कोटा में मुनि योगसागर जी महाराज ने बताया प्रोषधोपवास का महत्व, आत्मशुद्धि का दिया संदेश
कोटा के नसियां जी, दादाबाड़ी में कल्पद्रुम महामंडल विधान के सातवें दिवस मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने प्रोषधोपवास का महत्व बताया। जानिए कैसे स्वाध्याय, संयम, धर्मश्रवण और आत्मचिंतन से साधना को सार्थक बनाया जा सकता है।
तस्वीर में कोटा के श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित कल्पद्रुम महामंडल विधान के सातवें दिवस पर भक्तिभाव से अनुष्ठान करते हुए श्रद्धालु नजर आ रहे हैं।
कोटा में श्री 1008 कल्पद्रुम महामंडल विधान के सातवें दिवस निर्यापक श्रमण मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने प्रोषधोपवास शिक्षा व्रत का महत्व बताते हुए कहा कि उपवास केवल भोजन का त्याग नहीं, बल्कि आत्मशुद्धि, इंद्रिय संयम और कर्मों की निर्जरा का प्रभावी माध्यम है। उन्होंने श्रद्धालुओं को इच्छाओं पर नियंत्रण, स्वाध्याय, धर्मश्रवण और आत्मचिंतन के माध्यम से आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ने की प्रेरणा दी।
24 अक्टूबर 2026, शनिवार को श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी, कोटा में आयोजित कल्पद्रुम महामंडल विधान के सातवें दिवस धर्मसभा को संबोधित करते हुए मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने प्रोषधोपवास की आध्यात्मिक उपयोगिता पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि उपवास के माध्यम से मनुष्य अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण रखकर आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
मुनि श्री ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 106 की व्याख्या करते हुए बताया कि प्रत्येक माह की दोनों अष्टमी और दोनों चतुर्दशी को जैन आगम के अनुसार चार प्रकार के आहार अशन, खाद्य, लेह्य और पेय का स्वेच्छा से त्याग करना प्रोषधोपवास शिक्षा व्रत कहलाता है। इस साधना से शरीर के प्रति ममत्व कम होता है और साधक के भीतर त्याग, वैराग्य तथा आत्मकल्याण की भावना दृढ़ होती है। जैन धर्म में अष्टमी और चतुर्दशी को शाश्वत पर्व के रूप में विशेष महत्व प्राप्त है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उपवास का वास्तविक अर्थ स्वयं के समीप रहना और अपनी आत्मा में रमण करना है। पांच पापों और आरंभ की प्रवृत्तियों से विरत रहने के साथ वस्त्र, आभूषण जैसे बाहरी पदार्थों के प्रति आसक्ति का त्याग करना भी संयम की भावना को मजबूत करता है। कम भोजन करना, कम सोना और संसार के प्रति मोह घटाना साधना को सुदृढ़ बनाता है। मुनि श्री ने कहा कि श्रावक और श्रमण जैन धर्म के दो महत्वपूर्ण आधार हैं तथा दोनों की अपनी-अपनी भूमिका और साधना पद्धति है।
मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने रत्नकरण्ड श्रावकाचार के श्लोक क्रमांक 108 का उल्लेख करते हुए उपवास के दिनों में किए जाने वाले धार्मिक कर्तव्यों की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि उपवास के दौरान आलस्य छोड़कर शास्त्रों का अध्ययन करना चाहिए, धर्मोपदेश को श्रद्धापूर्वक सुनना चाहिए और स्वयं धर्मश्रवण करने के साथ दूसरों को भी इसके लिए प्रेरित करना चाहिए। ज्ञान और ध्यान में तत्पर रहने से ही उपवास की साधना सार्थक होती है।
उन्होंने कहा कि उपवास का उद्देश्य केवल शारीरिक भूख पर नियंत्रण करना नहीं, बल्कि मन की चंचलता, इंद्रियों की आसक्ति और विषय-विकारों पर विजय प्राप्त करने का अभ्यास करना है। भोजन का त्याग करने के साथ राग-द्वेष और कषायों को कम करने का प्रयास किया जाए, तभी यह साधना आत्मिक उन्नति का माध्यम बनती है।
कल्पद्रुम महामंडल विधान में अष्टद्रव्य पूजन के महत्व पर प्रकाश डालते हुए मुनि श्री ने कहा कि पूजन में अर्पित किए जाने वाले प्रत्येक द्रव्य के पीछे निहित भाव और उसके आध्यात्मिक उद्देश्य को समझना आवश्यक है। श्रद्धा, समर्पण, भक्ति और शुभोपयोग के साथ की गई सामूहिक पूजा सातिशय पुण्य के बंध का कारण बनती है। उन्होंने श्रद्धालुओं से धार्मिक अनुष्ठानों के साथ जीवन में संयम, त्याग, स्वाध्याय, पूजन और आत्मचिंतन को भी स्थान देने का आह्वान किया। उनके अनुसार, बाहरी धार्मिक क्रियाओं के साथ आंतरिक शुद्धि का प्रयास साधना को सार्थक बनाता है और आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।
श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक भाग लेकर पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन और शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ प्राप्त करने वाले परिवारों के नाम तथा कलश स्थापना के पुण्यार्जक परिवार का विवरण प्राप्त होना शेष है।
श्री सुमित सेंकी और श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन प्रमोद कुमार, श्रीमती सुषमा एवं निपुन पंजाब परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार द्वारा किया गया। भक्तामर विधान में भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक भाग लेकर पुण्यार्जन किया।
श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ प्रभा एवं प्रतीक सुरलाया परिवार को प्राप्त हुआ, जबकि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य संदीप एवं सोनिया गंगवाल परिवार को मिला। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए और जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।
मुनि श्री के प्रवचन का केंद्रीय संदेश रहा कि प्रोषधोपवास शिक्षा व्रत श्रावक को त्याग, संयम, स्वाध्याय और आत्मचिंतन की प्रेरणा देता है। उपवास के साथ धर्मश्रवण, शास्त्रों का अध्ययन, ध्यान तथा राग-द्वेष के त्याग का अभ्यास आत्मशुद्धि और कर्मनिर्जरा की दिशा में सार्थक प्रयास बनता है। साथ ही, उपवास श्रद्धा और विवेक के साथ करने तथा शारीरिक क्षमता, आयु और स्वास्थ्य स्थिति के अनुरूप आहार-त्याग का निर्णय लेने पर भी जोर दिया गया। अस्वस्थता की स्थिति में चिकित्सकीय सलाह को प्राथमिकता देने का संदेश दिया गया।