सिकंदराबाद के बराही माता मेले में उमड़े श्रद्धालु, बच्चों के स्वास्थ्य की मांगी दुआ
क्वेश्चन और चैत्र चौदस पर आयोजित मेले में श्रद्धालुओं ने मिट्टी और जल की परंपरा निभाकर परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की।
सिकंदराबाद स्थित बराही माता मंदिर के परिसर में पूजा-अर्चना के लिए एकत्र हुए श्रद्धालु दिख रहे हैं।
सिकंदराबाद में मंदिर श्री कृष्ण तालाब पर बराही माता के मेले में श्रद्धालुओं का सैलाब उमड़ा। चौदस के अवसर पर आयोजित मेले में बड़ी संख्या में लोगों ने माता की पूजा-अर्चना कर बच्चों के स्वस्थ जीवन और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना की। सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा के तहत श्रद्धालुओं ने तालाब से मिट्टी निकालकर बच्चों के चेहरे पर लगाई और तालाब के जल से मुंह धोकर माता के प्रति अपनी आस्था प्रकट की।
स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, बराही माता के मंदिर से लोगों की गहरी धार्मिक आस्था जुड़ी हुई है। मान्यता है कि क्वार और चैत्र मास की चतुर्दशी यानी चौदस के दिन माता की पूजा करने से श्रद्धालुओं की मनोकामनाएं पूरी होती हैं। विशेष रूप से बच्चों को चेचक, फुंसियां और फोड़े होने पर लोग माता का स्मरण करते हैं और उनके नाम पर उठावना रखते हैं। इसके बाद निर्धारित पूजा के दिन मंदिर पहुंचकर माता के दरबार में माथा टेकते हैं और परिवार की खुशहाली के लिए प्रार्थना करते हैं।
इसी परंपरा के तहत मेले में पहुंचे श्रद्धालुओं ने माता को गुड़, दाल, आटा, चावल, वस्त्र और दक्षिणा अर्पित की। पूजा-अर्चना के बाद तालाब से मिट्टी निकालकर बच्चों के चेहरे पर लगाई और तालाब के जल से मुंह धोया। श्रद्धालुओं ने माता से परिवार को हर संकट से सुरक्षित रखने और बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य की कामना की।
बराही माता की पूजा-अर्चना के साथ एक प्राचीन लोककथा भी जुड़ी हुई है, जिसका संबंध रावण की मृत्यु और उसकी पत्नी मंदोदरी से बताया जाता है। स्थानीय बुजुर्गों के अनुसार, मान्यता है कि रावण की मृत्यु के बाद मंदोदरी उसके पार्थिव शरीर को लेकर मंदिर श्री कृष्ण तालाब पहुंची थीं। लोककथा के मुताबिक, दशहरे से लेकर चौदस तक चार दिनों तक रावण के पार्थिव शरीर को यहां रखा गया और भगवान की पूजा-अर्चना की गई, ताकि रावण दोबारा जीवित हो सके।
हालांकि, जब रावण जीवित नहीं हुआ तो उसके पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार कर दिया गया। स्थानीय लोकमान्यता के अनुसार, इसी घटना से सिकंदराबाद में चौदस के दिन रावण वध और दहन की परंपरा भी जुड़ी हुई है। इस तरह बराही माता की पूजा और रावण दहन की परंपरा को स्थानीय धार्मिक मान्यताओं के साथ जोड़कर देखा जाता है।
मेले में श्रद्धालुओं की भागीदारी ने सिकंदराबाद की धार्मिक परंपराओं के प्रति लोगों की आस्था को दर्शाया। बुजुर्गों से चली आ रही मान्यताओं का पालन करते हुए लोगों ने माता के दरबार में पूजा-अर्चना की और बच्चों के अच्छे स्वास्थ्य तथा परिवार में सुख-शांति बनाए रखने की प्रार्थना की। हालांकि, चेचक, फोड़े-फुंसियों जैसी बीमारियों के लिए धार्मिक आस्था के साथ-साथ चिकित्सकीय उपचार कराना भी आवश्यक है।