तस्वीर में बाएं से दाएं कशिश चौहान, मानव दास और रोनिक बिस्वास नजर आ रहे हैं, जिन्हें तकनीकी शिक्षा के लिए स्कॉलरशिप मिली है।

देहरादून, अगस्त 2026। उत्तराखंड के सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले तीन छात्रों रोनिक बिस्वास, मानव दास और कशिश चौहान के लिए उच्च शिक्षा और नई तकनीकी स्किल सीखने के रास्ते खुल गए हैं। रोनिक बिस्वास और मानव दास को प्लाक्षा यूनिवर्सिटी के यंग टेक्नोलॉजी स्कॉलर्स (वाईटीएस+) प्रोग्राम के रोबोटिक्स ट्रैक के लिए 100 प्रतिशत स्कॉलरशिप मिली है, जबकि कशिश चौहान का हिमाचल प्रदेश की इटरनल यूनिवर्सिटी में नवगुरुकुल के रेजिडेंशियल बीसीए प्रोग्राम के लिए 90 प्रतिशत स्कॉलरशिप पर चयन हुआ है।

वाईटीएस+ कक्षा 9 से 12 तक के हाई स्कूल छात्रों के लिए दो सप्ताह का रेसिडेंशियल समर प्रोग्राम है। इसका उद्देश्य टेक्नोलॉजी और उसके वास्तविक जीवन में इस्तेमाल को समझने में रुचि रखने वाले छात्रों को प्रैक्टिकल अनुभव देना है। प्रोग्राम में रोबोटिक्स, डेटा साइंस और बायोलॉजी + टेक्नोलॉजी जैसे नए क्षेत्रों को प्रैक्टिकल प्रोजेक्ट्स के जरिए समझने का अवसर मिलता है। छात्र फैकल्टी और इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स से मार्गदर्शन लेते हैं और कैंपस में साथ रहकर अलग-अलग विषयों को जोड़कर सीखते हैं।

वाईटीएस+ में छात्र केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं रहते, बल्कि खुद काम करके सीखते हैं, नए आइडिया आजमाते हैं और एक्सपर्ट मेंटर्स की मदद से अलग-अलग समस्याओं के समाधान खोजते हैं। खास तौर पर रोबोटिक्स ट्रैक में छात्र मशीन, प्रोग्रामिंग और इलेक्ट्रॉनिक्स को एक साथ इस्तेमाल कर वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान तैयार करना सीखते हैं। इसमें प्रयोग करने, प्रोटोटाइप तैयार करने और प्रैक्टिकल तरीके से सीखने पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

वहीं, नवगुरुकुल हिमाचल प्रदेश की इटरनल यूनिवर्सिटी में तीन साल का रेसिडेंशियल, यूजीसी से मान्यता प्राप्त बीसीए डिग्री प्रोग्राम संचालित करता है। इसमें प्रैक्टिकल टेक्नोलॉजी स्किल्स, साथियों के साथ मिलकर सीखने, इंटर्नशिप और करियर की तैयारी पर ध्यान दिया जाता है। स्कॉलरशिप के तहत चयनित छात्रों को केवल एक बार 23,500 रुपये फीस देनी होती है। इसके बाद बाकी कोर्स फीस, रहने की सुविधा, खाना, लैपटॉप, पढ़ाई से जुड़ी सामग्री, मेंटरशिप और प्लेसमेंट में मदद का पूरा खर्च कवर किया जाता है।

यह अवसर 16.5 साल या उससे अधिक उम्र की उन छात्राओं के लिए है, जिन्होंने किसी भी स्ट्रीम से कक्षा 12वीं पास की है और जिनके परिवार की सालाना आय 5 लाख रुपये से कम है।

इन छात्रों का चयन कौशलम में उनकी भागीदारी के बाद हुआ। कौशलम उत्तराखंड सरकार की एक उद्यमिता पहल है, जिसे उद्यम लर्निंग फाउंडेशन के साथ मिलकर चलाया गया। इसके माध्यम से स्कूल के छात्रों को प्रैक्टिकल गतिविधियों के जरिए समस्याओं को समझने और उनका समाधान खोजने, नई सोच विकसित करने और शुरुआत से ही इनोवेशन की समझ बनाने का अवसर दिया गया।

कौशलम ऐसे छात्रों की पहचान करने का शुरुआती माध्यम भी बना, जिनमें सीखने की मजबूत इच्छा और जिज्ञासा दिखाई दी। इसके बाद छात्रों को उत्तराखंड, हरियाणा और पंजाब में वाईटीएस+ जैसे अवसरों और नवगुरुकुल के स्कॉलरशिप प्रोग्राम से जोड़ा गया। कौशलम से इन अगले अवसरों तक छात्रों का सफर यह दर्शाता है कि स्कूल में विकसित हुई उद्यमिता और नई सोच को आगे की पढ़ाई, मेंटरशिप और नए क्षेत्रों व करियर के अवसरों से जोड़ने के लिए लगातार नए मौके उपलब्ध कराए जा रहे हैं।

रोनिक बिस्वास की इलेक्ट्रॉनिक्स में रुचि बचपन से रही है। वह अपने चाचा की इलेक्ट्रॉनिक्स की दुकान देखकर इस क्षेत्र के बारे में जानने लगा। बाद में उसके बड़े भाई ने भी उसे प्रेरित किया, जो आर्डुइनो और ईएसपी बोर्ड की मदद से रोबोट बनाते हैं और आईआईटी कानपुर के अटल इनोवेशन प्रोग्राम के लिए चुने जा चुके हैं।

इसी माहौल से प्रेरित होकर रोनिक ने अपने शिक्षक और परिवार की मदद से प्रोग्रामिंग और रोबोटिक्स सीखना शुरू किया। इसके बाद उसने वेस्ट मैनेजमेंट मॉडल के साथ राष्ट्रीय बाल वैज्ञानिक प्रदर्शनी में भी हिस्सा लिया। अब वह वाईटीएस+ प्रोग्राम के जरिए अपने काम को आगे बढ़ाते हुए वेस्ट मैनेजमेंट सिस्टम के लिए रोबोटिक्स आधारित समाधान तैयार करना चाहता है।

अपने चयन पर रोनिक बिस्वास ने कहा, "मुझे हमेशा यह जानने में रुचि रही है कि इलेक्ट्रॉनिक्स और रोबोटिक्स की मदद से रोजमर्रा की समस्याओं का समाधान कैसे किया जा सकता है। वाईटीएस+ के जरिए मैं एक्सपर्ट्स से सीखने, अपने वेस्ट मैनेजमेंट प्रोजेक्ट को बेहतर बनाने और यह समझने के लिए उत्साहित हूँ कि टेक्नोलॉजी किस तरह लोगों के लिए उपयोगी बदलाव ला सकती है।"

मानव दास की रोबोटिक्स में रुचि कक्षा 7 में शुरू हुई, जब उसने स्कूल की साइंस प्रदर्शनी में अपने भाई को एक छोटी रोबोटिक कार बनाते देखा। इसके बाद उसने खुद भी स्कूल की प्रदर्शनी में हिस्सा लिया। इससे प्रयोग करके सीखने और किसी समस्या का समाधान एक तय तरीके से खोजने की उसकी समझ बेहतर हुई।

अब कक्षा 10 में पढ़ रहे मानव का ध्यान रोबोटिक्स और एआई की मदद से वास्तविक जीवन की समस्याओं को हल करने पर है। खास तौर पर उसकी रुचि खेती में रोबोटिक्स और एआई के इस्तेमाल को लेकर है। वह ऐसी प्रैक्टिकल मशीनें बनाना चाहता है, जो किसानों की मदद कर सकें और खेती से जुड़े काम को आसान और बेहतर बना सकें।

मानव दास ने कहा, "मैं एआई और रोबोटिक्स के बारे में और सीखना चाहता हूँ और यह समझना चाहता हूँ कि इन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल असल जिंदगी की समस्याओं को हल करने में कैसे किया जा सकता है। मेरी खास रुचि ऐसे समाधान तैयार करने में है, जो किसानों की मदद कर सकें और रोजमर्रा के काम को ज्यादा आसान और बेहतर बना सकें।"

कशिश चौहान ने देहरादून के बारवाला स्थित के.एस.आर.पी.जी.आई.सी. से कक्षा 12वीं की पढ़ाई पूरी की है। वह हमेशा मानती थी कि करियर का मतलब कॉलेज की पढ़ाई पूरी करने के बाद नौकरी ढूंढना ही है। उसे स्कूल के बाद उपलब्ध अलग-अलग विकल्पों और अपनी रुचि के हिसाब से सही रास्ता चुनने की ज्यादा जानकारी नहीं थी।

कौशलम के जरिए उसे नवगुरुकुल के इटरनल यूनिवर्सिटी बीसीए प्रोग्राम के बारे में पता चला। कंप्यूटर और टेक्नोलॉजी में पहले से रुचि होने के कारण उसने आवेदन किया और 90 प्रतिशत स्कॉलरशिप के साथ उसका चयन हो गया। इस स्कॉलरशिप में उसकी तीन साल की डिग्री के साथ हॉस्टल का खर्च भी शामिल है।

अपने चयन पर कशिश चौहान ने कहा, "सरकारी स्कूल की छात्रा होने के नाते मुझे लगता था कि मेरा भविष्य बस पढ़ाई पूरी करने, ग्रेजुएशन करने और किसी तरह नौकरी ढूंढने तक ही सीमित है। कौशलम प्रोग्राम के जरिए मुझे नवगुरुकुल के इटरनल यूनिवर्सिटी बीसीए प्रोग्राम के बारे में पता चला। कंप्यूटर और टेक्नोलॉजी में मेरी पहले से रुचि थी, इसलिए मैंने आवेदन किया और मेरा चयन हो गया। जिस दिन मेरा चयन हुआ, वह दिन मैं हमेशा याद रखूँगी। उस दिन मुझे एहसास हुआ कि मैं वह भी हासिल कर सकती हूँ, जिसके बारे में मैंने कभी सोचा तक नहीं था। आज जब मैं बीसीए की पढ़ाई शुरू कर रही हूँ, तो प्रोग्रामिंग सीखने, नई तकनीकी स्किल्स विकसित करने और आईटी इंडस्ट्री में अपना करियर बनाने को लेकर बहुत उत्साहित हूँ।"

प्लाक्षा यूनिवर्सिटी के प्रो वाइस चांसलर अरविंद अग्रवाल ने छात्रों की मेजबानी के अनुभव के बारे में कहा, "उद्यम लर्निंग फाउंडेशन के छह प्रतिभाशाली छात्रों की प्लाक्षा के यंग टेक स्कॉलर्स (वाईटीएस+) प्रोग्राम में मेजबानी करना हमारे लिए खुशी की बात रही। उन्होंने हर ट्रैक में अपनी ऊर्जा, जिज्ञासा और उत्साह दिखाया। छात्रों ने रोबोटिक नारियल पेड़ पर चढ़ने वाली मशीन और स्मार्ट वेस्ट सेग्रीगेशन सिस्टम जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम किया। इसके साथ ही उन्होंने शैवाल आधारित इमारत के बाहरी हिस्से से जुड़े प्रोजेक्ट पर काम किया और मिट्टी में पाए जाने वाले सूक्ष्म जीवों पर रिसर्च की। सीखने की उनकी इच्छा ने पूरे ग्रुप के अनुभव को और बेहतर बनाया। हमने उन्हें आत्मविश्वास के साथ आगे बढ़ते, नए सवाल पूछते और इंजीनियरिंग व साइंस में अपने भविष्य को लेकर ज्यादा स्पष्ट होते देखा। हमें उनकी उपलब्धियों पर गर्व है और आने वाले वर्षों में उद्यम के ऐसे कई और छात्रों का स्वागत करने की उम्मीद है।"

नवगुरुकुल की पार्टनरशिप्स एंड ग्रोथ मैनेजर सुगथा बालगोपालन ने कहा, "उद्यम लर्निंग फाउंडेशन की युवाओं को सोच-समझकर करियर चुनने और प्रैक्टिकल तरीके से सीखने के जरिए आगे बढ़ाने की कोशिश, नवगुरुकुल के उस उद्देश्य से काफी मेल खाती है, जिसमें हम अच्छी शिक्षा और बेहतर करियर के अवसरों तक पहुँच स्थापित करने के मार्ग प्रशस्त करते हैं। छात्रों से जुड़ने के पूरे कार्यक्रम के दौरान उद्यम की टीम ने जिस तरह उनके साथ बातचीत की, उससे उच्च शिक्षा को लेकर कई जरूरी और उपयोगी बातें सामने आईं। हमारी स्कॉलरशिप वाले बीसीए प्रोग्राम के जरिए हम उन युवा छात्राओं के लिए अच्छी उच्च शिक्षा को आसान बनाना चाहते हैं, जिन्हें आमतौर पर ऐसे अवसर कम मिल पाते हैं। कई बार पैसों की कमी उनकी आगे बढ़ने की राह में बड़ी रुकावट बन जाती है। इस रुकावट को दूर करने की कोशिश में उद्यम लर्निंग फाउंडेशन का साथ हमारे लिए बहुत महत्वपूर्ण है। हम इस साझेदारी को आगे भी जारी रखना चाहते हैं, ताकि ज्यादा से ज्यादा युवा छात्राओं को ऐसे मौके मिल सकें, जो उनके भविष्य को बेहतर बनाने में मदद करें।"

इस मौके पर उद्यम लर्निंग फाउंडेशन के संस्थापक और सीईओ मेकिन माहेश्वरी ने कहा, "असल जिंदगी से जुड़े सीखने के मौकों से छात्रों को सिर्फ जरूरी क्षमता ही नहीं मिलती, बल्कि उन्हें यह समझने में भी मदद मिलती है कि वे टेक्नोलॉजी और समस्याओं को हल करने के क्षेत्र में किस तरह आगे बढ़ना चाहते हैं। इससे उनमें खुद कुछ बनाने, प्रयोग करने और अपने आइडिया को असल समस्याओं पर आजमाने की सोच विकसित होती है। ऐसे प्रोग्राम इसलिए भी जरूरी हैं, क्योंकि इनके जरिए छात्रों के सामने आगे बढ़ने के ज्यादा रास्ते खुलते हैं और उन्हें अपनी रुचि के हिसाब से अलग-अलग विकल्पों को समझने का मौका मिलता है।"

इन तीनों छात्रों का चयन छात्रों को प्रैक्टिकल तरीके से सीखने, मेंटरशिप और शुरुआत से ही समस्याओं का समाधान करने के अनुभव के जरिए नई और भविष्य से जुड़ी पढ़ाई व स्किल सीखने के ज्यादा अवसर देने की बड़ी कोशिश का हिस्सा है। चाहे यह अवसर रेसिडेंशियल यूनिवर्सिटी प्रोग्राम के जरिए मिले या स्कॉलरशिप के साथ डिग्री प्रोग्राम के जरिए, ऐसे मौके छात्रों को अपनी रुचि समझने और आगे की पढ़ाई व करियर के लिए बेहतर तैयारी करने में मदद करते हैं।