चित्तौड़गढ़ रामद्वारा में मंच पर बैठकर भगवान शिव के बैनर के आगे कथा वाचन करते संत।

चित्तौड़गढ़ रामद्वारा में चातुर्मासिक सत्संग के तहत आयोजित महाशिव पुराण कथा में पार्वती खण्ड प्रसंग का वाचन करते हुए संत दिग्विजय राम महाराज ने कहा कि भाग्य से ज्यादा और समय से पहले इंसान को कुछ भी नहीं मिलता। भाग्य और कर्म एक ही गाड़ी के दो पहिए हैं और इन्हीं से जीवन की गाड़ी चलायमान रहती है।

संत दिग्विजय राम महाराज ने कहा कि शास्त्रों में भाग्य और कर्म पर जोर दिया गया है। होता वही है, जो प्रभु श्रीराम चाहते हैं। भाग्य के साथ कर्म की प्रधानता भी बताई गई है। हर जीव प्रारब्धता लेकर आता है। संसार में भाग्य फलता है और जो कुछ भी संसार में होता है, वह प्रभु की माया है।


कथा में उन्होंने सती के हिमालय के घर जन्म लेने को भी प्रभु की माया बताया। सती के वियोग में दुखी होकर भगवान शिव तपस्या में लीन हो गए। इधर, सती ने हिमालय के घर माता पार्वती के रूप में जन्म लेने के बाद आठ साल की आयु में ही जंगल में जाकर महादेव को पति के रूप में पाने के लिए तपस्या शुरू कर दी।

संत ने कथा प्रसंग में बताया कि भगवान महादेव समाधि से उठे तो उनके पसीने से चार भुजाओं वाले बालक का आभिर्भाव हुआ, जिसका पालन-पोषण माता पृथ्वी ने किया। उस बालक का नाम धरती पुत्र भौम रखा जाता है। भौम ने काशी में भगवान शिव की आराधना की।

शिव पुराण के प्रसंग का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि ताड़कासुर ने सैंकड़ों साल तक बहुत कठिन तपस्या की। उसकी तपस्या के प्रभाव से पृथ्वी भी डगमगा गई। ताड़कासुर ने ब्रह्मा से वरदान मांगा कि तीनों लोक में उसके समान कोई बलवान नहीं हो और उसकी मृत्यु सिर्फ महादेव के अंश से जन्मे पुत्र के अलावा किसी से भी नहीं हो।

ब्रह्मा से वरदान मिलने के बाद ताड़कासुर से परेशान होकर देवता स्वर्ग लोक छोड़कर ताड़कासुर के वध की कामना को लेकर ब्रह्मा के पास गए। इधर, इन्द्र के कहने पर भगवान शिव को विवाह के लिए राजी करने को कामदेव कैलाश पर्वत पर गए। उन्होंने भगवान शिव की समाधि तोड़ने के लिए बसंत जैसा वातावरण पैदा कर दिया। क्रोधित होकर भगवान शिव ने तीसरा नेत्र खोल दिया, जिससे कामदेव भस्म हो गए।

कथा के इन प्रसंगों के माध्यम से संत दिग्विजय राम महाराज ने भाग्य, कर्म, प्रारब्ध और प्रभु की माया के साथ भगवान शिव और पार्वती से जुड़े प्रसंगों का वर्णन किया।

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