तस्वीर में कानोड़ के लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में श्रीराम कथा सुनाते हुए कथावाचक महंत बालकदास सिंगोली श्याम और उपस्थित श्रद्धालु दिखाई दे रहे हैं।

कानोड़। निकटवर्ती खेताखेड़ा गांव स्थित लक्ष्मीनारायण मंदिर परिसर में चल रही श्रीराम कथा में कथावाचक महंत बालकदास सिंगोली श्याम ने सनातन धर्म में गौ माता के महत्व, माता-पिता की सेवा, सकारात्मक सोच और भगवान की भक्ति का संदेश दिया। कथा के दौरान राम जन्म सहित विभिन्न धार्मिक प्रसंगों का भावपूर्ण वर्णन किया गया, जिसे सुनकर श्रद्धालु भक्ति में भाव-विभोर हो गए।

महंत बालकदास सिंगोली श्याम ने कहा कि सनातन धर्म में गाय को विशेष महत्व दिया गया है और गौ माता में 33 करोड़ देवी-देवताओं का निवास माना गया है। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में गौ माता की स्थिति चिंताजनक है। प्रत्येक परिवार को अपने घर में गौ माता की सेवा और संरक्षण का संकल्प लेना चाहिए। उन्होंने गौ माता के दूध को अमृत के समान बताते हुए कहा कि गौ दर्शन और सेवा का भी विशेष धार्मिक महत्व है।

कथा में रावण, कुंभकर्ण और विभीषण द्वारा ब्रह्माजी से वरदान मांगने के प्रसंग का वर्णन करते हुए महंत ने कहा कि जीवन में संस्कारों का विशेष महत्व है। जो संतान माता-पिता का सम्मान नहीं करती और उनकी सेवा नहीं करती, उसके जीवन में संस्कारों का अभाव माना जाता है। माता-पिता की सेवा करने से भगवान प्रसन्न होते हैं। उन्होंने कहा कि संसार में अधिकांश संबंध स्वार्थ से जुड़े हुए हैं, इसलिए मनुष्य को अपने कर्म और व्यवहार में सकारात्मक सोच रखनी चाहिए। सकारात्मक सोच से कठिन से कठिन कार्य भी सरल हो सकते हैं।

कथा के दौरान राक्षसों द्वारा साधु-संतों को परेशान किए जाने का प्रसंग भी सुनाया गया। इससे देवता और संत चिंतित हो गए। इस प्रसंग में भगवान शिव द्वारा देवताओं को दिए गए संदेश का वर्णन करते हुए महंत ने कहा कि हरि सर्वत्र विद्यमान हैं, लेकिन प्रेम और भक्ति के माध्यम से ही उनका अनुभव और प्राकट्य होता है। आत्मा को परमात्मा का अंश बताते हुए उन्होंने कहा कि भगवान किसी एक स्थान तक सीमित नहीं हैं। वे वैकुंठ, गोलोकधाम, पाताल सहित प्रत्येक जीव के हृदय में विराजमान हैं।

इस प्रसंग के दौरान श्रद्धालुओं ने भगवान का स्मरण करते हुए “जय जय अविनाशी, घट-घट वासी...” के जयघोष के साथ भक्ति में सहभागिता की।

कथा में राजा दशरथ के जीवन से जुड़े प्रसंग का भी विस्तार से वर्णन किया गया। राजा दशरथ ने पुत्र प्राप्ति की इच्छा से महर्षि वशिष्ठ से उपाय पूछा। महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें पुत्रेष्टि यज्ञ कराने की सलाह दी। यज्ञ के पश्चात यज्ञनारायण द्वारा खीर का प्रसाद प्राप्त हुआ, जिसे राजा दशरथ ने अपनी तीनों रानियों को प्रदान किया। इसके फलस्वरूप भगवान श्रीराम सहित चार पुत्रों का जन्म हुआ।

इसके बाद महर्षि वशिष्ठ द्वारा चारों राजकुमारों के नामकरण संस्कार का प्रसंग सुनाया गया। भगवान श्रीराम के जन्म का प्रसंग सुनकर श्रद्धालु भाव-विभोर हो गए और मंदिर परिसर में भक्तिमय वातावरण बना रहा। कथा में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने भाग लेकर भगवान श्रीराम की भक्ति का लाभ लिया।

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