तस्वीर में निकुंभ स्थित समता भवन के प्रवेश द्वार पर लोग उपस्थित दिखाई दे रहे हैं।

निकुंभ। निकुंभ कस्बे के समता भवन में चातुर्मास के निमित्त चल रही नियमित प्रवचन श्रृंखला में शासन दीपक निश्छल मुनि मसा आदि ठाणा-2 ने श्रावकों को मानव धर्म, संयम और पुण्य की आराधना का महत्व बताया। उन्होंने कहा कि जीवन में विभिन्न दुखों के आगमन से पहले समय रहते मानव धर्म के उच्च प्रतिष्ठित आचरण और उसकी संयमशील शिक्षाओं को स्वीकार कर लेना चाहिए। धर्म मनुष्य को सहनशक्ति देता है।

मुनिश्री ने कहा कि हमेशा सुख और पुण्य धर्म के अधीन रहता है। मानव को अपने पुण्य समाप्त होने से पहले धर्म की गहन आराधना कर लेनी चाहिए। उन्होंने मानव धर्म क्यों जरूरी है और यह धर्म मनुष्य को क्या देगा, इस विषय पर भी विचार रखे।

प्रवचन के दौरान विभिन्न प्रसंगों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि ज्ञानी जिस सुख को दुख तथा अज्ञानी जिस दुख को सुख मानता है, वह विवेक की कमी के कारण होता है। उन्होंने सुख के दो प्रकार बताते हुए मानसिक और शारीरिक सुख की विस्तार से व्याख्या की। उन्होंने कहा कि मानव जीवन में सुख को सहन करना दुख से भी कठिन है। जो सुख को सहन करना सीख गया, उसके जीवन में दुखों का आगमन कभी नहीं होता है।

मुनिश्री ने कहा कि हर परिस्थिति में संयम का आचरण करना तथा विवेकपूर्वक जीवन में दुखों को सामने रखकर सुख भोगना ही सारगर्भित जीवन की परिभाषा है। मानव धर्म जो शक्ति दे सकता है, वह कभी भी धन नहीं दे सकता। धर्म पुण्य के मार्ग को सहज और सरल बनाता है। इसी मार्ग पर चलकर मानव अपने जीवन को सार्थक कर सकता है।

उन्होंने कहा कि अनावश्यक पाप से बचकर जीव हिंसा को रोकना ही सच्चा मानव धर्म है। जीवन में मानव सत्ता पाकर ऊंचा उठना चाहता है या फिर सत्य अपना कर ऊंचा उठना चाहता है, जीवन का सही मार्ग चुनना मानव का अपना विषय है।

इस अवसर पर सनातन श्रावक प्रेम सिंह सिसोदिया ने मानव जीवन में सत्कर्म संचय एवं परोपकार की भावना के साथ परायी निंदा के त्याग के बारे में अपने विचार व्यक्त किए। अतिथियों का स्वागत एवं आभार साधुमार्गी जैन संघ ने जताया।

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