कोटा में गणधर मुनि विवर्धनसागर का प्रवचन, राग और आसक्ति को बताया कर्मबंध का कारण
कुन्हाड़ी स्थित चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री ने कर्ममुक्ति और आत्मशुद्धि के उपाय बताए।
कोटा के कुन्हाड़ी स्थित चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में विराग वर्धन वर्षायोग-2026 के दौरान आयोजित धर्मसभा में मुनि श्री विवर्धनसागर जी महाराज से आशीर्वाद लेते और शास्त्र भेंट करते श्रद्धालु।
कोटा। राग, आसक्ति और पदार्थों के प्रति मोह जीव को कर्मों के बंधन में बांधते हैं, जबकि अनासक्ति और सम्यक दृष्टि मुक्ति का मार्ग प्रशस्त करती हैं। गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ने रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में विराग वर्धन वर्षायोग-2026 के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में कर्मबंध के कारणों और उनसे बचने के उपायों की व्याख्या करते हुए यह संदेश दिया।
मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा से पूर्व सुबह गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ ने स्वीट होम कॉलोनी स्थित श्री 1008 आदिनाथ दिगंबर जैन मंदिर में दर्शन किए। यहां अभिषेक और शांतिधारा संपन्न कराई गई। इसके बाद संघ रिद्धि-सिद्धि नगर स्थित श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर पहुंचा, जहां मुनिश्री के सान्निध्य में धर्मसभा आयोजित हुई।
प्रवचन के दौरान मुनिश्री ने कहा कि भगवान महावीर स्वामी के उपदेशों का श्रवण करना पुण्य का अवसर है। मनुष्य को धर्म के मर्म को समझकर उसे अपने जीवन में उतारना चाहिए। उन्होंने पुद्गल और जीव के स्वरूप की व्याख्या करते हुए बताया कि पुद्गल में रूप, रस, गंध, स्पर्श और ध्वनि जैसी पर्यायें पाई जाती हैं, जबकि जीव अरूपी है।
मुनिश्री ने ध्वनि के विभिन्न रूपों का उल्लेख करते हुए समवशरण में भगवान की दिव्यध्वनि की महिमा बताई। उन्होंने कहा कि भगवान की दिव्यध्वनि विभिन्न भाषाओं में परिवर्तित होकर सभी जीवों के कल्याण का माध्यम बनती है।
कर्मबंध से बचने के उपायों पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने परिग्रह परिमाण व्रत का महत्व समझाया। उन्होंने कहा कि वस्तुओं के संग्रह की सीमा निर्धारित करने से उनके प्रति मोह और मूर्छा कम होती है। कर्मबंध के कारणों को जानना और उनसे बचने के लिए पुरुषार्थ करना आवश्यक है। ऐसा करने से जीव कर्मों से मुक्ति की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
उन्होंने बताया कि मिथ्यादृष्टि जीव आसक्ति के कारण कर्मों के बंधन में पड़ता है, जबकि सम्यग्दृष्टि जीव अनासक्ति का भाव अपनाकर कर्मबंध से बचने का प्रयास करता है। मुनिश्री ने धर्मसभा में उपस्थित श्रावकों से राग-द्वेष का त्याग कर आत्मकल्याण के मार्ग पर चलने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि कर्मबंध के कारणों को समझकर उनसे दूर रहने वाला जीव आत्मशुद्धि के माध्यम से मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ सकता है।
मंदिर समिति के अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा में चंद्रेश रांवका, पारस लुहाड़िया, जोनू बाकलीवाल, रमेश बड़जात्या, मनोज मित्तल, महावीर दलवासा, नवीन सांवला और सुशील बज सहित समाज के अनेक सदस्य उपस्थित रहे। विराग वर्धन वर्षायोग-2026 के अंतर्गत आयोजित इस धर्मसभा में कर्मबंध के कारणों, अनासक्ति, आत्मशुद्धि और मोक्षमार्ग पर चलने के महत्व को विस्तार से समझाया गया।