लोकमूढ़ता से बचें, विवेकपूर्ण धर्माचरण अपनाएँ—मुनिश्री योगसागर जी महाराज
कोटा के दादाबाड़ी में मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने लोकमूढ़ता और अंधानुकरण से बचने की प्रेरणा दी। 20 अगस्त को क्षुल्लक श्री 105 संयमसागर जी महाराज का जैनेश्वरी मुनि दीक्षा संस्कार होगा।
तस्वीर में कोटा के नसियां जी दादाबाड़ी में मुनिश्री 108 योगसागर जी महाराज प्रवचन देते हुए और श्रद्धालु धार्मिक अनुष्ठान करते नजर आ रहे हैं।
कोटा, 17 अगस्त। श्री दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में चातुर्मासरत ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनिश्री 108 योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के 22वें श्लोक की आध्यात्मिक व्याख्या करते हुए श्रावकों को लोकमूढ़ता से बचने, अंधानुकरण छोड़ने और विवेकपूर्ण धर्माचरण अपनाने की प्रेरणा दी। उन्होंने स्पष्ट कहा कि केवल इसलिए कोई कार्य धर्ममय नहीं हो जाता कि उसे बहुत से लोग कर रहे हैं। धर्म श्रद्धा, ज्ञान और विवेक पर आधारित है।
मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य को प्रत्येक धार्मिक मान्यता एवं आचरण के वास्तविक स्वरूप और प्रयोजन को समझकर ही उसे स्वीकार करना चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य अनेक प्रकार की रूढ़ियों, परंपराओं और अंधविश्वासों से प्रभावित हो जाता है। कभी भय तो कभी लालच के कारण वह ऐसी क्रियाओं में प्रवृत्त हो जाता है, जिनका आत्मकल्याण से कोई संबंध नहीं होता।
उन्होंने कहा कि जैन दर्शन अंधानुकरण नहीं, बल्कि तत्त्व को समझकर श्रद्धा करने की प्रेरणा देता है। मंदिर जाना, पूजा करना और धार्मिक अनुष्ठान करना तभी सार्थक है, जब उससे जीवन में अहिंसा, करुणा, क्षमा, संयम और आत्मचिंतन का विकास हो। धर्म का वास्तविक उद्देश्य बाहरी दिखावे के बजाय आत्मशुद्धि है।
मुनिश्री ने कहा कि सम्यग्दृष्टि व्यक्ति निरंतर आत्मनिरीक्षण करता है कि उसका प्रत्येक आचरण उसे राग-द्वेष से दूर कर रहा है अथवा उनमें वृद्धि कर रहा है। जो आचरण आत्मशुद्धि, अहिंसा, संयम एवं वैराग्य की ओर ले जाए, वही वास्तविक धर्म की दिशा है।
उन्होंने कहा कि परंपरा का सम्मान आवश्यक है, लेकिन परंपरा के नाम पर विवेक को छोड़ देना उचित नहीं। सच्चा धार्मिक व्यक्ति भीड़ का अनुसरण नहीं करता, बल्कि जिनवाणी के प्रकाश में अपने जीवन की दिशा निर्धारित करता है।
मुनिश्री ने श्रावकों से कहा कि बच्चों को अंधविश्वास नहीं, बल्कि तत्त्वज्ञान, विवेक और संस्कारों की शिक्षा दें। धर्म का उद्देश्य केवल बाहरी क्रियाओं की वृद्धि नहीं, बल्कि भीतर के परिणामों को निर्मल करना है। उन्होंने कहा कि लोकमूढ़ता से मुक्त होना केवल अंधविश्वास छोड़ना नहीं, बल्कि जिनवाणी के प्रकाश में अपनी बुद्धि और विवेक को जागृत करना है।
मुनिश्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि जीवन में कोई भी निर्णय केवल इस आधार पर नहीं लेना चाहिए कि “सब लोग ऐसा करते हैं।” प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं विचार करना चाहिए कि उसका आचरण उसे आत्मकल्याण की ओर ले जा रहा है या नहीं। यही जागरूकता मनुष्य को लोकमूढ़ता से बचाकर सम्यग्दर्शन और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ाती है।
इस अवसर पर चातुर्मास मुख्य संयोजक श्री हुकम जैन ‘काका’ ने बताया कि 20 अगस्त 2026, गुरुवार को प्रातः 8:00 बजे श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में भव्य जैनेश्वरी मुनि दीक्षा महोत्सव होगा। परम पूज्य क्षुल्लक श्री 105 संयमसागर जी महाराज का जैनेश्वरी मुनि दीक्षा संस्कार ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि शिरोमणि श्री 108 योगसागर जी महाराज के पावन कर-कमलों से संपन्न होगा।
उन्होंने बताया कि यह दीक्षा संस्कार संतशिरोमणि आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज के पावन आशीर्वाद तथा विद्याशिरोमणि आचार्य श्री 108 समयसागर जी महाराज के मंगल आशीर्वाद से संपन्न होगा। समाजबंधुओं से सपरिवार उपस्थित होकर इस दुर्लभ एवं ऐतिहासिक दीक्षा संस्कार के साक्षी बनने तथा धर्मलाभ एवं पुण्यार्जन करने का आह्वान किया गया।
अध्यक्ष श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि सम्यग्ज्ञान कलश का पुण्यार्जन श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन राजेन्द्र जी, हुकम काका, प्रकाश हरसोरा परिवार, सागरमल-सुविग्य बोरखंडिया परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक ठोरा परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक किया गया।
उपाध्यक्ष श्री सुमित जैन एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन राजेन्द्र जी, हुकम काका, प्रकाश हरसोरा एवं छाया जी के जन्मदिन के उपलक्ष्य में परिवार, कोटा द्वारा किया गया। शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ।
श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्री अरविन्द-विनीता चवारिया परिवार, नाथद्वारा एवं श्री महावीर-पलाश जी खटोड़ परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।
श्री अर्पित एवं श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनिश्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री कमल जी जैन परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं क्षुल्लक श्री 105 संयमसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य श्री कैलाश जी एवं श्री मनोज जी बगड़ा, बसंत विहार, गणेश तलाव, कोटा परिवार को प्राप्त हुआ।
मंगलाचरण का पुण्य अवसर प्रियंका कंसल द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न किया गया। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने श्रद्धाभावपूर्वक आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
मुनिश्री योगसागर जी महाराज का गुरुवाणी संदेश रहा—“धर्म वही है, जो अंधानुकरण से नहीं, विवेक से आत्मा को शुद्धता की ओर ले जाए।” धर्मसभा में दिया गया यह संदेश लोकमूढ़ता से बचते हुए विवेक, आत्मशुद्धि और आत्मकल्याण की दिशा में आचरण करने पर केंद्रित रहा।