भुसावर में धूमधाम से मनाया जलझूलनी एकादशी महोत्सव, निकाली शोभायात्रा
ठाकुर जी की बाल स्वरूप झांकी और डोला-पालकी यात्रा के साथ धार्मिक अनुष्ठान संपन्न, श्रद्धालुओं ने किया जलवा पूजन।
तस्वीर में मंदिर परिसर के बाहर बर्तन वितरण कार्यक्रम के दौरान खड़े श्रद्धालु दिख रहे हैं।
भुसावर सहित उपखण्ड मुख्यालय क्षेत्र के ग्रामीण परिक्षेत्र में 22 सितम्बर मंगलवार को जलझूलनी एकादशी महोत्सव धूमधाम एवं हर्षोल्लास के साथ मनाया गया। इस अवसर पर मंदिरों और देवालयों में भगवान विष्णु की पूजा-अर्चना, कथा श्रवण और उपवास के साथ ठाकुर जी एवं लड्डू गोपाल जी के जलविहार और जलवा (कुआं) पूजन की परंपरा निभाई गई। धार्मिक आयोजनों के दौरान मंदिर परिसर "हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की" के जयकारों से गूंज उठे।
विभिन्न मंदिरों और देवालयों से घंटे-घड़ियाल और बैंड-बाजों के साथ ठाकुर जी एवं भगवान लड्डू गोपाल जी की प्रतिमाओं को डोला और पालकी में विराजमान कर नगर भ्रमण करवाया गया। परंपरा के अनुसार भगवान को जलविहार करवाते हुए स्नान कराया गया। इसके बाद ठाकुर जी और लड्डू गोपाल की प्रतिमाओं को नई पोशाक धारण करवाई गई।
भुसावर के हिण्डौन सड़क मार्ग स्थित प्राचीन कोठी वाले हनुमान जी मंदिर प्रांगण और पुरानी अनाज मंडी स्थित लक्ष्मण जी मंदिर परिसर में भक्त मंडल एवं महिला श्रद्धालुओं की ओर से ठाकुर जी और लड्डू गोपाल जी की प्रतिमा को बाल स्वरूप की झांकी में सजाया गया। डोला-पालकी में विराजमान कर प्रतिमाओं को विभिन्न मार्गों से नगर भ्रमण करवाते हुए पुनः अपने गंतव्य पर पहुंचाया गया।
गंतव्य पर पहुंचने के बाद विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना की गई और महाआरती के बाद ठाकुर जी एवं लड्डू गोपाल जी का जलविहार कराया गया। इसके साथ ही जलवा (कुआं) पूजन की रस्म भी निभाई गई। बाल स्वरूप की झांकी ने श्रद्धालुओं का मन मोह लिया।
इस दौरान मंदिर परिसर में "हाथी घोड़ा पालकी जय कन्हैया लाल की" के जयकारों के बीच ढोलक, झांझ-मंजीरा की थाप पर श्रद्धालुओं ने भजनों के माध्यम से भगवान को रिझाया और अपनी अरदास लगाई। जलवा (कुआं) पूजन कार्यक्रम का समापन श्रद्धालुओं को बर्तन वितरण करते हुए किया गया।
विद्वान पंडितों ने बताया कि जलझूलनी एकादशी का उपवास करने से श्री कृष्ण जन्माष्टमी का उपवास पूर्ण होता है। जलविहार, जलवा पूजन, भजन-कीर्तन और श्रद्धालुओं की सहभागिता के साथ भुसावर क्षेत्र में जलझूलनी एकादशी की धार्मिक परंपरा संपन्न हुई।