मंगलाचरण से पापों का क्षय और शुभता का संचार होता है: मुनि विवर्धनसागर, चातुर्मास प्रवचन में बताया महत्व

कोटा के रिद्धि-सिद्धि नगर स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के दौरान गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ने मंगलाचरण के आध्यात्मिक महत्व, शास्त्र अध्ययन और आचरण के संबंध में महत्वपूर्ण संदेश दिया।

Update: 2026-08-03 13:17 GMT

तस्वीर में गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज कोटा के कुन्हाड़ी स्थित मंदिर में प्रवचन देते हुए नजर आ रहे हैं।

कोटा के रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत समाधिस्थ गणाचार्य श्री 108 विरागसागर जी महाराज के सुशिष्य एवं पट्टाचार्य श्री 108 विशुद्धसागर जी महाराज के आज्ञानुवर्ती गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ (6 पिच्छी) का भव्य चातुर्मासिक मंगल प्रवेश श्रद्धा, भक्ति और उत्साह के वातावरण में जारी है। आयोजन अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगम्बर जैन मंदिर समिति एवं सकल दिगम्बर जैन समाज समिति, रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित किया गया।

गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ने अपने सारगर्भित प्रवचन में मंगलाचरण के आध्यात्मिक और व्यावहारिक महत्व का विस्तार से वर्णन करते हुए कहा कि ‘मंगल’ वही है, जो जीव के लिए पुण्य का संचय करे, शुभता का संचार करे तथा पापों के क्षय का माध्यम बने। उन्होंने कहा कि तीर्थंकर भगवान की महिमा ऐसी है कि सौ-सौ इंद्रों के समूह भी उनके श्रीचरणों में मस्तक झुकाकर वंदना करते हैं। यह केवल श्रद्धा का प्रतीक नहीं, बल्कि अहंकार के परित्याग और विनम्रता के सर्वोच्च आदर्श का संदेश भी देता है।

मुनिश्री ने कहा कि मंगलाचरण का उद्देश्य नास्तिकता, संशय और अशुभ भावों का परिहार कर श्रद्धा, सद्भाव तथा सम्यक् दृष्टि का विकास करना है। यह शिष्ट आचरण, सद्व्यवहार और आध्यात्मिक अनुशासन का प्रतीक है, जिससे जीवन के सभी कार्य निर्विघ्न रूप से संपन्न होते हैं।

उन्होंने कहा कि शास्त्र अध्ययन की परंपरा में प्रारंभ, मध्य और अंत—तीनों चरणों में मंगलाचरण का विशेष महत्व बताया गया है। शास्त्र के आरंभ में मंगलाचरण करने से शिष्य श्रद्धा और विनम्रता के साथ ज्ञानार्जन के लिए पात्र बनता है। अध्ययन के मध्य मंगलाचरण से विद्या की निर्विघ्न प्राप्ति होती है तथा एकाग्रता और ग्रहणशीलता बनी रहती है। वहीं अध्ययन के अंत में किया गया मंगलाचरण अर्जित ज्ञान के फल, उसके आत्मसात होने और आध्यात्मिक कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है। उन्होंने कहा कि केवल शास्त्रों का अध्ययन ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि उन्हें आचरण में उतारना ही वास्तविक साधना है।

मंदिर अध्यक्ष राजेन्द्र गोधा एवं महामंत्री पंकज खटोड ने बताया कि सविता दीदी, संजय, आशीष तथा मोनू लुहाडिया को पाद प्रक्षालन का सौभाग्य प्राप्त हुआ।

कार्यक्रम में सकल दिगम्बर जैन समाज के संरक्षक राजमल पाटौदी, अध्यक्ष प्रकाश बज, महामंत्री पदम बड़ला, मंदिर कोषाध्यक्ष ताराचंद बड़ला, बसंत दोषी, निर्मल अजमेरा, प्रकाश पहाड़िया, मनोज निर्खी, सुरेश देईवाले, चंद्रप्रकाश बंसल, विनोद सरसोप, मोनू बाकलीवाल, नितेश खटोड़, सुरेंद्र पहाड़िया, पारस गोधा, अशोक पांडिया तथा चंद्रप्रभु दिगम्बर नवयुवक मंडल के सदस्य सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे। आयोजन श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक वातावरण के बीच संपन्न हुआ।

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