कोटा, 25 अक्टूबर। उपवास का उद्देश्य केवल भोजन का त्याग करना नहीं, बल्कि मन, वचन और काय को संयमित कर आत्मा के निकट पहुंचना है। श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियाजी दादाबाड़ी, कोटा में आयोजित श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान के आठवें दिन निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने श्री रत्नकरण्ड श्रावकाचार प्रवचनमाला के श्लोक क्रमांक 108 एवं 109 पर प्रवचन देते हुए उपवास, आत्मसंयम, त्याग और धर्माचरण के आध्यात्मिक महत्व को विस्तार से समझाया।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कहा कि उपवास के दिन श्रावक को धर्माराधना, स्वाध्याय, ध्यान और आत्मचिंतन के लिए विशेष समय निकालना चाहिए। अपनी दैनिक चर्या को अनुशासित बनाते हुए राग-द्वेष, कषाय और अशुभ प्रवृत्तियों से बचने का प्रयास करना चाहिए। उपवास आत्मशुद्धि, संयम और आत्मसाधना का श्रेष्ठ माध्यम है, जिसका वास्तविक लाभ तभी मिलता है, जब व्यक्ति अपने आचरण में संयम को स्थान देता है।

मुनिश्री ने स्पष्ट किया कि साधना का उद्देश्य केवल बाहरी धार्मिक क्रियाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। जीवन में आत्मकल्याण की भावना जागृत होना आवश्यक है। धर्माचरण तभी सार्थक होता है, जब व्यक्ति अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखे, मन को स्थिर बनाए और व्यवहार में संयम धारण करे।

प्रोषधोपवास से इंद्रियों को नियंत्रित करने का अभ्यास

श्लोक क्रमांक 109 के संदर्भ में मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने प्रोषधोपवास की महत्ता पर प्रकाश डाला। उन्होंने आहार के चार प्रकार अशन, खाद्य, लेह्य और पेय का उल्लेख करते हुए बताया कि उपवास के माध्यम से व्यक्ति इंद्रियों को नियंत्रित करने, इच्छाओं को सीमित करने और आत्मसाधना में आगे बढ़ने का अभ्यास करता है।

मुनिश्री ने श्रावकों को प्रेरित किया कि वे व्रत और उपवास को केवल परंपरा के रूप में न अपनाएं, बल्कि उनके आध्यात्मिक उद्देश्य को समझकर जीवन में उतारें। मन की चंचलता दूर करना, समता भाव विकसित करना, कषायों को कम करना और आत्मकल्याण की दिशा में निरंतर प्रयास करना ही धर्मसाधना का मूल भाव है।

श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान के इस पावन अवसर पर मुनिश्री के प्रवचनों से उपस्थित श्रद्धालुओं को संयम, त्याग, आत्मचिंतन और धर्ममय जीवन जीने की प्रेरणा मिली।

शांतिधारा और आहारदान में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक भाग लेकर पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ प्राप्त करने वाले परिवारों के नाम तथा कलश स्थापना के पुण्यार्जक परिवार का विवरण प्राप्त होना शेष है।

श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्री राजेन्द्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; श्री अशोक कुमार, ऋषभ एवं नवीन भाणजा परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया।

भक्तामर विधान में भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया। श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ संदीप एवं सोनिया गंगवाल परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं, मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य महेंद्र गोधा एवं लक्ष्मी गोधा परिवार को मिला।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए और जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया। विधान के आठवें दिन प्रवचन, प्रोषधोपवास की महत्ता और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से श्रद्धालुओं को आत्मसंयम तथा धर्माचरण का संदेश दिया गया।


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