गुरु मार्ग दिखाते हैं, आत्मकल्याण के लिए जागृत करनी होगी उपादान शक्ति: मुनि विवर्धनसागर
कोटा के रिद्धि-सिद्धि नगर स्थित चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में विराग वर्धन वर्षायोग-2026 के दौरान गणधर मुनि विवर्धनसागर जी ने निमित्त और उपादान शक्ति के आध्यात्मिक सिद्धांत को सरल उदाहरणों से समझाया।
तस्वीर में कोटा के कुन्हाड़ी स्थित जैन मंदिर में प्रवचन देते हुए गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज नजर आ रहे हैं।
कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में 'विराग वर्धन वर्षायोग-2026' के अंतर्गत गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ (6 पिच्छी) का भव्य चातुर्मासिक मंगल प्रवेश श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के वातावरण में जारी है। समाधिस्थ गणाचार्य श्री 108 विरागसागर जी महाराज के सुशिष्य एवं पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज का यह आयोजन अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर समिति एवं सकल दिगम्बर जैन समाज समिति, रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया जा रहा है।
इस अवसर पर गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ने आध्यात्मिक सिद्धांतों की सरल व्याख्या करते हुए कहा कि गुरु केवल मार्ग दिखाते हैं, लेकिन उस मार्ग पर चलना स्वयं की उपादान शक्ति पर निर्भर करता है। उन्होंने कहा कि प्रत्येक आत्मा में परमात्मा बनने की क्षमता विद्यमान है, आवश्यकता केवल अपनी उपादान शक्ति को जागृत करने की है।
मुनिश्री ने अपने प्रवचन में 'निमित्त' और 'उपादान' के आध्यात्मिक सिद्धांत को सरल उदाहरणों के माध्यम से समझाया। उन्होंने कहा कि किसी भी कार्य की सिद्धि के लिए उपादान शक्ति और निमित्त दोनों का अपना-अपना महत्व होता है। उपादान वह मूल सामर्थ्य है, जो किसी वस्तु या जीव के भीतर स्वाभाविक रूप से विद्यमान रहती है, जबकि उस शक्ति को प्रकट करने में सहायक बनने वाले साधन, परिस्थितियां और व्यक्ति निमित्त कहलाते हैं।
मुनिश्री ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार एक कुम्हार केवल मिट्टी मिलने से घड़ा नहीं बना देता। वह पहले उपयुक्त मिट्टी का चयन करता है, उसे पैरों से रौंदकर मुलायम बनाता है, फिर चाक पर आकार देता है और अंत में अग्नि में पकाता है। इसके बाद ही मिट्टी का घड़ा जल धारण करने योग्य बनता है। उन्होंने कहा कि घड़ा बनने की मूल क्षमता मिट्टी में पहले से मौजूद होती है। कुम्हार, चाक और अग्नि केवल निमित्त होते हैं। यदि मिट्टी के स्थान पर रेत हो तो हजार प्रयासों के बाद भी घड़ा नहीं बन सकता, क्योंकि रेत में वह उपादान शक्ति नहीं होती।
आत्मकल्याण के मार्ग से इस सिद्धांत को जोड़ते हुए मुनिश्री ने कहा कि गुरु के प्रवचन सुनने के लिए सैकड़ों लोग आते हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही व्यक्ति आत्मसाधना के मार्ग पर आगे बढ़ पाते हैं। इसका कारण यह है कि जिसके भीतर उपादान शक्ति जागृत होती है, वही वैराग्य और मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होकर जीवन के वास्तविक लक्ष्य को प्राप्त करने का प्रयास करता है।
मुनिश्री ने कहा कि जैन सिद्धांत के अनुसार पंचम काल में प्रत्यक्ष मोक्ष की प्राप्ति संभव नहीं मानी गई है, लेकिन मोक्षमार्ग पर चलना, आत्मशुद्धि करना और मोक्ष की दिशा में अपनी दूरी कम करना पूर्णतः संभव है। निर्मल भाव, संयम, स्वाध्याय और साधना के माध्यम से प्रत्येक व्यक्ति अपनी आत्मा को उन्नत कर सकता है तथा भविष्य में मोक्ष प्राप्ति के योग्य बन सकता है।
कार्यक्रम में समाज के अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा, मंत्री पंकज खटोड़, कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला, टीकम पाटनी, पारस कासलीवाल, पारस लुहाड़िया, राजकुमार पाटनी, पूर्व न्यायाधीश जिनेन्द्र जैन सहित बड़ी संख्या में समाजबंधु एवं श्रद्धालु उपस्थित रहे। कार्यक्रम का संचालन पारस कासलीवाल ने किया। चातुर्मासिक आयोजन के दौरान मुनिश्री द्वारा दिए जा रहे आध्यात्मिक संदेशों में आत्मशुद्धि और साधना के महत्व पर विशेष जोर दिया जा रहा है।