बारां में संघ का भव्य पथ संचलन, निंबाराम ने पंच परिवर्तन अपनाने का किया आह्वान
बारां में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष पर भव्य पथ संचलन और धर्मादा चौराहे पर द्विधारा संगम हुआ। क्षेत्र प्रचारक निंबाराम ने नियमित शाखा, व्यक्ति निर्माण, सामाजिक समरसता और पंच परिवर्तन अपनाने का आह्वान किया।
बारां में आरएसएस के शताब्दी वर्ष समारोह के दौरान पूर्ण गणवेश में शस्त्र पूजन और अनुष्ठान करते संघ के वरिष्ठ पदाधिकारी व स्वयंसेवक।
बारां में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के शताब्दी वर्ष के उपलक्ष्य में रविवार को भव्य पथ संचलन एवं द्विधारा संगम कार्यक्रम आयोजित किया गया। पूर्ण गणवेश में निकले स्वयंसेवकों ने अनुशासन, एकरूपता और संगठनात्मक एकता का परिचय दिया। राजस्थान क्षेत्र प्रचारक निंबाराम ने स्वयंसेवकों को व्यक्ति निर्माण, नियमित शाखा संचालन, सामाजिक समरसता और राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति के लिए कार्य करने का संदेश दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि स्वयंसेवक का दायित्व पद-प्रतिष्ठा तक सीमित नहीं, बल्कि समाज में सकारात्मक परिवर्तन लाना है।
कार्यक्रम में माननीय विभाग संघचालक बारां विभाग रमेश मेहता एवं माननीय जिला संघचालक बारां जिला राधेश्याम गर्ग उपस्थित रहे। क्षेत्र प्रचारक निंबाराम के प्रवास के दौरान आयोजित इस कार्यक्रम में स्वयंसेवकों को संगठनात्मक कार्यों की निरंतरता, व्यक्तिगत संपर्क और सामाजिक दायित्वों के निर्वहन के संबंध में मार्गदर्शन दिया गया।
पथ संचलन क्रमांक-1 में केशव मंडल, प्रताप मंडल एवं दीनदयाल मंडल के स्वयंसेवकों ने भाग लिया, जबकि पथ संचलन क्रमांक-2 में हनुमान मंडल, बालाजी मंडल, विवेकानंद मंडल एवं शिवाजी मंडल के स्वयंसेवक शामिल हुए। दोनों संचलनों का संगम धर्मादा चौराहे पर हुआ। इसके बाद फल-सब्जी मंडी, कॉलेज रोड पर कार्यक्रम का समापन हुआ।
क्षेत्र प्रचारक निंबाराम ने कहा कि पथ संचलन का उद्देश्य समाज में भय उत्पन्न करना नहीं, बल्कि अनुशासन, विश्वास और सकारात्मक ऊर्जा का संदेश देना है। संगठन की वास्तविक शक्ति स्वयंसेवकों के आचरण और समाज के बीच किए जाने वाले सेवा कार्यों से दिखाई देती है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का मूल कार्य व्यक्ति निर्माण है और नियमित शाखा इसका प्रमुख केंद्र है। शाखा में खेल, अनुशासन, संस्कार, सेवा और निरंतर अभ्यास से व्यक्ति का शारीरिक, मानसिक एवं सामाजिक विकास होता है। संघ में पद और प्रतिष्ठा की अपेक्षा दायित्व तथा समर्पण को अधिक महत्व दिया जाता है। उन्होंने मुख्य शिक्षक, कार्यवाह एवं अन्य दायित्ववान कार्यकर्ताओं से शाखाओं में नियमित अभ्यास कराने और प्रत्येक स्वयंसेवक से व्यक्तिगत संपर्क बनाए रखने का आह्वान किया।
निंबाराम ने कहा कि स्वयंसेवकों को वरिष्ठ कार्यकर्ताओं के अनुभवों से सीखकर अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करना चाहिए। समाज परिवर्तन के कार्यों में सक्रिय भूमिका निभाना भी उनकी जिम्मेदारी है। उन्होंने संगठनात्मक कार्यों में निरंतरता बनाए रखने और स्वयंसेवकों के आचरण के माध्यम से समाज में विश्वास बढ़ाने पर जोर दिया।
संघ के शताब्दी वर्ष के कार्यक्रमों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि प्रबुद्धजन गोष्ठियों, सामाजिक सद्भाव बैठकों, गृह संपर्क अभियानों, हिंदू सम्मेलनों और युवा कार्यक्रमों के माध्यम से समाज के विभिन्न वर्गों तक पहुंचने का प्रयास किया गया है। इन कार्यक्रमों की सार्थकता बनाए रखने के लिए उनसे जुड़े लोगों के साथ निरंतर संपर्क रखना और उन्हें सामाजिक कार्यों से जोड़ना आवश्यक है। उन्होंने कार्यक्रमों के बाद अनुवर्तन और कार्यों की नियमित समीक्षा को भी जरूरी बताया।
राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति को संघ का लक्ष्य बताते हुए निंबाराम ने कहा कि संघ की प्रार्थना में राष्ट्र को परम वैभव पर ले जाने का संकल्प व्यक्त होता है। इसका उद्देश्य समाज के प्रत्येक वर्ग और अंतिम व्यक्ति के विकास के साथ राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति सुनिश्चित करना है। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानव दर्शन में भी समग्र समाज के विकास की अवधारणा निहित है।
डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के जीवन और विचारों का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि राष्ट्र के पुनरुत्थान और संगठित समाज के निर्माण का उनका संकल्प आज भी संघ कार्य की प्रेरणा है। उन्होंने समाज में व्याप्त भेदभाव, स्वार्थ और सामाजिक कुरीतियों को दूर करने की आवश्यकता बताते हुए संगठित, संस्कारित, समरस एवं सशक्त समाज के निर्माण पर बल दिया।
संघ में विभिन्न दायित्वों की भूमिका स्पष्ट करते हुए क्षेत्र प्रचारक ने कहा कि मुख्य शिक्षक, कार्यवाह, गण शिक्षक और अन्य दायित्व संगठन की व्यवस्था को सुचारु रूप से चलाने के लिए हैं। इन्हें पद-प्रतिष्ठा का माध्यम मानने के बजाय सेवा और समर्पण की भावना से निभाना चाहिए। परम पूजनीय श्री गुरुजी के जीवन का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि संगठन में व्यक्ति की प्रतिष्ठा से अधिक महत्वपूर्ण उसका स्वयंसेवक भाव है। वरिष्ठ स्वयंसेवकों का अनुशासन, सादगी और समर्पण नई पीढ़ी के लिए प्रेरणास्रोत है।
निंबाराम ने गणवेश को अनुशासन और संगठनात्मक एकरूपता का प्रतीक बताया। उन्होंने कहा कि गणवेश को स्वच्छ एवं व्यवस्थित रखना और समय पर उपस्थित होना स्वयंसेवक के अनुशासन को दर्शाता है। स्वयंसेवकों को दिखावे और अनावश्यक प्रचार से दूर रहकर अपने आचरण, सेवा और संस्कारों के माध्यम से समाज में विश्वास बढ़ाने पर ध्यान देना चाहिए।
उन्होंने पंच परिवर्तन के अंतर्गत सामाजिक समरसता, परिवार प्रबोधन, पर्यावरण संरक्षण, स्वदेशी भाव और नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि विकास के साथ संस्कार, समृद्धि के साथ सामाजिक उत्तरदायित्व और व्यक्तिगत प्रगति के साथ राष्ट्रहित का भाव भी आवश्यक है। युवाओं को समाज के प्रति जागरूक करना समय की जरूरत है।
विभिन्न टिप्पणियों और चुनौतियों के बीच कार्यकर्ताओं को अनावश्यक बहस में उलझने के बजाय रचनात्मक कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने का संदेश देते हुए उन्होंने कहा कि सेवा, संवेदना, संस्कार और सकारात्मक आचरण समाज में विश्वास बढ़ाने के प्रभावी माध्यम हैं। शक्ति का वास्तविक उद्देश्य समाज की रक्षा, सेवा और सकारात्मक परिवर्तन होना चाहिए।
कार्यक्रम के अंत में क्षेत्र प्रचारक निंबाराम ने स्वयंसेवकों से शाखा की नियमितता बनाए रखने, अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वहन करने, समाज के विभिन्न वर्गों से निरंतर संपर्क रखने तथा सेवा और सामाजिक परिवर्तन के कार्यों में सक्रिय सहभागिता बढ़ाने का आह्वान किया। संघ के शताब्दी वर्ष के इस आयोजन में व्यक्ति निर्माण से लेकर राष्ट्र की सर्वांगीण उन्नति तक के लक्ष्यों और सामाजिक जीवन में पंच परिवर्तन की भूमिका पर जोर दिया गया।