तस्वीर में संत श्री दिग्विजय राम जी महाराज रामद्वारा में शिवपुराण कथा के दौरान प्रवचन देते हुए नजर आ रहे हैं।

चित्तौड़गढ़ के बड़ी सादड़ी स्थित रामद्वारा में आयोजित शिवपुराण कथा के दौरान श्रद्धेय संत श्री दिग्विजय राम जी महाराज ने धर्म, सेवा, दान, सदाचार और नाम-स्मरण के महत्व पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कहा कि प्रकृति सदा निस्वार्थ भाव से समस्त जीवों का पालन-पोषण करती है। उन्होंने कहा कि सूर्य बिना किसी भेदभाव के प्रकाश देता है, नदियाँ निरंतर जल प्रदान करती हैं और वृक्ष अपने फल, फूल तथा छाया से सभी का कल्याण करते हैं। इसलिए मनुष्य को भी प्रकृति से प्रेरणा लेकर सेवा, त्याग और परोपकार का मार्ग अपनाना चाहिए।

संत श्री दिग्विजय राम जी महाराज ने कहा कि धर्म ही मनुष्य के जीवन का वास्तविक आधार है। धर्म से अर्थ की प्राप्ति होती है, लेकिन केवल अर्थ के माध्यम से धर्म की प्राप्ति नहीं हो सकती। उन्होंने कहा कि जब मनुष्य अपने परिश्रम से अर्जित धन का एक भाग धर्म और समाज के कल्याण के लिए समर्पित करता है, तब उसके जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का मार्ग प्रशस्त होता है।

उन्होंने कहा कि तन की शुद्धि सेवा से, मन की शुद्धि ध्यान से और धन की शुद्धि दान से होती है। सत्संग, दर्शन, नाम-स्मरण और ध्यान के माध्यम से मनुष्य अपने भीतर मौजूद काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार जैसे विकारों पर विजय प्राप्त कर सकता है।

कथा के दौरान संत श्री ने कहा कि तीर्थ क्षेत्रों में किया गया अल्प पुण्य भी अनेक गुना अधिक फल प्रदान करता है। उन्होंने कहा कि भोग-विलास मनुष्य को विकारों की ओर ले जाता है, जबकि संयम, सदाचार और सत्कर्म आत्मकल्याण का मार्ग प्रशस्त करते हैं।






 


उन्होंने कहा कि सतयुग में ध्यान, त्रेतायुग में तप, द्वापर युग में यज्ञ और कलियुग में भक्ति को विशेष महत्व दिया गया है। कलियुग में भगवान के नाम का स्मरण ही सबसे सरल और प्रभावशाली साधन है। श्रवण, कीर्तन और मनन को भक्ति का आधार बताते हुए उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रभु के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश दिया।

संत श्री दिग्विजय राम जी महाराज ने कहा कि सेवा करते समय मन में अहंकार का भाव नहीं होना चाहिए। जिस प्रकार परमात्मा और प्रकृति निस्वार्थ भाव से संपूर्ण सृष्टि का पालन करते हैं, उसी प्रकार मनुष्य को भी निष्काम भाव से समाज की सेवा करनी चाहिए।

कथा के अंत में उन्होंने कहा कि संसार की समस्त वस्तुएँ यहीं रह जाती हैं, लेकिन प्रभु का नाम सदैव मनुष्य के साथ रहता है। इसलिए प्रत्येक व्यक्ति को अपने जीवन में धर्म, सेवा, दान, सदाचार और भक्ति को सर्वोच्च स्थान देना चाहिए। शिवपुराण कथा के समापन पर पूरे रामद्वारा परिसर में श्रद्धा, भक्ति और आध्यात्मिक उल्लास का वातावरण बना रहा।

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