कोटा में तीन मुनिराजों का दीक्षा दिवस मनाया, गुरुदेव को शास्त्र भेंट कर अर्पित की विनयांजलि
कोटा के कुन्हाड़ी स्थित जैन जिनालय में तीन मुनिराजों का दीक्षा दिवस मनाया गया। इस अवसर पर गुरुदेव को शास्त्र भेंट कर विनयांजलि अर्पित की गई। गणधर मुनि विवर्धन सागर महाराज ने अहंकार त्याग और संयम के महत्व पर प्रकाश डाला।
कोटा के कुन्हाड़ी स्थित श्री चंद्रप्रभु दिगंबर जैन मंदिर में आयोजित धर्मसभा के दौरान गुरुदेव को शास्त्र भेंट करते मुनिराज।
कोटा के कुन्हाड़ी स्थित श्री 1008 चंद्रप्रभु दिगंबर जैन जिनालय में तीन मुनिराजों का दीक्षा दिवस श्रद्धा और भक्ति के साथ मनाया गया। विराग वर्धन पावन वर्षायोग-2026 के अंतर्गत आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री 108 विश्वदक्ष सागर जी, मुनिश्री 108 विश्वहित सागर जी एवं मुनिश्री 108 विश्वभद्र सागर जी ने अपने गुरुदेव के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए उन्हें शास्त्र भेंट किए और विनयांजलि अर्पित की।
मंदिर अध्यक्ष राजेंद्र गोधा एवं मंत्री पंकज खटोड़ ने बताया कि धर्मसभा में समाज के अनेक गणमान्य लोगों ने भाग लिया। इनमें टीकम पाटनी, जैनेन्द्र जज सा., पारस लुहाड़िया, पारस कासलीवाल, राजेंद्र बगड़ा, रमेश साकुनिया, रामबाबू जैन, अशोक पांडिया, सुरेंद्र पहाड़िया, अशोक पापड़ीवाल एवं विनोद सरसोप सहित समाजबंधु उपस्थित रहे।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए गणधर मुनि श्री 108 विवर्धन सागर महाराज ने कहा कि यह दिन तीनों मुनिराजों के दीक्षा जीवन की स्मृतियों को नमन करने का अवसर है। इसी दिन आचार्य शिरोमणि राष्ट्रसंत समाधि साधक श्री विराग सागर महाराज ने 25 मुनियों को दीक्षा प्रदान की थी।
उन्होंने कहा कि बुद्धि के माध्यम से ऋद्धि प्राप्त की जा सकती है, लेकिन बुद्ध बनने के लिए कर्तृत्व, स्वामित्व और अहंकार की भावना का त्याग आवश्यक है। जब व्यक्ति इन बंधनों से मुक्त होता है, तभी उसकी आत्मा शुद्ध, बुद्ध और निरंजन स्वरूप को प्राप्त कर सकती है।
इस अवसर पर ब्रह्मचारी अरुण भैया ने तीनों मुनिराजों के प्रति विनयांजलि प्रस्तुत की। मुनिश्री विश्वमद सागर महाराज ने अपने आध्यात्मिक जीवन की यात्रा का स्मरण करते हुए बताया कि वर्ष 2010 में लोहारिया में उन्होंने ब्रह्मचर्य व्रत ग्रहण किया था। इसके बाद वर्ष 2011 में सोना गिरजी में आचार्य श्री विराग सागर महाराज से दो प्रतिमा के व्रत लिए और वर्ष 2015 में विरागोदय धाम में क्षुल्लक दीक्षा प्राप्त की।
मुनिश्री विश्वहित सागर महाराज ने आचार्य श्री विराग सागर महाराज के व्यक्तित्व और आध्यात्मिक प्रभाव का स्मरण किया। उन्होंने कहा कि आचार्यश्री में विलक्षण आध्यात्मिक शक्ति थी और उनके संपर्क में आने वाला व्यक्ति उनके प्रभाव से प्रभावित हुए बिना नहीं रह पाता था। वर्ष 2008 में मुंबई चातुर्मास के दौरान उन्हें आचार्यश्री का सान्निध्य मिला था। उन्होंने वर्ष 2017 में दिल्ली के लाल किले में हुई मुनि दीक्षा का स्मरण करते हुए अपनी भावना व्यक्त की कि उनके जीवन की अंतिम समाधि गुरु विवर्धन सागर महाराज के चरणों में हो।
मुनिश्री विश्वदक्ष सागर महाराज ने कहा कि गुरु गुणों की खान होते हैं। आचार्य श्री विराग सागर महाराज ने 2 नवंबर को दिल्ली में उन्हें मुनि दीक्षा प्रदान की थी। उन्होंने कहा कि मनुष्य जीवन का सार ज्ञान है और सम्यक ज्ञान के माध्यम से ही व्यक्ति अपनी आत्मा का कल्याण कर सकता है। उन्होंने भी जीवन में समाधि की भावना व्यक्त की।
गणधर मुनि श्री विवर्धन सागर महाराज ने साधना और संयम के महत्व को समझाते हुए कहा कि पत्थर बहुत होते हैं, लेकिन उनमें से कुछ ही मूर्ति बनने योग्य होते हैं। इसी प्रकार आचार्यश्री ने अनेक साधकों को संस्कारित कर मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर किया। उन्होंने कहा कि वैराग्य किसी भी प्रसंग से उत्पन्न हो सकता है। व्यक्ति के भीतर संयम की सच्ची भावना हो तो उसे संयम का मार्ग अवश्य मिलता है।
उन्होंने साधकों से साधना के मार्ग पर निरंतर आगे बढ़ते हुए आत्मकल्याण और समाधिमरण की भावना को लक्ष्य बनाने का संदेश दिया। धर्मसभा में तीनों मुनिराजों के दीक्षा जीवन, गुरु के प्रति समर्पण और आध्यात्मिक साधना से जुड़े प्रसंगों का स्मरण किया गया।