कोटा के पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियाजी दादाबाड़ी में आयोजित धार्मिक कार्यक्रम के दौरान पूजा-अर्चना और स्वाध्याय में भाग लेते जैन श्रद्धालु।   

कोटा, 15 अक्टूबर 2026। पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी दादाबाड़ी, कोटा में गुरुवार को निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्डक श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 77 एवं 78 की व्याख्या करते हुए श्रावकों को हिंसा-दान अनर्थदंड व्रत का पालन करने और अशुभ चिंतन से दूर रहने की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि श्रावक धर्म का पालन केवल प्रत्यक्ष हिंसा से बचने तक सीमित नहीं है। हिंसा के साधन उपलब्ध कराने, दूसरों के अहित का विचार करने और निरर्थक अशुभ प्रवृत्तियों में समय गंवाने से बचना भी आवश्यक है। विचारों की शुद्धि, व्यवहार में विवेक और जीवन में अहिंसा का पालन ही श्रावक धर्म की वास्तविक साधना है।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने श्लोक क्रमांक 77 की व्याख्या करते हुए बताया कि फरसा, तलवार, कुदाली, फावड़ा, अग्नि, जंजीर तथा ऐसे अन्य साधनों का अविवेकपूर्ण दान, जिनसे जीवों की हिंसा होने की आशंका हो, हिंसा-दान अनर्थदंड कहलाता है। ऐसे साधन किसी जीव की हिंसा का निमित्त बन सकते हैं। इसलिए किसी वस्तु का दान करते समय उसके उपयोग, उद्देश्य और उससे उत्पन्न होने वाले परिणामों पर विचार करना चाहिए। जैन दर्शन में किसी कार्य का मूल्यांकन केवल उसके बाहरी स्वरूप से नहीं, बल्कि उसके पीछे निहित भावों और परिणामों के आधार पर भी किया जाता है।

उन्होंने कहा कि हिंसा में सहायक साधन उपलब्ध कराने, ऐसी प्रवृत्तियों को प्रोत्साहित करने अथवा उनका अनुमोदन करने से भी व्यक्ति के भाव अशुभ हो सकते हैं। श्रावक को प्रत्येक कार्य में विवेक रखते हुए विचार करना चाहिए कि उसके व्यवहार से किसी जीव को कष्ट तो नहीं पहुंचेगा। अहिंसा का अर्थ केवल स्वयं हिंसा नहीं करना नहीं है, बल्कि दूसरों के लिए भी अहिंसा के अनुकूल वातावरण बनाना है। करुणा, संयम और विवेक को जीवन का आधार बनाना जैन जीवन-दर्शन की महत्वपूर्ण शिक्षा है।

श्लोक क्रमांक 78 की व्याख्या करते हुए मुनि श्री ने अशुभ विचारों, अहितकारी कल्पनाओं और अनावश्यक चर्चाओं से दूर रहने पर विशेष बल दिया। उन्होंने बताया कि दूसरों के धन-धान्य का नाश, मारपीट, बंधन, अंग-भंग, परस्त्री संबंध अथवा किसी के अहित की कल्पना करने वाली चर्चाएं और विचार मनुष्य के भावों को अशुद्ध बनाते हैं। इस प्रकार का निरर्थक और अहितकारी चिंतन भी अनर्थदंड का कारण बन सकता है।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि मनुष्य के जीवन में अनेक परिस्थितियां कर्मों के उदय के अनुसार आती हैं। प्रतिकूल परिस्थितियों में क्रोध, द्वेष और मोह बढ़ाने के बजाय समता भाव धारण करना चाहिए। जो व्यक्ति प्रत्येक परिस्थिति में अपने भावों को संभालना सीख लेता है, वह विपरीत परिस्थितियों को भी आत्मकल्याण का माध्यम बना सकता है। दूसरों के प्रति दुर्भावना रखने से सबसे पहले स्वयं के भाव प्रभावित होते हैं। इसलिए किसी के अहित की कल्पना करने के बजाय सद्भाव, क्षमा और आत्मनिरीक्षण की भावना विकसित करनी चाहिए।

उन्होंने समझाया कि शरीर और धन के प्रति अत्यधिक मोह मनुष्य को निरंतर चिंता, विकल्प और अशांति में उलझाए रखता है। धन का विवेकपूर्ण उपयोग करना और शरीर के प्रति अनावश्यक ममत्व कम करना आत्मकल्याण की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। संसार की परिस्थितियां हमेशा मन के अनुकूल नहीं होतीं, लेकिन अपने भावों को निर्मल बनाए रखना मनुष्य के पुरुषार्थ पर निर्भर करता है।

तप की महत्ता बताते हुए मुनि श्री ने कहा कि जिस प्रकार दूध को तपाने के लिए पात्र को भी अग्नि की तपन सहनी पड़ती है, उसी प्रकार कर्मों की निर्जरा के लिए साधक को तप और संयम का आश्रय लेना पड़ता है। तप का उद्देश्य केवल शारीरिक कष्ट सहना नहीं, बल्कि इच्छाओं पर नियंत्रण प्राप्त करना और आत्मा को विकारों से दूर करने का पुरुषार्थ करना है। इच्छाओं का निरोध, कषायों का शमन और आत्मस्वरूप की ओर उन्मुख होना ही तप की सार्थकता है।

उन्होंने कहा कि उपवास का वास्तविक भाव केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि आत्मा के निकट रहकर भीतर की विकारपूर्ण प्रवृत्तियों को शांत करने का प्रयास करना है। बाहरी त्याग के साथ आंतरिक भावों में परिवर्तन नहीं आने पर साधना का उद्देश्य अधूरा रह जाता है। इसलिए प्रत्येक धार्मिक क्रिया के साथ भावों की शुद्धि और आत्मनिरीक्षण आवश्यक है।

मुनि श्री ने स्वाध्याय और धार्मिक कथाओं के चयन पर भी विशेष बल दिया। उन्होंने कहा कि मनुष्य को ऐसी धार्मिक कथाएं पढ़नी और सुननी चाहिए, जिनसे संसार के प्रति वैराग्य, धर्म के प्रति अनुराग और आत्मकल्याण की भावना उत्पन्न हो। निरर्थक चर्चाओं और अशुभ विचारों में समय गंवाने के बजाय जिनवाणी का अध्ययन, सत्संग और आत्मचिंतन करना चाहिए। मर्यादित व्यवहार अपनाकर प्रत्येक क्षण अपने विचारों का निरीक्षण करना और भावों को निर्मल बनाने का प्रयास करना ही सच्ची साधना है।

प्रवचन के अंत में मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि अपने भावों को संभालना, हिंसा का निमित्त बनने से बचना, अशुभ चिंतन का त्याग करना और समता भाव के साथ कर्मनिर्जरा का प्रयास करना मोक्षमार्ग की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हैं। मनुष्य को बाहरी परिस्थितियों को बदलने के साथ अपने भीतर के भावों को सुधारने पर भी ध्यान देना चाहिए। यही आत्मकल्याण और श्रावक धर्म की सार्थकता है।

पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन श्री दिगंबर जैन महासमिति, शास्त्री मार्केट द्वारा किया गया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ भी श्रद्धालु परिवार ने प्राप्त किया।

श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री मान प्रकाश चंद जी, राहुल एवं पियूष जैन, सरस्वती कॉलोनी, कोटा तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान में बाबूलाल, महेंद्र बबरिया तथा श्री प्रकाश चंद जी, राहुल एवं पियूष जैन, सरस्वती कॉलोनी ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया।

श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ महेंद्र, विमलेश कासलीवाल परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं, मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य ओमप्रकाश, दीपेश, ठग, आंवा को मिला। मंगलाचरण का पुण्य अवसर अंकिता को प्राप्त हुआ।

Tags: