जयपुर: व्हाट्सएप स्पूफिंग से 6.8 करोड़ की ठगी, 4 गिरफ्तार
कंपनी के कंप्यूटर में सेंध लगाकर खातों से उड़ाए 6.8 करोड़ रुपये, पुलिस ने 3.5 करोड़ रुपये होल्ड कराए।
तस्वीर में जयपुर साइबर ठगी मामले के गिरफ्तार चार आरोपी पुलिस की गिरफ्त में दिख रहे हैं।
जयपुर में साइबर ठगी के एक बड़े मामले का खुलासा करते हुए राजस्थान पुलिस की स्टेट साइबर थाना पुलिस ने चार आरोपियों को गिरफ्तार किया है। आरोपियों ने कंपनी के कंप्यूटर सिस्टम में मौजूद तकनीकी खामी का फायदा उठाकर व्हाट्सऐप तक पहुंच बनाई और कंपनी के निदेशक की पहचान का इस्तेमाल कर अकाउंटेंट से 6 करोड़ 80 लाख रुपये तीन बैंक खातों में ट्रांसफर करवा लिए। पुलिस की त्वरित कार्रवाई से ठगी की रकम में से करीब 3 करोड़ 50 लाख रुपये विभिन्न खातों में होल्ड करवाए गए हैं और उन्हें वापस दिलाने की कार्रवाई की जा रही है।
महानिदेशक पुलिस श्री राजीव कुमार शर्मा के निर्देशानुसार चल रहे अभियान के तहत हुई इस कार्रवाई की जानकारी देते हुए अतिरिक्त महानिदेशक पुलिस साइबर अपराध श्री विजय कुमार सिंह ने बताया कि 25 अगस्त 2026 को जयपुर स्थित एक निजी कंपनी के अकाउंटेंट ने केंद्रीय साइबर अपराध पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी। रिपोर्ट के अनुसार 24 अगस्त को साइबर अपराधियों ने कंपनी के कंप्यूटर में पहले से मौजूद तकनीकी खामी का फायदा उठाकर व्हाट्सऐप तक पहुंच बनाई। इसके बाद कंपनी के निदेशक के नाम और प्रोफाइल फोटो का इस्तेमाल कर खाताधिकारी को व्हाट्सऐप संदेश भेजे गए और खुद को निदेशक बताते हुए तत्काल आरटीजीएस के माध्यम से भुगतान करने के निर्देश दिए गए।
जांच में सामने आया कि साइबर अपराधियों ने कंपनी के अकाउंटेंट के कंप्यूटर को निशाना बनाकर व्हाट्सऐप की संपर्क सूची में वास्तविक निदेशक के नंबर को हटाकर अपना नंबर उसी नाम और प्रोफाइल फोटो के साथ जोड़ दिया। इसके बाद निदेशक और अकाउंटेंट के बीच पहले हुई बातचीत की नकल तैयार की गई। इससे अकाउंटेंट को विश्वास हो गया कि वह कंपनी के निदेशक से ही बातचीत कर रहा है। साइबर ठगों के निर्देश पर कंपनी के खाते से कुल 6 करोड़ 80 लाख रुपये तीन बैंक खातों में स्थानांतरित कर दिए गए।
घटना की जानकारी मिलते ही केंद्रीय साइबर अपराध पुलिस और राष्ट्रीय साइबर अपराध हेल्पलाइन 1930 की टीम ने बैंकिंग लेन-देन पर तत्काल कार्रवाई शुरू की। संयुक्त प्रयासों से ठगी की कुल रकम में से करीब 3 करोड़ 50 लाख रुपये विभिन्न खातों में रुकवाए गए। पुलिस अब इन रकम को वापस दिलाने की कार्रवाई कर रही है।
पुलिस जांच में यह भी सामने आया कि गिरोह ठगी की रकम सीधे अपने बैंक खातों में रखने के बजाय दूसरे लोगों के खातों का इस्तेमाल करता था। ऐसे बैंक खाते उपलब्ध कराने वालों को कमीशन दिया जाता था। ठगी की रकम इन खातों में पहुंचने के बाद चेक, एटीएम, यूपीआई, नकद जमा मशीन, डिजिटल पर्स और अन्य बैंक खातों के जरिए कई स्तरों पर स्थानांतरित की जाती थी। इसके बाद रकम को यूएसडीटी जैसी आभासी मुद्रा में बदलकर विदेशों तक पहुंचाया जाता था। जांच में विदेश में बैठे गिरोह के मुख्य संचालकों के साथ संपर्क के संकेत भी मिले हैं।
आरोपियों द्वारा टेलीग्राम के विभिन्न समूहों के जरिए बैंक खाते, एटीएम, सिम और पासबुक की व्यवस्था की जाती थी। जांच में सामने आया कि एक बैंक खाते की किट के लिए करीब 10 से 15 हजार रुपये तक दिए जाते थे। इन खातों में ठगी की रकम मंगवाने के बाद उसे तत्काल दूसरे खातों या डिजिटल माध्यमों के जरिए आगे भेज दिया जाता था। प्रथम लाभार्थी तीन बैंक खातों से रकम आगे करीब 250 बैंक खातों में स्थानांतरित की गई। इस तरह रकम को अलग-अलग खातों में घुमाकर उसके वास्तविक स्रोत को छिपाने का प्रयास किया गया।
तकनीकी जांच, बैंकिंग लेन-देन और उपलब्ध अभिलेखों के आधार पर पुलिस ने चार आरोपियों मयंक कसौटिया व बृजमोहन द्रोण उर्फ लक्की निवासी जयपुर, समानाराम निवासी कुचामन, डीडवाना और मोहित यादव उर्फ मोती निवासी जिला सीकर को गिरफ्तार किया है।
जांच में मयंक कसौटिया द्वारा अपना बैंक खाता ठगी की रकम प्राप्त करने के लिए उपलब्ध कराने तथा रकम की निकासी कर अन्य आरोपियों तक पहुंचाने की भूमिका सामने आई है। बृजमोहन द्रोण उर्फ लक्की पर बैंक खातों की व्यवस्था करने, ठगी की रकम को आगे पहुंचाने तथा उसे आभासी मुद्रा में बदलने के लिए समन्वय करने का आरोप है। समानाराम की भूमिका आभासी मुद्रा से जुड़े लोगों से संपर्क कराने तथा रकम के हस्तांतरण में सामने आई है। वहीं मोहित यादव उर्फ मोती भी बैंक खातों की व्यवस्था, रकम की निकासी और उसे आगे पहुंचाने की गतिविधियों में शामिल पाया गया है।
जांच में साइबर ठगी के इस नेटवर्क के अंतरराष्ट्रीय कनेक्शन भी सामने आए हैं। बैंक से प्राप्त लेन-देन संबंधी इंटरनेट प्रोटोकॉल (आईपी) पतों के विश्लेषण में पाया गया कि ठगी की रकम म्यूल बैंक खातों में पहुंचने के बाद सिंगापुर और हांगकांग में बैठे गिरोह के मास्टरमाइंड द्वारा इंटरनेट बैंकिंग के माध्यम से विभिन्न बैंक खातों में स्थानांतरित की गई। इसके बाद रकम को कई स्तरों पर अलग-अलग खातों, क्यूआर कोड और डिजिटल माध्यमों से घुमाया गया।
पुलिस अब यह पता लगाने में जुटी है कि ठगी की रकम किन-किन खातों में पहुंची, इन खातों के संचालक कौन हैं और विदेश में बैठे गिरोह के मुख्य संचालकों से आरोपियों के क्या संबंध हैं। व्हाट्सऐप बातचीत, कॉल विवरण, मोबाइल उपयोग संबंधी तकनीकी अभिलेख, इंटरनेट संबंधी विवरण और बैंकिंग लेन-देन की पूरी धन-श्रृंखला का विश्लेषण किया जा रहा है। 250 से अधिक बैंक खातों की जांच के साथ नेटवर्क से जुड़े अन्य सदस्यों की तलाश भी जारी है।
उप महानिरीक्षक पुलिस साइबर अपराध शान्तनु कुमार सिंह के निर्देशन में केंद्रीय साइबर अपराध पुलिस स्टेशन, राजस्थान, जयपुर की टीम ने थानाधिकारी गजेन्द्र शर्मा, उप अधीक्षक पुलिस के नेतृत्व में यह कार्रवाई की। टीम में पुलिस निरीक्षक नीरज शर्मा, पुलिस निरीक्षक मुकेश कुमार वर्मा सहित केंद्रीय साइबर अपराध पुलिस स्टेशन और आर4सी के अधिकारी-कर्मचारी शामिल रहे। पुलिस की जांच अब ठगी की पूरी धन-श्रृंखला और विदेश में बैठे गिरोह के मुख्य संचालकों तक पहुंचने पर केंद्रित है।