आकोला नगर पालिका चुनाव: BJP और कांग्रेस में टक्कर, निर्दलीय बिगाड़ेंगे खेल
कपासन विधायक अर्जुनलाल जीनगर की साख दांव पर, बागियों के कारण दोनों दलों का गणित बिगड़ा।
तस्वीर में चित्तौड़गढ़ जिले के आकोला नगर पालिका कार्यालय का मुख्य भवन दिख रहा है।
आकोला नगर पालिका चुनाव में कांग्रेस और भाजपा के बीच कांटे की टक्कर दिखाई दे रही है। दोनों प्रमुख दलों की जीत में निर्दलीय प्रत्याशी रोड़ा बनते नजर आ रहे हैं और अधिकांश वार्डों में बहुकोणीय मुकाबला है। कपासन विधायक अर्जुनलाल जीनगर की प्रतिष्ठा भी इस चुनाव में दांव पर लगी है। टिकट वितरण के बाद भाजपा में पैदा हुई नाराजगी के कारण पार्टी की जीत की उम्मीदों को झटका लग सकता है। दोनों दलों के संभावित चैयरमेन के अधिकांश दावेदार फिलहाल अपने-अपने वार्ड में पार्षद के चुनाव में कड़े मुकाबले में फंसे हुए दिखाई दे रहे हैं।
20 वार्डों में से सिर्फ चार वार्डों में कांग्रेस और भाजपा के बीच सीधा मुकाबला है। कई वार्डों में जातीय समीकरणों के कारण कांग्रेस और भाजपा दोनों हार-जीत को लेकर मुश्किल में हैं। नगर पालिका में बहुमत हासिल करने को लेकर फिलहाल दोनों प्रमुख दल आश्वस्त नजर नहीं आ रहे हैं।
चित्तौड़गढ़ जिले की नवगठित आकोला नगर पालिका का चुनाव 11 सितंबर को होने जा रहा है। चुनाव को लेकर प्रचार अभियान शुरू हो गया है। वार्डों में चुनाव कार्यालय खुलने लगे हैं और प्रत्याशी अपने-अपने समर्थकों के साथ घर-घर जाकर मतदाताओं को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। गली-मोहल्लों, बाजार और चौराहों पर उम्मीदवारों के बैनर-पोस्टर लगने लगे हैं। सोशल मीडिया पर भी जमकर प्रचार-प्रसार किया जा रहा है।
कपासन विधायक अर्जुनलाल जीनगर की प्रतिष्ठा दांव पर लगी है। उनके लिए नगर पालिका में भाजपा का बहुमत के साथ बोर्ड बनाना प्रतिष्ठा का सवाल बन गया है। विधायक जीनगर ने स्वयं चुनाव प्रचार की कमान संभाल रखी है। लेकिन जिस तरह से वार्ड पार्षद उम्मीदवारों का चयन किया गया और उसके बाद भाजपा कार्यकर्ताओं में असंतोष और नाराजगी पैदा हुई, उससे पार्टी की जीत की उम्मीदों पर पानी फिर सकता है। टिकट नहीं मिलने से नाराज कई दावेदार निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर चुनाव मैदान में उतर गए हैं। इससे भाजपा को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
दूसरी ओर कांग्रेस भी पूरी ताकत के साथ चुनाव लड़ रही है। इस चुनाव में कुछ नेताओं की राजनीतिक प्रतिष्ठा भी दांव पर लगी है और उनकी अगुवाई में पार्टी चुनाव लड़ रही है। कांग्रेस के लिए भी टिकट वितरण से उपजा असंतोष परेशानी का कारण बना हुआ है। आकोला नगर पालिका अध्यक्ष का पद अनुसूचित जाति ओपन वर्ग के लिए आरक्षित होने से इस वर्ग से चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों के वार्डों में तगड़ा मुकाबला दिखाई दे रहा है।
बीस वार्डों वाली इस नगर पालिका में दस वार्ड सामान्य वर्ग के लिए होते हुए भी भाजपा जैन समाज से एक भी उम्मीदवार नहीं उतार पाई है, जिसका खामियाजा पार्टी को उठाना पड़ सकता है। कांग्रेस ने उम्मीदवार बनाकर भाजपा पर मनोवैज्ञानिक दबाव बनाने की कोशिश की है। दोनों प्रमुख दलों ने एक-एक वार्ड में मुस्लिम प्रत्याशी खड़ा किया है।
इस बीच भाजपा और कांग्रेस सहित निर्दलीय व अन्य दलों के उम्मीदवारों एवं उनके समर्थकों ने प्रचार अभियान तेज कर दिया है। मतदाताओं को अपने पक्ष में करने के लिए सभी उम्मीदवार पूरी ताकत झोंक रहे हैं। दोनों प्रमुख दल अपने-अपने मुद्दों पर चुनाव मैदान में हैं। क्या मतदाता महंगाई, खासकर महंगी चीनी, रसोई गैस, पेट्रोल, खाने के तेल, कई वार्डों में साफ-सफाई की समस्या, पीने के पानी की समस्या और ऐसे कई मुद्दों को लेकर वोट के जरिए चोट कर सकते हैं, यह भी देखने वाली बात होगी। कहीं न कहीं वोटरों में महंगाई का मुद्दा हावी है।
फिलहाल जो तस्वीर उभरती हुई दिखाई दे रही है, उसमें आकोला में भाजपा और कांग्रेस के बीच कांटे की टक्कर है और निर्दलीय प्रत्याशी कई वार्डों में दोनों दलों की हार-जीत को प्रभावित कर सकते हैं। यदि एक-दो निर्दलीय प्रत्याशी चुनाव जीत गए तो चैयरमेन पद के लिए चुनाव और रोचक हो जाएगा।