खाद की किल्लत और कालाबाजारी पर मनोज दुबे ने सरकार को घेरा, कार्रवाई की मांग
राजस्थान में खाद की किल्लत और कालाबाजारी को लेकर भारतीय राष्ट्रीय किसान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज दुबे ने सरकार पर सवाल उठाए। उन्होंने 3 लाख मीट्रिक टन से अधिक स्टॉक के बावजूद किसानों की परेशानी पर कार्रवाई की मांग की।
तस्वीर में भारतीय राष्ट्रीय किसान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज दुबे नजर आ रहे हैं।
कोटा, 18 अगस्त। भारतीय राष्ट्रीय किसान महासभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मनोज दुबे ने राजस्थान सरकार से खाद की किल्लत और कालाबाजारी दूर करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि गोदामों में 3 लाख मीट्रिक टन से ज्यादा खाद भरी पड़ी होने के बावजूद किसानों को घंटों लाइन में खड़े रहने के बाद भी खाली हाथ लौटना पड़ रहा है। उन्होंने इसे किसानों के लिए बेहद शर्मनाक स्थिति बताते हुए कहा कि भाजपा सरकार किसानों को जरूरत के समय पर्याप्त मात्रा में गुणवत्तापूर्ण और उचित मूल्य पर खाद उपलब्ध कराने में पूरी तरह विफल रही है।
मनोज दुबे ने कहा कि पहले कमजोर मानसून ने खरीफ की बुआई का लक्ष्य 14.88 लाख हेक्टेयर घटा दिया और अब खाद नहीं मिलने से बची-खुची फसलें भी चौपट होने की कगार पर हैं। केंद्र और राज्य सरकार पर्याप्त स्टॉक होने का दावा कर रही हैं, इसके बावजूद भरतपुर सहित कई जिलों में किसान खाद के लिए कतारों में धक्के खा रहे हैं।
उन्होंने आरोप लगाया कि यह लापरवाही नहीं, बल्कि सुनियोजित लूट है। मनोज दुबे के अनुसार, दुकानदार और सोसाइटियां जानबूझकर किल्लत दिखाकर कालाबाजारी कर रहे हैं। उन्होंने कहा कि खाद की कालाबाजारी के आरोप लग रहे हैं और 266 रुपए की यूरिया की बोरी किसान तक 500 रुपए में पहुंचाई जा रही है। उन्होंने कहा कि जौ किसानों से खुली लूट है।
मनोज दुबे ने कालाबाजारी, जमाखोरी और निर्धारित मूल्य से अधिक कीमत पर खाद बेचने के मामलों में उर्वरक दुकानों के लाइसेंस रद्द करने तथा उनके खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कर कठोर कार्रवाई करने की मांग की। उन्होंने अमानक खाद की बिक्री, अधिक कीमत पर खाद की बिक्री, अनियमित वितरण और टैगिंग में गड़बड़ी पाए जाने पर थोक एवं खुदरा विक्रेताओं के खिलाफ भी कठोर कार्रवाई की मांग की।
मनोज दुबे ने कहा कि किसान खाद की किल्लत और कालाबाजारी से परेशान है, जबकि सरकार मूकदर्शक बनकर तमाशा देख रही है। उन्होंने इसे घोर निंदनीय और बेहद शर्मनाक बताया। उन्होंने कहा कि जो सरकार अपने ही गोदामों की खाद अन्नदाता तक नहीं पहुंचा सकती, वह किसान हितैषी होने का दावा किस मुंह से करती है।