आचार्य पुलकसागर महाराज बोले- सुख का जाप करने से समाप्त होंगे संसार के सारे दुःख
आचार्य पुलकसागर महाराज ने भीलवाड़ा में कहा कि सुख की साधना और अहिंसा के पालन से जीवन में अनंत सुख की अनुभूति हो सकती है।
तस्वीर में जैन मुनि पुलक सागर महाराज एक सजे हुए सुनहरे मंच पर प्रवचन दे रहे हैं।
शुक्रवार को भीलवाड़ा के शास्त्रीनगर स्थित सूर्यमहल में राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने चातुर्मासिक प्रवचन में कहा कि संसार में सभी दुःखी हैं, क्योंकि हमारी सोच ही दुःख का कारण बन गई है। उन्होंने कहा कि मनुष्य के पास सुखी या दुःखी होने की शक्ति है। यदि प्रतिदिन यह भाव रखा जाए कि ‘मैं बहुत सुखी हूं, सुख मेरा स्वभाव है’, तो सुख की साधना करते-करते वह अनंत सुख में परिवर्तित हो सकता है और संसार के दुःख समाप्त हो सकते हैं।
श्री पार्श्वनाथ दिगम्बर जैन मंदिर ट्रस्ट, मैन सेक्टर शास्त्रीनगर के तत्वावधान में सकल दिगम्बर जैन समाज की ओर से भीलवाड़ा में पहली बार चातुर्मास कर रहे राष्ट्र संत मनोज्ञाचार्य पुलकसागरजी महाराज ने कहा कि इसके विपरीत यदि मनुष्य स्वयं को दुःखी मानता रहेगा तो उसके सुख पर भी दुःख हावी हो जाएगा। भगवान की दिव्य प्रतिमाओं के चेहरे हमेशा प्रसन्न दिखाई देते हैं और उन्हें देखकर मनुष्य को भी प्रसन्नता मिलती है। उन्होंने कहा कि दुःख दुर्गुण और सुख गुण है। भगवान का सुख अनंत है, जबकि मेरा दुःख दुर्गुण है। इसलिए दुःख का त्याग कर जीवन में आनंद की अनुभूति करनी चाहिए। यदि संकल्प कर लिया जाए कि किसी भी परिस्थिति में दुःखी नहीं होना है, तो मनुष्य भगवान बनने के रास्ते पर चल पड़ेगा।
आचार्यश्री ने कहा कि सुखी होने के लिए इसका अभ्यास करना होगा और हर परिस्थिति में सुखी रहना सीखना होगा। दुनिया का सबसे बड़ा धर्म ‘अहिंसा परमो धर्म’ है। हिंसा कभी धर्म नहीं हो सकती। दुःख हिंसा का और सुख अहिंसा का फल है। हिंसा मानसिक, वैचारिक एवं दैहिक होती है। अहिंसा का पालन करने के लिए इन्द्रीय संयम और प्राणी संयम लेना होगा। संयम के लिए तप करना पड़ेगा, क्योंकि बिना तप इन्द्रियां नियंत्रित नहीं होंगी और जीवों के प्रति हिंसा भी नहीं रुकेगी। उन्होंने कहा कि तप के लिए साधुओं और तपस्वियों की संगति करनी होगी तथा सत्संग में जाना होगा।
आचार्य पुलकसागर महाराज ने दुःख और दर्द के बीच अंतर बताते हुए कहा कि जो सोच का होता है, वह दुःख है और जो चोट का होता है, वह दर्द है। दुःख मानसिक है, जबकि चोट दैहिक होती है। चोट में शरीर को दर्द होता है और दुःख में मन को पीड़ा होती है। दर्द का उपचार है, लेकिन दुःख का कोई उपचार नहीं होता। उन्होंने कहा कि बिना अभ्यास के अनंत सुख की प्राप्ति नहीं हो सकती। मनुष्य जन्म प्राप्त हुआ है तो जानवर नहीं, जिनवर बनने का अभ्यास करना चाहिए। प्रार्थना करनी चाहिए कि भगवान का अनंत सुख हमारे भीतर आ जाए।
उन्होंने कहा कि सुख या दुःख में से जिसकी साधना करेंगे, वही प्राप्त होगा। जो दुःखी रहते हैं, वे जिंदगी में दुआ नहीं दे सकते। हम अपने कार्यों से दुःख बढ़ाने में लगे हुए हैं। यह याद रखना चाहिए कि संसार में कई लोग हमसे भी ज्यादा दुःखी हैं। अपने से ज्यादा दुःखी व्यक्ति को देखने पर हमारा दुःख छोटा और सुख बड़ा होता जाएगा। सुख बड़ा करने की आदत बन गई तो एक दिन अनंत सुख की प्राप्ति हो जाएगी। बार-बार क्षमा मांगने की आदत से एक दिन क्षमा गुण बन जाएगा और जीवन में क्षमाशील बन जाएंगे।
श्री पुलकसागर चातुर्मास समिति के अध्यक्ष प्रवीण चौधरी ने बताया कि आचार्य पुलकसागर महाराज के सानिध्य में पर्युषण (दशलक्षण) पर्व की साधना 16 से 25 सितम्बर तक सूर्यमहल में होगी। इस अवधि में दस दिवसीय पाप नाशनम शिविर का भी आयोजन किया जाएगा। इस शिविर के लिए अब तक 500 से अधिक श्रावक-श्राविकाएं पंजीयन करा चुके हैं।
प्रवचन के प्रारंभ में दीप प्रज्वलन, पाद प्रक्षालन एवं शास्त्र भेंट का सौभाग्य चांदमल, हेमंत, पवन और अनिल वैद परिवार ने प्राप्त किया। चातुर्मास समिति के संयोजक मनीष शाह एवं सह संयोजक लोकेश अजमेरा ने बताया कि प्रतिदिन चातुर्मासिक प्रवचन सुबह 8.30 से 10 बजे तक सूर्यमहल में हो रहे हैं। शाम 7 से 8 बजे तक आनंद यात्रा एवं आरती का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें शहर के विभिन्न क्षेत्रों से श्रद्धालु शामिल होकर लाभ प्राप्त कर रहे हैं।