जियाखेड़ी में दुर्गाष्टमी पर अनूठी आस्था: एक क्विंटल देशी घी से हवन, सौ साल पुरानी परंपरा कायम
दुर्गाष्टमी पर ग्रामीणों ने मवेशियों की रक्षा और मनोकामना पूरी होने पर 100 वर्ष पुरानी परंपरा निभाते हुए देशी घी से आहुतियां दीं।
बड़ीसादड़ी उपखंड के जियाखेड़ी गांव स्थित चामुंडा माता मंदिर में दुर्गाष्टमी पर आयोजित हवन में पुजारी विधि-विधान से आहुतियां प्रदान करते हुए।
बड़ीसादड़ी उपखंड के जियाखेड़ी गांव में दुर्गाष्टमी पर चामुंडा माता मंदिर में आस्था का अनूठा नजारा देखने को मिला। यहां श्रद्धालुओं ने एक क्विंटल से अधिक देशी घी से करीब तीन घंटे तक हवन कर माता के प्रति अपनी श्रद्धा अर्पित की। हवन में समर्पित घी का मूल्य एक लाख रुपए से अधिक बताया गया। खास बात यह रही कि हवन के लिए घी बाजार से नहीं खरीदा गया, बल्कि घरों में दही बिलोकर तैयार किया गया था। मां के जयकारों और भजनों से मंदिर परिसर देर रात तक गूंजता रहा। हवन के दौरान पुजारी सूरजमल व्यास आहुतियां देते हुए पसीने से तरबतर हो गए।
ग्रामीण लक्ष्मीलाल व्यास ने बताया कि गांव में मवेशियों के दुधारू होने और मनोकामना पूर्ण होने पर श्रद्धालु स्वेच्छा से चामुंडा माता के दरबार में देशी घी अर्पित करते हैं। इसी परंपरा के तहत दुर्गाष्टमी पर बड़ी संख्या में श्रद्धालु घी लेकर मंदिर पहुंचे। जियाखेड़ी के साथ अमरपुरा, किशनकरेरी, विनायका, सारंगपुरा, बोहेड़ा, इंटाली, बड़वल, सुवाखेड़ा और खेड़ली सहित विभिन्न गांवों से बहन-बेटियां भी घी लेकर माता के दरबार में पहुंचीं।
ग्रामीणों के अनुसार, चामुंडा माता मंदिर में हवन की परंपरा सौ वर्ष से अधिक पुरानी है। 88 वर्षीय देवकिशन व्यास और 86 वर्षीय दलीचंद गायरी ने बताया कि करीब सौ साल पहले गांव में महामारी फैलने के दौरान माता ने ग्रामीणों की रक्षा की थी। इसके बाद लोगों की माता के प्रति आस्था और गहरी हो गई। तभी से मनोकामना पूर्ण होने पर घी अर्पित कर हवन करने की परंपरा निरंतर निभाई जा रही है। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी ग्रामीणों की अटूट श्रद्धा का प्रतीक बनी हुई है।
हवन के दौरान पंडित सूरजमल व्यास ने विधि-विधान से आहुतियां दिलाईं। महिलाएं भजनों में लीन रहीं, जबकि पुरुषों ने जयकारों से वातावरण को भक्तिमय बनाए रखा। गवरी कलाकार भंवरलाल भील और सुखलाल भील ने थाली व मांदल पर मनमोहक थाप देकर श्रद्धालुओं को भक्तिरस में सराबोर कर दिया। गांव के कलाकार एवं पूर्व उपसरपंच चंपालाल गायरी, नानालाल व्यास, राधेश्याम सुथार, जगदीश सुथार, हरलाल जाट और गौतम गायरी सहित स्थानीय कलाकारों ने भी उत्साह के साथ भाग लिया।
भील समुदाय की पारंपरिक गवरी में बजाए जाने वाले थाली-मांदल जैसे लोकवाद्यों की गूंज ने धार्मिक आयोजन में लोक संस्कृति के रंग भर दिए। गांव के एक दर्जन से अधिक कलाकारों ने अपनी कला से आयोजन को यादगार बनाया। धार्मिक अनुष्ठान के साथ लोक परंपराओं की इस प्रस्तुति ने ग्रामीणों की सांस्कृतिक विरासत को भी सामने रखा।
हवन की पूर्णाहुति के बाद ढोल की थाप पर महिलाओं ने गरबा नृत्य किया। इसके बाद सभी भक्तों को प्रसाद वितरित किया गया। श्रद्धा, भक्ति और उल्लास से सराबोर इस आयोजन में बड़ी संख्या में ग्रामीणों और आसपास के गांवों से आए श्रद्धालुओं ने भाग लिया।
अधिवक्ता कालूलाल जाट ने कहा कि चामुंडा माता के प्रति ग्रामीणों की अटूट आस्था और सौ वर्ष पुरानी परंपरा हमारी सांस्कृतिक विरासत का गौरव है। कार्यक्रम में धीरज व्यास (उदयपुर), सेवानिवृत्त प्रधानाध्यापक सोहनलाल शर्मा, भंवरलाल जाट, शिक्षक पुष्कर लाल सुथार, अधिवक्ता कालूलाल जाट, चेतन शर्मा, कंपाउंडर युधिष्ठिर शर्मा, हीरालाल व्यास, भेरूलाल सुथार, मुकेश जाट, रामेश्वरपुरी गोस्वामी, मदनलाल शर्मा, गौतम गायरी, सोहन लाल गायरी, हेमंत शर्मा और चंदू शर्मा सहित सैकड़ों श्रद्धालु मौजूद रहे। जियाखेड़ी में दुर्गाष्टमी पर आयोजित यह हवन धार्मिक आस्था, पारंपरिक रीति-रिवाजों और लोक संस्कृति के पीढ़ियों से चले आ रहे संगम का प्रतीक बना।