भारत में बच्चों में बढ़ता मोटापा: एक्सपर्ट्स ने बताए बचाव के तरीके
स्कूलों में खानपान, नींद और शारीरिक गतिविधियों में बदलाव कर बच्चों को डायबिटीज जैसी गंभीर बीमारियों के खतरे से बचाया जा सकता है।
तस्वीर में एक बच्चा खाने की मेज पर जंक फूड और सलाद के सामने बैठा दिख रहा है।
भारत में बच्चों का बढ़ता वजन और मोटापा बड़ी स्वास्थ्य समस्या बनता जा रहा है। एक्सपर्ट्स का कहना है कि इसे रोकने की कोशिश सिर्फ अस्पताल या क्लीनिक तक सीमित नहीं होनी चाहिए। स्कूल की क्लास, कैंटीन, खेल के मैदान और घर, सभी जगह खानपान और शारीरिक गतिविधियों पर ध्यान देने की जरूरत है।
बच्चे अपने दिन का काफी समय स्कूल में बिताते हैं। ऐसे में स्कूल उनकी खाने-पीने की आदतों, खेलकूद और सेहत से जुड़ी अच्छी आदतें बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, बचपन में बनी आदतें आगे चलकर लंबे समय तक बनी रह सकती हैं।
सीताराम भरतिया इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड रिसर्च में पीडियाट्रिक इंटेंसिव केयर के कंसल्टेंट डॉ. अनिर्बान मंडल ने कहा कि बीमारियों से बचाव वाली हेल्थकेयर में स्कूलों की भूमिका हमारी पारंपरिक सोच से कहीं ज्यादा बड़ी है। उन्होंने कहा, "चूंकि बच्चे अपने विकास के वर्षों का एक बड़ा हिस्सा क्लासरूम में बिताते हैं, इसलिए वहां बनने वाले लाइफस्टाइल पैटर्न - जैसे खाने-पीने की पसंद, कम शारीरिक गतिविधि वाली आदतें और न्यूट्रिशन की समझ - सीधे तौर पर उनकी जीवन भर की मेटाबोलिक सेहत को आकार देते हैं।"
हालांकि, बच्चों के डॉक्टरों ने चेतावनी दी है कि ऐसे उपाय कभी भी सख्त डाइटिंग या वजन को लेकर शर्मिंदा करने (वेट स्टिग्मा) पर आधारित नहीं होने चाहिए, क्योंकि इससे बच्चे के मानसिक विकास को गंभीर नुकसान पहुंच सकता है। डॉ. मंडल ने जोर देते हुए कहा, "हमारा क्लिनिकल लक्ष्य कभी भी बढ़ते बच्चों में वजन को लेकर जुनून या शरीर को लेकर चिंता पैदा करना नहीं होता है। इसके बजाय, हमारा ध्यान पूरी तरह से स्वस्थ शारीरिक विकास, संतुलित पोषण, अच्छी नींद और रोजाना खुशी-खुशी शारीरिक गतिविधि करने को बढ़ावा देने पर होना चाहिए।"
स्कूल बच्चों के लिए ज्यादा प्रोसेस्ड फूड की जगह पोषक खाना उपलब्ध करा सकते हैं। चीनी, नमक और अनहेल्दी फैट वाली चीजों की मात्रा कम करने के साथ रोजाना शारीरिक गतिविधि पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। पढ़ाई के साथ बच्चों को उनकी उम्र के हिसाब से हेल्थ और वेलनेस की जानकारी भी दी जा सकती है, ताकि वे छोटी उम्र से ही स्वस्थ आदतें अपना सकें।
एम्स दिल्ली के पीडियाट्रिक्स विभाग के प्रमुख डॉ. पंकज हरि के अनुसार, बच्चों में मोटापे को यह सोचकर नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि उम्र बढ़ने के साथ यह समस्या अपने आप ठीक हो जाएगी। बचपन में ज्यादा वजन होने से इंसुलिन रेजिस्टेंस, असामान्य लिपिड लेवल, फैटी लिवर और हाई ब्लड प्रेशर जैसी समस्याएं हो सकती हैं। आगे चलकर इससे डायबिटीज और दिल की बीमारियों का खतरा बढ़ सकता है। डॉ. हरि ने कहा कि बचाव के उपाय बच्चे के बड़े होने का इंतजार किए बिना स्कूल के दिनों से ही शुरू किए जाने चाहिए।
वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2026 के अनुसार, भारत में करीब 4.1 करोड़ बच्चे ओवरवेट या मोटापे से प्रभावित हैं। वर्ष 2025 में भारत में 5-9 साल की उम्र के करीब 1.49 करोड़ बच्चे ओवरवेट या मोटापे से प्रभावित होने का अनुमान था। इसी तरह 10-19 साल की उम्र के 2.64 करोड़ से ज्यादा किशोरों के ओवरवेट या मोटापे से प्रभावित होने का अनुमान लगाया गया था।
इस समस्या को देखते हुए ICMR-NIN के नेतृत्व में तैयार पॉलिसी फ्रेमवर्क में बच्चों के लिए हेल्दी फूड एनवायरनमेंट बनाने के सुझाव दिए गए हैं। इसमें स्कूल कैंटीन, अनहेल्दी फूड की उपलब्धता और बच्चों को टारगेट करने वाली फूड मार्केटिंग से जुड़े कदम शामिल हैं।
एक्सपर्ट्स ने ओवरवेट या मोटापे से जूझ रहे बच्चों का मजाक उड़ाने या उन्हें शर्मिंदा करने से बचने की सलाह दी है। इससे उनकी मेंटल हेल्थ प्रभावित हो सकती है और वे खेलकूद जैसी गतिविधियों से भी दूर हो सकते हैं।
सीताराम भरतिया इंस्टीट्यूट ऑफ साइंस एंड रिसर्च की सीनियर कंसल्टेंट डॉ. नेहा जोशी के मुताबिक, स्कूल माता-पिता या डॉक्टरों की जगह नहीं ले सकते, लेकिन दोनों के बीच अहम कड़ी का काम कर सकते हैं। बच्चों को खानपान, फिटनेस, नींद और बीमारियों से बचाव के बारे में सही जानकारी देना जरूरी है। इससे वे आगे चलकर अपनी सेहत से जुड़े बेहतर फैसले ले सकेंगे।
एम्स दिल्ली की पीडियाट्रिक एंडोक्रिनोलॉजी डिवीजन की प्रोफेसर डॉ. रजनी शर्मा ने कहा कि हेल्थ और एजुकेशन को अलग-अलग नहीं देखा जाना चाहिए। स्कूलों में ऐसा माहौल बनाने की जरूरत है, जहां बच्चों के लिए हेल्दी विकल्प चुनना आसान हो। कैंटीन में पौष्टिक खाना उपलब्ध कराने और जंक फूड से दूरी बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए। बच्चों को घर से हेल्दी टिफिन लाने के लिए भी प्रोत्साहित किया जा सकता है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, हेल्दी खाना स्वादिष्ट तरीके से भी तैयार किया जा सकता है।
विशेषज्ञों ने नींद और कम स्क्रीन टाइम पर भी जोर दिया है। उन्होंने बताया कि कई वैज्ञानिक अध्ययनों में यह पाया गया है कि नियमित शारीरिक गतिविधि और व्यायाम, जैसे दौड़ना, से एकाग्रता बढ़ती है और पढ़ाई-लिखाई में बेहतर प्रदर्शन होता है। ऊंची कक्षाओं में भी, जहां आमतौर पर पढ़ाई-लिखाई पर ज्यादा ध्यान दिया जाता है, शारीरिक गतिविधि को स्कूल की दिनचर्या का हिस्सा बनाया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा, "शारीरिक गतिविधि को सिर्फ प्रतिस्पर्धी खेलों तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए। पैदल चलना, साइकिल चलाना, आउटडोर गेम्स और एक्टिव खेल - ये सभी हेल्दी दिनचर्या में योगदान दे सकते हैं।" उन्होंने यह भी कहा कि मेटाबोलिक हेल्थ बनाए रखने के लिए पर्याप्त नींद लेना भी उतना ही जरूरी है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि स्कूल बच्चों की शुरुआती उम्र में ही उनकी आदतें बनाने में अहम भूमिका निभा सकते हैं। इसके लिए वे हेल्दी खान-पान, नियमित शारीरिक गतिविधि, पर्याप्त नींद और कम स्क्रीन टाइम को बच्चों की रोजमर्रा की दिनचर्या में शामिल कर सकते हैं।