तस्वीर में मुंबई के ठाणे स्थित मंदिर परिसर में आयोजित कार्यक्रम के दौरान बाएं से दाएं चंद्रप्रकाश जैन, महावीर टाया और डॉ. जिनेंद्र शास्त्री माइक पर संबोधन देते हुए नजर आ रहे हैं।

उदयपुर, 2 अक्टूबर। मायानगरी मुंबई के ठाणे जिले में चेना ब्रिज स्थित प्रसिद्ध गातौड़ जी बावजी मंदिर में मेवाड़ की सुप्रसिद्ध लोकनृत्य गवरी का मंथन हुआ। कार्यक्रम में बड़ी संख्या में छत्तीस कौम के राजस्थानी प्रवासी बंधुओं, बच्चों, बुजुर्गों, महिलाओं और युवाओं ने भाग लिया। गवरी लोकनृत्य के कलाकारों ने विभिन्न प्रस्तुतियां देकर मेवाड़ की लोक संस्कृति की पारंपरिक रंगत को जीवंत किया।

कार्यक्रम में सभी अतिथियों का शब्दों से स्वागत भोपाजी रमेश सुथार ने किया। अतिथियों का शॉल, मेवाड़ी पगड़ी और माला पहनाकर सम्मान किया गया। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि उदयपुर से विशेष आमंत्रित भाजपा आपदा राहत विभाग राजस्थान के प्रदेश संयोजक और राजस्थान गौरव डॉ. जिनेंद्र शास्त्री थे। कार्यक्रम की अध्यक्षता छप्पन वागड़ दिगम्बर जैन समाज मुंबई के अध्यक्ष महावीर टाया ने की। विशिष्ट अतिथि समाजसेवी चंद्रप्रकाश जैन और समाजसेवी रतन केदावत रहे, जबकि कार्यक्रम का संचालन जगदीश घांची ने किया।

गवरी मंथन में राजस्थान गौरव डॉ. जिनेंद्र शास्त्री ने संस्कृति संरक्षण का संदेश देते हुए कहा कि मेवाड़ की धरती पर सदियों से चली आ रही लोक संस्कृति, परंपरा, रीति-रिवाज और कला की अनूठी विरासत गवरी आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणास्पद है। उन्होंने कहा कि इसके खिलाफ अनर्गल बयानबाजी कतई स्वीकार नहीं की जाएगी।

डॉ. शास्त्री ने राजस्थान और महाराष्ट्र की सांस्कृतिक एकता का उल्लेख करते हुए कहा कि महाराष्ट्र में छत्रपति शिवाजी महाराज और राजस्थान में वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप केवल इतिहास के महान नायक ही नहीं, बल्कि स्वाभिमान, साहस और सांस्कृतिक चेतना के प्रतीक हैं। उन्होंने कहा कि जब इन दोनों महान परंपराओं का सांस्कृतिक मिलन होता है तो राजस्थान और महाराष्ट्र की कला, संस्कृति, लोक परंपराएं और भावनाएं शक्कर की तरह आपस में घुल-मिल जाती हैं।

उन्होंने कहा कि गवरी केवल लोकनाट्य या मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि मेवाड़ की सदियों पुरानी संस्कृति, आस्था, परंपरा और सामाजिक विरासत की जीवंत पहचान है। गवरी माता के प्रति प्रत्येक व्यक्ति को आदर और श्रद्धा का भाव रखते हुए इस महान लोक परंपरा की रक्षा और सुरक्षा के लिए अपनी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

गवरी कलाकारों ने हटिया का, लाखा बंजारा एवं वरजु काजरी की प्रस्तुतियां दीं। कलाकारों की अभिनय कला, संवाद अदायगी और हास्य-विनोद से दर्शकों के बीच गवरी की पारंपरिक रंगत देखने को मिली। गौरज्या माताजी को भार आने पर प्रांगण में भगवान शिव की आरती की गई। कालका माता का विकराल रूप भी लोगों को पसंद आया।

गवरी खेल में थाली-मांदल का जोड़ा बजने पर मेवाड़वासी झूम उठे। गातौड़ जी बावजी मंदिर के भोपाजी रमेशजी सुथार ने बताया कि आगामी वर्ष भी मंदिर प्रांगण में गवरी लोकनृत्य का आनंद लिया जा सकेगा।

देर रात तक चली गवरी मंथन (राई) का मेवाड़वासियों ने आनंद लिया। कल्याण, डोंबिवली, नवी मुंबई, उपनगरीय क्षेत्र, मिराभाईदर, मुंबई और ठाणे सहित विभिन्न इलाकों से मेवाड़वासी कार्यक्रम में पहुंचे। मंदिर परिसर में सभी ने महाप्रसाद का लाभ लिया। अंत में आरती के साथ गवरी का समापन हुआ और कार्यक्रम धूमधाम व हर्षोल्लास से संपन्न हुआ।

Tags: