जयपुर। दशलक्षण पर्व के द्वितीय दिवस गुरुवार को “उत्तम मार्दव धर्म” की आराधना श्रद्धा एवं भक्तिभाव के साथ की गई। श्रावक-श्राविकाओं ने विनम्रता और मृदुता का भाव धारण करते हुए अष्ट द्रव्यों से जिनेन्द्र प्रभु की पूजा-अर्चना की। इस अवसर पर शास्त्रों तथा विराजमान संतों और साध्वियों के माध्यम से उत्तम मार्दव धर्म के महत्व का अध्ययन एवं मनन किया गया।

अखिल भारतीय दिगम्बर जैन युवा एकता संघ के राष्ट्रीय अध्यक्ष अभिषेक जैन बिट्टू के अनुसार, “मृदोर्भावः कर्म वा मार्दवम्” अर्थात मानसिक कोमलता का नाम मार्दव है। विचारों में कोमलता और व्यवहार में नम्रता होना ही उत्तम मार्दव धर्म है। मार्दव धर्म की साधना के लिए जाति, कुल आदि के मद और अहंकार का त्याग आवश्यक है।

उन्होंने बताया कि ज्ञान, पूजा, कुल, जाति, बल, ऋद्धि, पद और शरीर इन आठ वस्तुओं का अभिमान नहीं करना ही मार्दव धर्म है। प्रत्येक मनुष्य के भीतर यह इच्छा रहती है कि लोग उसे अच्छा इंसान कहें, उसका सम्मान करें और उसकी प्रशंसा करें। अपने ज्ञान, कला, वैभव अथवा उपलब्धियों को दूसरों से श्रेष्ठ समझने का भाव मान कषाय को जन्म देता है। इसी कारण व्यक्ति स्वयं झुकने के बजाय दूसरों को झुकाने का प्रयास करता है।

अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि “मृदुता का भाव उत्तम मार्दव धर्म है।” यह मान कषाय का नाश करता है, विनय का भाव सिखाता है और ज्ञान प्राप्त करने की योग्यता को बढ़ाता है। भगवान के आगे डुलने वाले चंवर भी महत्वपूर्ण संदेश देते हैं—“हम झुकते हैं, ऊपर उठते हैं।” अर्थात जो जितना झुकेगा, वह उतना ही ऊपर उठेगा।

उन्होंने कहा कि अधिकांश समय हमारा प्रयास दूसरों को झुकाने में लगा रहता है, जबकि यदि हम स्वयं थोड़ा झुक जाएं तो सामने वाला भी विनम्र हो सकता है। “झुकता तो वही है जिसमें जान होती है, वरना अकड़ तो मुर्दे की पहचान होती है।” इसलिए जीवन में अहंकार के स्थान पर विनय और मृदुता को अपनाना आवश्यक है। जैन दर्शन में मार्दव धर्म केवल व्यवहार की विनम्रता नहीं, बल्कि अंतरात्मा से मान और अहंकार को समाप्त करने की साधना है। गुरु के चरणों में विनयपूर्वक रहकर शिष्य ज्ञान प्राप्त कर सकता है, लेकिन अहंकार के साथ ज्ञान प्राप्त करना संभव नहीं।

अभिषेक जैन बिट्टू ने कहा कि भगवान महावीर की वाणी का मूल संदेश आत्मशुद्धि, संयम और कषायों पर विजय प्राप्त करना है। उत्तम मार्दव धर्म सिखाता है कि ज्ञान, पद, प्रतिष्ठा, धन, शक्ति अथवा किसी भी उपलब्धि का अहंकार नहीं करना चाहिए। विनय ही ज्ञान और आत्मिक उन्नति का आधार है। अतः दशलक्षण पर्व के दूसरे दिन मान-कषाय का त्याग कर उत्तम मार्दव धर्म को जीवन में धारण करने का संकल्प लेना चाहिए।

गुरुवार को जैन धर्म की सर्वोच्च साध्वी गणिनी आर्यिका सुपार्श्वमती माताजी का आर्यिका दीक्षा दिवस भी श्रद्धा-भक्ति के साथ मनाया गया और अष्ट द्रव्यों के साथ गुरु पूजन किया गया। शुक्रवार को दशलक्षण पर्व का तीसरा दिवस उत्तम आर्जव दिवस पर्व मनाया जाएगा।

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