पंडित दिवाकर शास्त्री बोले- धर्म के मार्ग पर चलने से ही सभी का कल्याण संभव
जयपुर के विद्याधर नगर में श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिन कथावाचक दिवाकर शास्त्री ने ब्राह्मणों के कर्तव्य, पुरुषार्थ और शरणागति के महत्व पर प्रकाश डाला।
जयपुर के विद्याधर नगर स्थित नया खेड़ा में पुरुषोत्तम मास भागवत सेवा समिति द्वारा आयोजित श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिन व्यासपीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते कथावाचक पंडित दिवाकर शास्त्री।
। देश और प्रदेश में निरंतर बढ़ती समस्याओं के मूल कारणों पर गहरा प्रहार करते हुए प्रसिद्ध कथावाचक ज्ञानमूर्ति पंडित दिवाकर शास्त्री ने कहा है कि वर्तमान संकटों की मुख्य वजह यह है कि हमने जिन्हें धर्म का मुखिया बनाया, वे स्वयं अपने धर्म के मार्ग पर नहीं चल रहे हैं। जयपुर के विद्याधर नगर स्थित नया खेड़ा, गिरधर पार्क, कृष्णा कॉलोनी में पुरुषोत्तम मास भागवत सेवा समिति की ओर से आयोजित सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा के पांचवें दिन व्यासपीठ से श्रद्धालुओं को संबोधित करते हुए उन्होंने यह विचार व्यक्त किए। 1 से 7 जून तक दोपहर 2 बजे से सायं 6 बजे तक चलने वाली इस कथा के दौरान पूरा वातावरण वृंदावन भगवान, श्रीरामचंद्रजी, 'ओम पार्वती पतये नम: हर हर महादेव', 'जय जय श्रीराधे' और श्रीमद् भागवत महापुराण के गगनभेदी जयघोषों से पूरी तरह धर्ममय हो गया।
पंडित दिवाकर शास्त्री ने वास्तविक ब्राह्मण के छह अनिवार्य कर्मों और कर्तव्यों को रेखांकित करते हुए कहा कि वेद पढ़ना-पढ़ाना, यज्ञ करना-करवाना, तथा दान देना व लेना ही सत्कर्मी होना है। उन्होंने चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि आज हमारा कर्म हमसे दूर होता जा रहा है, जबकि समाज को दिशा देने, नेतृत्व करने और धर्म के मार्ग का पथ प्रदर्शक बनने का उत्तरदायित्व ब्राह्मणों को ही सौंपा गया था। यदि ये सभी धर्म पर पूरी तरह स्थित हो जाएं और धर्म का निष्ठापूर्वक पालन करें, तो चराचर जगत और सभी का कल्याण संभव है।
प्रवचन के दौरान शास्त्री ने पुरुषार्थ की महत्ता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष बेहद जरूरी हैं। इन चारों की प्राप्ति के बाद मनुष्य को संसार में किसी अन्य चीज की आवश्यकता नहीं रह जाती। भगवान श्रीकृष्ण का धरा पर जन्म भी इन्हीं चारों पुरुषार्थों की रक्षा के लिए हुआ था ताकि हर जीव को इसका लाभ मिल सके। उन्होंने गोस्वामी तुलसीदास जी की चौपाई का संदर्भ देते हुए कहा कि श्रीराम का अवतार ब्राह्मण, गाय, देवता और संत की रक्षा के साथ-साथ चारों वर्णों एवं प्रत्येक जीव पर असीम कृपा करने के लिए ही हुआ था।
कथा के प्रसंग को आगे बढ़ाते हुए पंडित शास्त्री ने ब्रज में छह महीने तक लगातार चले ऐतिहासिक नंदोत्सव का भावपूर्ण वर्णन किया। उन्होंने उल्लेख किया कि इस उत्सव के दौरान नंद बाबा ने दो लाख गायों के सींगों पर स्वर्ण मढ़कर दान किया था, जिसके बाद संपूर्ण ब्रजभूमि में कोई याचक यानी दान लेने वाला ही शेष नहीं बचा। इसके पीछे दो मुख्य कारण थे; पहला तो यह कि जिसे जो वस्तु चाहिए थी, उसे उतनी मात्रा में दान दे दिया गया, और दूसरा यह कि जितने भी ब्रजवासी थे, वे दान लेने से पूर्व कन्हैया का दर्शन करते थे। जब भक्त को साक्षात भगवान मिल जाएं और जीवात्मा का परमात्मा से साक्षात्कार हो जाए, तो मनुष्य के भीतर सांसारिक वस्तुओं को पाने की कोई इच्छा शेष नहीं रह जाती, वहीं से मन की समस्त कामनाएं पूर्ण हो जाती हैं।
पंडित दिवाकर शास्त्री ने भगवान के रामावतार एवं कृष्णावतार को सर्वश्रेष्ठ बताते हुए कहा कि रामावतार में प्रभु ने ताड़का का और कृष्णावतार में पूतना का वध कर लोक कल्याण किया। उन्होंने अंत में जीवात्मा के उद्धार का मार्ग बताते हुए कहा कि व्यक्ति गोविंद के समक्ष जैसा भी है, उसी रूप में सब कुछ त्यागकर पूर्णतः शरणागत बनकर यदि भगवान की शरण में चला जाए, तो उसके कई जन्मों के करोड़ों पाप तत्काल नष्ट हो जाते हैं। आध्यात्मिक चेतना को जागृत करने वाली यह कथा क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए अत्यंत कल्याणकारी सिद्ध हो रही है।