तस्वीर में श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ का बोर्ड और मुख्य द्वार नजर आ रहा है।   

कोटा. श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ, रामपुरा के तत्वावधान में आचार्य भगवन 1008 श्री हीराचंद जी म.सा. एवं भावी आचार्य श्री महेंद्र मुनि जी म.सा. के आज्ञानुवर्ती संत रत्न पूज्य श्री नंदीषेण मुनि जी म.सा., पूज्य श्री योगेश मुनि जी म.सा. एवं पूज्य श्री जितेंद्र मुनि जी म.सा. आदि ठाणा-3 के सानिध्य में चातुर्मास तप एवं त्याग के साथ निरंतर गतिमान है। नियमित प्रवचनों में श्रद्धालुओं को त्याग, संयम, पर्युपासना, दया और आत्मशुद्धि का महत्व समझाया जा रहा है।

योगेश मुनि जी म.सा. ने श्रद्धालुओं को त्याग, संयम, पर्युपासना, दया और आत्मशुद्धि का महत्व समझाते हुए कहा कि धर्म का उद्देश्य केवल बाहरी आचरण या दिखावा नहीं, बल्कि स्वयं के भीतर सकारात्मक परिवर्तन लाना है। जब मनुष्य अपने जीवन में मर्यादा, संयम और सदाचार को अपनाता है तो उसके जीवन में सुख और शांति का मार्ग प्रशस्त होता है।

श्री योगेश मुनि जी म.सा. ने जैन धर्म के परिभाषिक शब्द ‘पर्युपासना’ का अर्थ समझाते हुए कहा कि ‘परि’ अर्थात चारों ओर से और पर्युपासना अर्थात श्रद्धा एवं समर्पण के साथ सेवा-आराधना करना। उन्होंने कहा कि जिसके मन में श्रद्धा, वचन में सम्मान और काया सेवा के लिए समर्पित होती है, वही वास्तविक अर्थों में पर्युपासना करता है।

उन्होंने बताया कि पर्युपासना मुख्य रूप से मन, वचन और काया से होती है। केवल बाहरी रूप से पूजा या वंदना करना पर्याप्त नहीं है, बल्कि मन में श्रद्धा, वाणी में सम्मान और व्यवहार में सेवा का भाव होना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिनके चरणों में बैठकर मन को शांति प्राप्त हो और जो जीवन को आत्मकल्याण एवं मोक्ष की दिशा में ले जाएं, वही उपासना के योग्य हैं।

योगेश मुनि ने कहा कि संसार के भौतिक आकर्षण व्यक्ति को भोग की ओर ले जाते हैं, जबकि आचार्य, उपाध्याय और साधु त्याग एवं संयम की प्रेरणा देते हैं। इसलिए ऐसे आराध्य की उपासना करनी चाहिए, जो हमारे कर्मों को क्षीण करने और आत्मा को मोक्ष मार्ग की ओर ले जाने में सहायक हों। यदि व्यक्ति सच्चे हृदय से भगवान का स्मरण और चिंतन करता है तो उसके भीतर भी भगवान जैसे गुण विकसित होने लगते हैं।

उन्होंने कहा कि आत्मा अपने निज गुणों के कारण तीसरी उपास्य है। अरिहंत-सिद्ध, साधु-संत और अपनी आत्मा के गुणों की उपासना करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अपने भीतर परिवर्तन ला सकता है। उन्होंने कहा कि उपासक और आराधक बनने का मार्ग बाहर नहीं, बल्कि अपने भीतर से होकर गुजरता है।

प्रवचन में दया के महत्व पर विशेष प्रकाश डालते हुए योगेश मुनि ने कहा कि दया धर्म की जननी है। मोक्ष की ओर ले जाने वाले प्रमुख गुणों में दया का महत्वपूर्ण स्थान है। मुनिश्री ने कहा कि दया केवल किसी पर उपकार करने का नाम नहीं है, बल्कि दूसरे के दु:ख को अपने दु:ख के समान अनुभव करना है। जिस हृदय में दया का भाव जागृत होता है, वहां अहिंसा, करुणा और धर्म के अन्य गुण स्वत: विकसित होने लगते हैं।

श्री जितेन्द्र मुनि जी म.सा. ने कहा कि त्याग स्वयं को निखारने के लिए होता है, किसी को दिखाने के लिए नहीं। व्यक्ति जितना मर्यादा में रहता है, उतना ही सुखी रहता है। उन्होंने कहा कि जीवन में हर क्षण शुभ कर्म करने का प्रयास करना चाहिए और अशुभ कर्मों से बचना चाहिए। ज्ञान के साथ जीवन को सही दिशा मिलती है और व्यक्ति हर परिस्थिति में प्रसन्न रहना सीखता है।

उन्होंने कहा कि जीवन में सफलता मिलने पर मनुष्य को अभिमान नहीं करना चाहिए। सफलता को अपनी उपलब्धि मानकर अहंकार करने के बजाय विनम्रता बनाए रखना आवश्यक है। किसी का तिरस्कार या प्रतिकार नहीं करना चाहिए, क्योंकि क्रोध और प्रतिशोध व्यक्ति के भीतर अशांति पैदा करते हैं।

मुनिश्री ने मौन और सजगता का महत्व बताते हुए कहा—“चुप रहें, चौकस रहें।” उन्होंने समझाया कि कई बार मौन ऐसी परिस्थितियों से बचा लेता है, जिन्हें शब्द और विवाद बढ़ा देते हैं। बुराई की तुलना दियासलाई से करते हुए उन्होंने कहा कि छोटी-सी बात भी विवाद की आग को भड़का सकती है। इसलिए व्यक्ति को बोलने से पहले विचार करना चाहिए।

संघ के अध्यक्ष पंकज मेहता ने कहा कि श्रावक प्रवचन के माध्यम से सही मार्ग का चयन कर रहे हैं और निरंतर निर्मल मन की ओर अग्रसर हैं। संघ के मंत्री अनिल दक ने कहा कि प्रवचन में नियमित ज्ञान का अर्जन करते हुए श्रावक बड़ी संख्या में पहुंच रहे हैं।

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