श्री बड़े मथुराधीश मंदिर में गुरु पूर्णिमा उत्सव धूमधाम से संपन्न, प्रभु को धराया गया 'पूनम कचौरी' का महाभोग

कोटा के पाटनपोल स्थित श्री बड़े मथुराधीश मंदिर में गुरु पूर्णिमा का पर्व पारंपरिक श्रद्धाभाव के साथ मनाया गया। प्रभु को विशेष 'पूनम कचौरी' का महाभोग अर्पित किया गया और मंदिर परिसर जयकारों से गूंज उठा। जानिए पुष्टिमार्ग में 'कचौरी पूनम' और गुरु पूजन की विशेष परंपरा।

Update: 2026-07-29 14:01 GMT

तस्वीर में पाटनपोल स्थित श्री बड़े मथुराधीश मंदिर के प्रभु श्री मथुराधीश के स्वरूप के दर्शन हो रहे हैं।

कोटा, 29 जुलाई। पुष्टिमार्गीय वैष्णव संप्रदाय की प्रथम पीठ पाटनपोल स्थित श्री बड़े मथुराधीश मंदिर में व्यास पूर्णिमा का पावन पर्व बुधवार को पारंपरिक श्रद्धाभाव और धार्मिक उल्लास के साथ मनाया गया। प्रथम पीठ के युवराज गोस्वामी मिलन बावा के सान्निध्य एवं निर्देशन में मंदिर परिसर में विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित किए गए।

गुरु पूर्णिमा उत्सव के अवसर पर पुष्टिमार्गीय परंपराओं का पूर्ण निष्ठा के साथ निर्वहन किया गया। पर्व की शुभता और पवित्रता के प्रतीक स्वरूप मंदिर के मुख्य द्वारों की देहरी को शुद्ध हल्दी से लीपा गया। इसके साथ ही प्रवेश द्वारों पर आशापाल के पत्तों और सूत की डोरी से निर्मित सुंदर वंदनवार सजाई गई। प्रभु श्री मथुराधीश जी के दर्शन के लिए तड़के से ही वैष्णव श्रद्धालुओं का मंदिर में पहुंचना शुरू हो गया और दूर-दराज से आए भक्तों ने दर्शन कर पुण्य लाभ अर्जित किया।

युवराज गोस्वामी मिलन बावा ने बताया कि पुष्टिमार्गीय सेवा प्रणाली में गुरु पूर्णिमा का विशेष महत्व है। इस अवसर पर प्रभु को मूंग दाल के स्थान पर विशेष रूप से उड़द दाल की पीठी से बनी कचौरी का महाभोग धराया गया। उन्होंने बताया कि संप्रदाय की परंपरा के अनुसार इस तिथि को 'कचौरी पूनम' भी कहा जाता है। इसी परंपरा के अनुरूप प्रभु को विशेष 'पूनम कचौरी' आरोगाई गई।

उत्सव के दौरान संपूर्ण मंदिर परिसर प्रभु की जय-जयकार और "श्री कृष्णः शरणं मम" के जाप से गुंजायमान रहा। श्रद्धालुओं ने पूरे उत्साह और श्रद्धा के साथ उत्सव में भाग लिया तथा प्रभु के दर्शन कर आशीर्वाद प्राप्त किया।

युवराज गोस्वामी मिलन बावा ने बताया कि पुष्टिमार्गीय वल्लभ संप्रदाय की अपनी विशिष्ट परंपराएं हैं। उन्होंने कहा कि यद्यपि गुरु पूर्णिमा के अवसर पर प्रभु सेवा का विशेष उत्सव मनाया जाता है, लेकिन इस संप्रदाय में गुरुदेव का मुख्य पूजन श्रावण शुक्ल द्वादशी, अर्थात पवित्रा एकादशी के अगले दिन करने का विधान है। इसी दिन गुरु चरणों की विशेष सेवा की जाती है और पवित्रा (रेशमी सूत के धागे) समर्पित किए जाते हैं। इसी परंपरा के निर्वहन के साथ गुरु पूर्णिमा का यह उत्सव श्रद्धा, सेवा और धार्मिक आस्था के वातावरण में संपन्न हुआ।

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