तस्वीर में कोटा के मंदिर में जैन मुनि के पाद प्रक्षालन की धार्मिक रस्म निभाते श्रद्धालु।

कोटा। रिद्धि-सिद्धि नगर, कुन्हाड़ी स्थित अतिशयकारी श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में ‘विराग वर्धन वर्षायोग-2026’ के अंतर्गत गणधर मुनि श्री 108 विवर्धनसागर जी महाराज ससंघ के चातुर्मासिक प्रवास के दौरान धर्मसभा आयोजित हुई। धर्मसभा को संबोधित करते हुए प्रवर्तक मुनि श्री 108 विश्वनायक सागर जी महाराज ने कहा कि जैन दर्शन में जीव और अजीव द्रव्यों का विशद वर्णन किया गया है। जीव चेतन है, जबकि पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल अजीव द्रव्य हैं। इनमें पुद्गल मूर्तिक है, जबकि अन्य अजीव द्रव्य अमूर्तिक माने गए हैं।

मुनि श्री 108 विश्वनायक सागर जी महाराज ने आचार्य सिद्धांतदेव नेमीचंद लावले के सिद्धांतों का उल्लेख करते हुए कहा कि जीव का प्रमुख लक्षण चेतना है। पृथ्वीकायिक, जलकायिक, अग्निकायिक, वायुकायिक और वनस्पतिकायिक जीवों में भी चेतना विद्यमान होती है। प्रत्येक जीव अपने कर्मों के फल का अनुभव करता है। कर्म का नियम ऐसा है कि जीव को अपने किए हुए कर्मों के अनुकूल फल भोगना ही पड़ता है।

उन्होंने कहा कि एकेंद्रिय से लेकर पंचेंद्रिय तक सभी जीव कर्म के बंधन में रहते हैं। मनुष्य बुद्धिपूर्वक इष्ट और अनिष्ट का विचार करता है तथा अनिष्ट से बचने का प्रयास भी करता है, लेकिन कर्मों के उदय के समय उनके फल से बच पाना संभव नहीं होता। इसलिए व्यक्ति को अपने परिणामों और कर्मों के प्रति सजग रहना चाहिए तथा शुभ भावों के साथ जीवन जीने का प्रयास करना चाहिए।

मंदिर समिति अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा में चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं मुनि संघ के पाद प्रक्षालन का सौभाग्य श्रद्धालुओं को प्राप्त हुआ। सुगंधिदेवी, महेंद्र बगड़ा एवं मौसम त्रिपाल वालों के चौके को आहारचर्या कराने तथा संत भवन में व्यवस्थाओं में विशेष सहयोग मिल रहा है।

धर्मसभा का मंच संचालन पारस कासलीवाल ने किया। इस अवसर पर सकल समाज के महामंत्री पदम बड़ला, ताराचंद बड़ला, जैनेंद्र जज, सुरेंद्र पहाड़िया, आशीष पाटनी, अनिल खटोड़, पदम हरसौरा, विजय सेठी, पारस लुहाड़िया, स्वतंत्र पाटनी, जम्बू बज सहित बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।

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