तस्वीर में गंगापुर नगरपालिका चुनाव के टिकट वितरण और बदले सियासी समीकरणों से जुड़े विभिन्न स्लोगन और एक शाही कुर्सी दिखाई दे रही है। यह तस्वीर काल्पनिक है और एआई द्वारा केवल संदर्भ के लिए बनाई गई है।

गंगापुर, भीलवाड़ा। गंगापुर नगरपालिका चुनाव महासंग्राम में टिकट वितरण के बाद सियासी समीकरण बदलते नजर आ रहे हैं। राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं और तंजों का दौर शुरू हो गया है। सबसे अधिक चर्चा उन चेहरों की है, जो टिकट बंटवारे में अपनी मजबूत पकड़ का दावा कर रहे थे, लेकिन टिकटों की सूची सामने आने के बाद उनकी भूमिका को लेकर सवाल उठने लगे हैं।

इन हालात पर शायर की पंक्तियां “न खुदा मिला, न विसाल-ए-सनम, न इधर के रहे न उधर के रहे…” सियासी चर्चाओं में खूब सुनाई दे रही हैं। कहा जा रहा है कि जिनके कंधों पर दूसरों को टिकट दिलाने की जिम्मेदारी का दंभ था, वे अपने ही घर की “अर्धांगिनी” का टिकट फाइनल करवाने में कामयाब नहीं हो पाए। इसके बाद राजनीतिक गलियारों में यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर टिकट की चाबी किसके हाथ में थी और दावा किसका चल रहा था?

टिकट वितरण के बाद बदले समीकरणों ने उन नेताओं को भी आईना दिखाया है, जो कल तक खुद को पार्टी के भीतर बेहद प्रभावशाली मानकर चल रहे थे। अब राजनीतिक चर्चाओं में हालात ऐसे बताए जा रहे हैं कि जिनके इशारे पर सियासी फैसले होने की चर्चा थी, वही नेता टिकटों की सूची सामने आने के बाद किनारे खड़े दिखाई दे रहे हैं।

नामांकन जांच प्रक्रिया के दौरान भी गंगापुर के सियासी गलियारों में अलग-अलग चर्चाएं देखने को मिलीं। कौन किसके बुलावे पर आया और कौन बिना बुलाए पहुंचा, इसको लेकर राजनीतिक चुटकुले और व्यंग्य भी तैरते रहे। कुछ देर कुर्सी संभालने के बाद अचानक मोबाइल पर “हैलो-हैलो” करते हुए निकलने की घटना भी वहां मौजूद लोगों के बीच चर्चा का विषय बनी रही।

हालांकि इन तमाम चर्चाओं की अपनी-अपनी राजनीतिक व्याख्या है, लेकिन टिकट वितरण ने गंगापुर की सियासत में कई पुराने समीकरणों को हिला दिया है। जिन चेहरों को कल तक सत्ता और संगठन के बेहद करीब माना जाता था, आज उनके राजनीतिक भविष्य को लेकर ही सवाल खड़े होने लगे हैं।

अब सियासी पंडितों की नजर चुनाव परिणाम पर टिकी है। असली फैसला जनता की अदालत में होगा कि टिकट वितरण में किसका कद बढ़ा, किसका घटा और कौन केवल टिकट की दौड़ में ही “न इधर का रहा, न उधर” का हो गया।

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