कोटा स्थित नसियां जी मंदिर में भगवान महावीर की प्रतिमा के समक्ष पूजा-अर्चना करते श्रद्धालु।

कोटा, 24 सितम्बर। दशलक्षण महापर्व के नवम दिवस उत्तम आकिंचन धर्म के पावन अवसर पर श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में आयोजित धर्मसभा में ज्येष्ठ-श्रेष्ठ निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने कहा कि आकिंचन धर्म का सार ममत्व का त्याग है। संसार में जिसे हम ‘मेरा’ मानकर बैठे हैं, वास्तव में वह हमारा नहीं है। इस धरा पर जो कुछ मिला है, वह इसी धरा पर रह जाएगा। आत्मा का किसी बाहरी पदार्थ से वास्तविक संबंध नहीं है।

मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज ने कहा कि जब तक मनुष्य बाहरी पदार्थों और संबंधों में ‘मेरा-तेरा’ का भाव रखता है, तब तक वह आत्मा के वास्तविक स्वरूप को नहीं पहचान सकता। आकिंचन का अर्थ है—पर-पदार्थ का किंचित मात्र भी आश्रय न लेना और भीतर के ममत्व को समाप्त करना। वस्तुओं का होना बंधन का कारण नहीं है, बल्कि उनके प्रति उत्पन्न होने वाला राग-द्वेष ही बंधन का कारण बनता है।

संसार के संबंध शरीर के कारण, आत्मा के कारण नहीं

इससे पूर्व मुनि श्री 108 प्रणवसागर जी महाराज ने कहा कि संसार के सभी संबंध शरीर के कारण हैं, आत्मा के कारण नहीं। शरीर के कारण ही संसार में बंधन दिखाई देता है, जबकि आत्मा का पर-पदार्थ से कोई वास्तविक संबंध नहीं है। “किंचित मात्र भी मेरा नहीं है”—इस भावना की अनुभूति ही आकिंचन धर्म की दिशा में ले जाती है। आत्मा ही वास्तविक ‘स्व’ है।

उन्होंने कहा कि क्षणभर का भी राग आत्मानुभूति में बाधक बन सकता है। सिद्ध भगवान पूर्णतः पराश्रय से रहित हैं। न उन्हें भूतकाल की स्मृति का आश्रय है और न भविष्य की अपेक्षा। जब जीव परमाणु मात्र भी पर-पदार्थ के आश्रय को छोड़ने का पुरुषार्थ करता है, तभी वह मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर होता है।

राग-द्वेष का मैल हटे, तभी प्रकट होगी आत्मज्ञान की ज्योति

मुनिश्री ने कहा कि भीतर की लालसा, आसक्ति और ममत्व के कारण ही वैराग्य का उदय नहीं हो पाता। हम दृश्य जड़ पदार्थों को देखते-देखते द्रष्टा चेतन आत्मा को भूल जाते हैं। जब हमारी बुद्धि पर-पदार्थ को प्राप्त करने में लग जाती है, तब आत्मकल्याण का मार्ग पीछे छूट जाता है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि पदार्थ अपने आप में न अच्छा है, न बुरा; उसके प्रति हमारा राग-द्वेष ही समस्या का मूल कारण है। उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि दूध, दही या मक्खन दीपक को उसी रूप में प्रकाशित नहीं करते, बल्कि घी बनने के बाद ही दीपक को प्रकाशित करते हैं। उसी प्रकार आत्मा के भीतर राग-द्वेष और आसक्ति का मैल रहने तक केवल ज्ञान की ज्योति पूर्ण रूप से प्रकट नहीं हो सकती। आत्मा को राग-द्वेष से मुक्त करना ही भीतर की ज्योति प्रकट करने का मार्ग है।

मुनिश्री ने कहा कि अज्ञानवश हम निरंतर राग-द्वेष के वशीभूत होकर कर्मों का बंधन करते रहते हैं। आवश्यकता है कि कर्मबंध के बाधक कारणों को पहचाना जाए और मन, वचन एवं काय की प्रवृत्तियों को संयमित किया जाए। जब जीव इन बाधक कारणों से दूर होकर स्वयं को जीतने का पुरुषार्थ करता है, तब भीतर से आनंद का अनुभव होने लगता है।

“पहले लखो, फिर लिखो”—वस्तु के वास्तविक स्वरूप को पहचानने का संदेश

मुनिश्री ने प्रेरणा देते हुए कहा, “सब पढ़ते, लिखते, लखते नहीं, इसलिए बिलखते हैं। पहले लखो, फिर लिखो।” अर्थात वस्तु के वास्तविक स्वरूप को पहचानो, उसके बाद निर्णय करो। निश्चय की प्राप्ति बाहरी प्रवृत्तियों को बढ़ाने में नहीं, बल्कि अनावश्यक प्रवृत्ति और पराश्रय से निवृत्ति में है।

उत्तम आकिंचन धर्म यही संदेश देता है कि पर-पदार्थों का संग्रह नहीं, बल्कि उनसे ममत्व का त्याग आवश्यक है। जब ‘मेरा’ समाप्त होगा, तभी ‘मैं कौन हूं?’ का बोध जागेगा। यही आत्मदर्शन की शुरुआत है और यही मोक्षमार्ग की दिशा में सार्थक पुरुषार्थ है।

दस उपवास एवं पंचमेरु धर्म के उपवासकर्ताओं का होगा सम्मान

शिविर निदेशक श्री जम्बू जैन सर्राफ ने बताया कि दशलक्षण आध्यात्मिक योग साधना एवं संस्कार शिविर में शिविरार्थियों ने साधना, संयम और धार्मिक अनुशासन के साथ आकिंचन धर्म की आराधना की। अनेक शिविरार्थियों ने दशलक्षण धर्म के दस उपवास तथा पंचमेरु धर्म के पांच उपवास की साधना की।

उन्होंने बताया कि दशलक्षण महापर्व के अंतिम दिवस अनंत चतुर्दशी (अनंत चौदस) के अवसर पर महाराज श्री के पावन सान्निध्य में भव्य धर्म प्रभावना जुलूस निकाला जाएगा। जुलूस में दस उपवास की साधना करने वाले उपवासकर्ता बग्गियों में सवार होकर धर्म प्रभावना करेंगे। दस उपवासकर्ताओं में संजय लुहाड़िया, बीना लुहाड़िया, आस्था जैन, मेनका जैन, सुरलाया, हितेश सोगानी, लक्ष्य जैन, दिनेश जैन एवं प्रमोद कुमारी जैन सहित अन्य उपवासकर्ता शामिल हैं।

पंचमेरु धर्म के पांच उपवासकर्ताओं में उमा देवी जैन, सीमा जैन, प्रज्ञा जैन, सुमित्रा जैन सहित अन्य साधक शामिल हैं। इस अवसर पर सभी उपवासकर्ताओं का सम्मान भी किया जाएगा।

शिविरार्थियों ने शांतिधारा, दशलक्षण विधान, भक्तामर विधान, तत्त्वार्थ सूत्र एवं जिज्ञासा-समाधान सहित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में भक्तिभाव से सहभागिता की। शिविर के दौरान अनेक साधकों ने उपवास सहित एक समय शुद्ध भोजन का अनुशासन अपनाया। दिनभर की धर्म-साधना के पश्चात महाआरती में भी श्रद्धालुओं ने भक्तिभाव से सहभागिता कर धर्मलाभ अर्जित किया।

विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों में श्रद्धालुओं ने किया पुण्यार्जन

प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यार्जन कमल जी, दीप्ति जी, अंजना जी एवं जतिन परिवार द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया। कलश स्थापना का पुण्यार्जन अभय कुमार जी, रानी जी एवं नगेदा परिवार द्वारा किया गया।

श्री सुमित सेंकी ने बताया कि महाआरती का पुण्यार्जन मनोहर बाई एवं नमन ट्रेवल्स परिवार द्वारा किया गया। श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि आज की शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमती इंद्रा एवं राजीव बगड़ा परिवार, महावीर भारती, सिद्धार्थ मित्तल, श्रीमती सुशीला बाई-अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार तथा श्रीमती विमला-धर्मेश एवं आयुष श्रीमाल परिवार द्वारा किया गया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि दशलक्षण विधान में महावीर मित्तल, प्रेम कासलीवाल, संजय लुहाड़िया, डॉ. संतोष, जम्बू, रानी दुगेरिया एवं सुशीला ठोरा सहित पांच अन्य श्रद्धालुओं ने पुण्यार्जन किया। भक्तामर विधान का पुण्यार्जन श्रीमती किश्कन्धा बाई, जम्बू कुमार जी एवं भानु जी द्वारा श्रद्धापूर्वक किया गया।

तत्त्वार्थ सूत्र का पुण्यार्जन दीप्ति जैन, प्रमोद कुमारी, अंजना जी, आशा श्रीमाल एवं सुमित्रा द्वारा भक्तिभाव से किया गया। श्री सुनील माडिया ने बताया कि मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यार्जन/सौभाग्य उपवासकर्ता को प्राप्त हुआ। श्री दर्शन बरमुंडा ने बताया कि मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य मुकेश जी एवं अर्पित जी को प्राप्त हुआ।

मंगलाचरण का पुण्य अवसर भी श्रद्धाभावपूर्वक सम्पन्न हुआ। धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना, अर्घ्य समर्पण एवं जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

Tags: