भारत में गरीबी में गिरावट और महंगाई के बीच आम आदमी के बजट की स्थिति दर्शाता इंफोग्राफिक।

भारत में गरीबी तेजी से घटने के आंकड़े सामने आए हैं, लेकिन आम आदमी की आर्थिक परेशानियां अब भी सवालों के घेरे में हैं। वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2011 से 2023 के बीच भारत के करीब 49.6 करोड़ लोग गरीबी के दायरे से बाहर आ गए। रिपोर्ट में बताया गया है कि प्रतिदिन 4.20 डॉलर से कम आय पर जीवन गुजारने वाली आबादी का प्रतिशत 57.7 से घटकर 16.1 रह गया है।

यह आंकड़ा निश्चित रूप से राहत और चर्चा का विषय है, लेकिन इसके साथ एक अहम सवाल भी खड़ा होता है कि क्या गरीबी से बाहर आने का मतलब वास्तव में आर्थिक खुशहाली है?

कभी गरीबी को देश की सबसे बड़ी समस्या माना जाता था। अब खबरें आ रही हैं कि भारत में गरीबी तेजी से कम हो रही है। हालांकि, इन आंकड़ों के बीच आम आदमी की आर्थिक स्थिति को समझना भी जरूरी है। क्योंकि जब वह बाजार में कदम रखता है, तो उसे सरकारी आंकड़ों से ज्यादा कीमतों का सामना करना पड़ता है।

सब्जियों के दाम, आटे-दाल की कीमतें, बिजली का बिल, बच्चों की स्कूल फीस, दवाइयों का खर्च और रसोई गैस का बजट उसकी आर्थिक स्थिति की असली परीक्षा लेते हैं। महीने की शुरुआत में मिलने वाली तनख्वाह कब किराया, राशन, किस्तों और दूसरे जरूरी खर्चों में खत्म हो जाती है, इसका पता ही नहीं चलता।

कई परिवार आज भी महीने के अंतिम दिनों में खर्च चलाने के लिए उधार लेने को मजबूर हैं। ऐसे में गरीबी घटने के आंकड़ों के बीच आम आदमी की जेब का हाल भी समझना जरूरी है।

असल सवाल सिर्फ यह नहीं है कि कितने लोग गरीबी रेखा से ऊपर पहुंचे, बल्कि यह भी है कि कितने परिवार अब बिना आर्थिक चिंता के अपना जीवन गुजार पा रहे हैं? कितने लोगों के पास बीमारी के इलाज, बच्चों की बेहतर शिक्षा और भविष्य के लिए बचत करने की क्षमता है?

क्योंकि गरीबी की सीमा पार कर लेना और सम्मानजनक, सुरक्षित तथा सुविधाजनक जीवन जीना एक जैसी बात नहीं है। गरीबी से बाहर आने के आंकड़े अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं, लेकिन महंगाई के बीच आम आदमी की आर्थिक स्थिति को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

आंकड़े अपनी जगह महत्वपूर्ण हैं और महंगाई की मार अपनी जगह हकीकत है। गरीबी भले ही सरकारी आंकड़ों में कम हो गई हो, लेकिन आम आदमी की जेब आज भी हिसाब लगाते-लगाते परेशान है।

महंगाई शायद मुस्कुराकर कह रही है, "तुम गरीबी से बाहर निकल आए हो तो क्या हुआ, मैं अभी तुम्हारे बजट के अंदर ही बैठी हूं!"

Tags: