुणों के प्रति दृढ़ रहनी चाहिए।
तस्वीर में मुनिश्री योगसागर जी महाराज के चातुर्मास के दौरान श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी दादाबाड़ी में धार्मिक अनुष्ठान और कलश स्थापना में भाग लेते हुए श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने आचार्य समन्तभद्र स्वामी विरचित रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 30 की व्याख्या करते हुए सम्यग्दर्शन की दृढ़ता और विवेकपूर्ण विनय का संदेश दिया। मुनिश्री ने कहा कि सम्यग्दृष्टि व्यक्ति की श्रद्धा परिस्थितियों के दबाव में नहीं बदलती। वह भय, आशा, स्नेह अथवा लोभ के वशीभूत होकर मिथ्या देव, मिथ्या शास्त्र अथवा मिथ्या गुरु के समक्ष न तो प्रणाम करता है और न ही उनकी विनय करता है।
मुनिश्री ने कहा कि मनुष्य के जीवन में भय, आशा, स्नेह और लोभ चार ऐसी शक्तियां हैं, जो उसकी सही श्रद्धा को विचलित कर सकती हैं। कई बार व्यक्ति भय के कारण ऐसी जगह झुक जाता है, जहां उसे नहीं झुकना चाहिए। कभी किसी लाभ की आशा में अनुचित व्यक्ति को सम्मान देने लगता है। कभी व्यक्तिगत स्नेह के कारण सत्य-असत्य का विवेक खो देता है और कभी लोभ उसे अपने सिद्धांतों से समझौता करने के लिए विवश कर देता है।
उन्होंने कहा कि सम्यग्दर्शन का अर्थ केवल भगवान को मान लेना नहीं, बल्कि सत्य-असत्य का विवेक जागृत होना है। सम्यग्दृष्टि जीव व्यक्ति को देखकर नहीं, बल्कि उसके गुणों को देखकर सम्मान करता है और अपने स्वार्थ के कारण अपनी श्रद्धा को नहीं बदलता।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने स्पष्ट किया कि विनय का अर्थ हर किसी के सामने सिर झुका देना नहीं है। विनय उसी के प्रति सार्थक है, जो वास्तव में गुणवान, सत्यनिष्ठ, संयमी और आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने वाला हो। यदि भय, लोभ या स्वार्थ के कारण श्रद्धा बदल रही है तो व्यक्ति को अपने भीतर झांककर विचार करना चाहिए कि उसका सम्यग्दर्शन कितना दृढ़ है।
उन्होंने कहा कि आज समाज में कई बार व्यक्ति सिद्धांतों से अधिक सुविधा को महत्व देने लगता है। जहां अपना लाभ दिखाई देता है, वहां झुक जाता है और जहां स्वार्थ की पूर्ति नहीं होती, वहां अपने आदर्शों को भूल जाता है। आचार्य समन्तभद्र स्वामी का यह संदेश ऐसी मानसिक दुर्बलता से सावधान करता है।
मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि धर्म का मार्ग सुविधा का नहीं, बल्कि विवेक का मार्ग है। सत्य के मार्ग पर चलते हुए कठिनाइयां भी आएं, तब भी सम्यग्दृष्टि जीव अपने सिद्धांतों को नहीं छोड़ता। सच्ची श्रद्धा वही है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग बनी रहे।
उन्होंने श्रद्धालुओं को आत्मपरीक्षण का संदेश देते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को निरंतर स्वयं से चार प्रश्न करने चाहिए—क्या मैं भय के कारण झुक रहा हूं? क्या किसी आशा में अपना सिद्धांत छोड़ रहा हूं? क्या अंधे स्नेह के कारण विवेक खो रहा हूं? क्या लोभ मुझे धर्म से दूर कर रहा है?
मुनिश्री ने कहा कि यदि इन चारों से ऊपर उठकर सत्य, अहिंसा, वीतरागता और जिनवाणी के प्रति श्रद्धा को दृढ़ रखा जाए तो सम्यग्दर्शन मजबूत होता है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त होता है।
उन्होंने कहा कि जीवन में सिर हर किसी के सामने नहीं, बल्कि सत्य, सद्गुण, संयम और वीतरागता के सामने झुकना चाहिए। भय और लोभ से किया गया नमन आत्मकल्याण का साधन नहीं बनता, जबकि विवेकपूर्वक किया गया विनय धर्म की शोभा बढ़ाता है। सच्ची श्रद्धा वही है, जो परिस्थितियों से प्रभावित न हो और स्वार्थ के आगे न झुके। जीवन में कितनी भी विपरीत परिस्थितियां क्यों न आएं, यदि सत्य के प्रति श्रद्धा और धर्म के प्रति निष्ठा अडिग है तो वही सम्यग्दर्शन की वास्तविक पहचान है।
गुरुवाणी का अमृत संदेश देते हुए मुनिश्री ने कहा, “सिर हर किसी के सामने नहीं, सत्य और गुणों के सामने झुकाइए। भय से नहीं, विवेक से विनय कीजिए; लोभ से नहीं, श्रद्धा से धर्म अपनाइए। व्यक्ति नहीं, उसके गुणों को देखिए; स्वार्थ नहीं, सत्य को महत्व दीजिए। जो विपरीत परिस्थितियों में भी धर्म और सिद्धांतों पर अडिग रहे—वही सच्चा सम्यग्दृष्टि जीव है।”
विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक पुण्यार्जन कर धर्मलाभ अर्जित किया। अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि सम्यग्दर्शन भक्ति एवं चातुर्मास कलश स्थापना का पुण्यार्जन श्री टीकमचंद जी, श्रीमती प्रमिला जी, श्री भावेश जी, श्री रोहित जी, श्रीमती पायल जी, गर्व एवं अक्षांत तथा समस्त ठग परिवार (नैनवां वाले) एवं श्रीमती पुष्पा बाई जी, श्री महावीर जी, श्री लोकेश जी, श्री राजेश जी, श्री मनीष जी, श्री रोहित एवं समस्त बागड़िया परिवार (सीतापुर वाले), दादाबाड़ी द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
महामंत्री श्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री हुकमचंद जी, श्री नितिन जी, श्री ललितपुर परिवार, श्री राजेन्द्र जी, हुकम काका, श्री प्रकाश हरसोरा, श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री पुण्योदय भक्तामर मंडल द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती सुनिता जी एवं नवीन जी, हिण्डोली जैन परिवार को प्राप्त हुआ।
श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनिश्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्रीमती शशि जी एवं श्री पारस जी बोराब परिवार को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धापूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। मुनिश्री के संदेश ने सम्यग्दर्शन में दृढ़ता, सत्य के प्रति निष्ठा और गुणों के आधार पर विनय के महत्व को रेखांकित किया।