गुरु ही भगवान तक पहुंचने का सेतु, बिना गुरु आत्मसाक्षात्कार संभव नहीं : मुनि योगसागर जी

कोटा नसियां जी में गुरु पूर्णिमा पर मुनि योगसागर जी ने गुरु महिमा, आत्मसाक्षात्कार और भगवान तक पहुंचने के मार्ग पर दिया संदेश।

Update: 2026-07-29 11:58 GMT

तस्वीर में (बाएं से दाएं) जैन धार्मिक अनुष्ठान के दौरान पारंपरिक परिधान और मुकुट पहने दो श्रद्धालु भगवान महावीर की प्रतिमा पर चांदी के कलश से जलाभिषेक करते दिख रहे हैं।

श्री आदिनाथ दिगम्बर जैन पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में गुरु पूर्णिमा का पर्व परम पूज्य निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मंदिर परिसर गुरु वंदना, णमोकार महामंत्र, जिनभक्ति और आत्मचिंतन की दिव्य भावधारा से गूंज उठा। धर्मसभा में बड़ी संख्या में पहुंचे श्रद्धालुओं ने गुरु महिमा पर आधारित प्रवचनों का श्रवण कर धर्म और आत्मसाधना के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

मंदिर के निदेशक हुकम जैन 'काका' एवं अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि गुरु पूर्णिमा के अवसर पर मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने गुरु के वास्तविक स्वरूप, आध्यात्मिक महत्ता और आत्मकल्याण में गुरु की अनिवार्य भूमिका का तत्त्वज्ञानपूर्ण निरूपण किया।

धर्मसभा को संबोधित करते हुए निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने कहा कि संसार में गुरु का स्थान सर्वोपरि है, क्योंकि गुरु ही वह दिव्य सेतु हैं जो जीव को भगवान तक पहुंचने का मार्ग दिखाते हैं। उन्होंने कहा कि भगवान शाश्वत हैं, जिनवाणी सनातन है और शास्त्र अमर हैं, लेकिन इनका वास्तविक बोध कराने वाले गुरु ही होते हैं। गुरु का दर्शन सत्य का दर्शन है और उनकी वंदना सत्य की वंदना है। गुरु के बिना धर्म केवल शब्द बनकर रह जाता है, जबकि गुरु की कृपा से वही धर्म जीवन का प्रत्यक्ष अनुभव बन जाता है।

मुनिश्री ने गुरु पूर्णिमा के आध्यात्मिक महत्व को समझाते हुए भगवान महावीर के केवलज्ञान प्राप्ति के बाद समवशरण की ऐतिहासिक घटना का उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि केवलज्ञान प्राप्ति के बाद 66 दिनों तक समवशरण में कोई गणधर उपस्थित नहीं था, जिसके कारण दिव्यध्वनि का रहस्य जनसामान्य तक नहीं पहुंच सका। इसके बाद सौधर्म इन्द्र ने ब्राह्मण का रूप धारण कर प्रकाण्ड विद्वानों को समवशरण तक पहुंचाया। जैसे ही वे भगवान के समवशरण में पहुंचे, उनका मिथ्यात्व दूर हुआ और सम्यग्ज्ञान का उदय हुआ। मुनिश्री ने कहा कि यही गुरु तत्त्व की महिमा है, जो अज्ञान के अंधकार को दूर कर सत्य का प्रकाश करता है।

अपने प्रवचन में मुनिश्री ने कहा कि कर्मों की व्यवस्था अत्यंत सूक्ष्म और गहन होती है। महान पुण्यात्माओं के जीवन में भी कर्मों का प्रभाव दिखाई देता है, इसलिए प्रत्येक साधक को अहंकार त्यागकर गुरु के मार्गदर्शन में आत्मशुद्धि का पुरुषार्थ करना चाहिए। उन्होंने परम पूज्य आचार्य श्री 108 विद्यासागर जी महाराज का उदाहरण देते हुए कहा कि गुरु की कृपा, तप और साधना के बल पर एक साधारण शिष्य भी युगपुरुष बन सकता है। आचार्य श्री ने अपने गुरु के सान्निध्य में स्वयं को तपाकर ऐसा व्यक्तित्व प्राप्त किया, जिसकी वाणी ने विद्वानों से लेकर सामान्य जन तक को धर्ममार्ग की प्रेरणा दी। उन्होंने कहा कि सच्ची गुरु भक्ति वही है, जिसमें शिष्य स्वयं को निरंतर श्रेष्ठ बनाने का पुरुषार्थ करे।

मंदिर के महामंत्री महेन्द्र कासलीवाल ने बताया कि धर्मसभा में क्षुल्लक संयम सागर जी ने कहा कि यदि गुरु और भगवान दोनों एक साथ उपस्थित हों तो सर्वप्रथम गुरु के चरणों में वंदना करनी चाहिए, क्योंकि गुरु ही भगवान का वास्तविक परिचय कराते हैं। उन्होंने कहा कि गुरु के बिना न भगवान की पहचान संभव है और न ही आत्मा का साक्षात्कार। गुरु अज्ञान के अंधकार को दूर कर ज्ञान का दीप प्रज्ज्वलित करते हैं तथा मनुष्य को बाहरी आकर्षणों से हटाकर आत्मकल्याण और आध्यात्मिक साधना के मार्ग पर अग्रसर करते हैं।

गुरु पूर्णिमा के अवसर पर धर्मसभा में श्रद्धालु गुरु महिमा के अमृतमय उपदेशों को भावविभोर होकर सुनते रहे। गुरु वंदना, मंगल स्तवन और जिनभक्ति की स्वर लहरियों से पूरा मंदिर परिसर आध्यात्मिक ऊर्जा से ओतप्रोत दिखाई दिया। श्रद्धालुओं ने गुरु चरणों में विनय अर्पित कर धर्म, संयम और आत्मसाधना के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया।

समिति अध्यक्ष जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन हेमन्त–मनोज जेसवाल परिवार, श्री राजेन्द्र जी एवं श्री हुकम जैन 'काका' हरसोरा परिवार तथा श्रीमती सुशीला जी एवं श्री विवेक जी ठोरा परिवार द्वारा प्राप्त किया गया।

उपाध्यक्ष सुमित जैन ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन राजेन्द्र जी–हुकम जैन 'काका' हरसोरा परिवार, सुशीला जी–विवेक जी ठोरा परिवार तथा शास्त्र भेंट राकेश–शालिनी गर्ग एवं हुकुम–अमित सोगानी परिवार द्वारा श्रद्धाभावपूर्वक संपन्न हुआ।

मनोज बगड़ा ने बताया कि भक्तामर विधान का पुण्यार्जन पुण्योदय भक्तामर मंडल के समस्त सदस्य परिवारों द्वारा प्राप्त किया गया। प्रशासनिक मंत्री पारस दोराया ने बताया कि आज मुनिश्री के आहारदान का सौभाग्य राजेन्द्र जी एवं हुकम जैन 'काका' हरसोरा परिवार तथा क्षुल्लक संयम सागर जी के आहार का सौभाग्य राजेन्द्र जी–रोहित जी ठग परिवार को प्राप्त हुआ।

महिला मंडलों की अध्यक्ष एवं संयोजिकाओं ने संयुक्त रूप से बताया कि सभी महिला मंडलों ने पारंपरिक वेशभूषा में संगीतमय पूजा कर अष्टद्रव्य समर्पित किए। बालिका छात्रावास की बालिकाओं, प्रबंध कार्यकारिणी और समाज के श्रद्धालुओं ने भी आचार्य श्री की पूजा में श्रद्धाभाव से अर्घ्य अर्पित कर धर्मलाभ अर्जित किया। गुरु पूर्णिमा का यह आयोजन गुरु भक्ति, आत्मजागरण और तत्त्वचिंतन की भावधारा के साथ संपन्न हुआ।

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