आंतरिक चेतना, समभाव और तत्वज्ञान से ही संभव है वास्तविक आत्मोन्नति: कोमल मुनि
खेरोदा के जैन स्थानक भवन में धर्मसभा को संबोधित करते हुए कोमल मुनि महाराज ने आंतरिक चेतना, समभाव और आत्मतत्व चिंतन को आत्मोन्नति का आधार बताया। हर्षित मुनि ने उत्तराध्ययन सूत्र में नमिराजर्षि के प्रसंग का विवेचन किया।
खेरोदा के जैन स्थानक भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मेवाड़ प्रवर्तक पूज्य कोमल मुनि महाराज।
खेरोदा में धर्मसभा को संबोधित करते हुए मेवाड़ प्रवर्तक पूज्य कोमल मुनि महाराज ने कहा कि जीवन की वास्तविक उन्नति और आत्मकल्याण का मार्ग बाहरी सुख-सुविधाओं से नहीं, बल्कि आंतरिक चेतना, समभाव और धर्म की सच्ची साधना से तय होता है। उन्होंने कहा कि आत्मा का वास्तविक स्वभाव ज्ञान और वीतरागता है तथा आत्म-तत्व के चिंतन से ही सच्ची प्रगति संभव है।
खेरोदा, 8 अक्टूबर 2026। जैन स्थानक भवन में आयोजित धर्मसभा को संबोधित करते हुए मेवाड़ प्रवर्तक पूज्य कोमल मुनि महाराज ने आत्मोन्नति और आत्मकल्याण के मार्ग पर विचार रखे। मुनि श्री ने कहा कि जैसे अग्नि का मूल स्वभाव उष्णता और बहते पानी का स्वभाव शीतलता है, उसी तरह आत्मा का वास्तविक स्वभाव ज्ञान और वीतरागता है। जब तक मनुष्य सांसारिक प्रपंचों से परे हटकर आत्म-तत्व का चिंतन नहीं करता, तब तक सच्ची प्रगति संभव नहीं है।
मुनि श्री ने कहा कि व्यक्ति को वस्तु-स्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्राप्त कर उस पर गहरा चिंतन करना चाहिए। चित्त की शांति और मानसिक स्वस्थता के लिए निर्भय होकर सही निर्णय लेना आवश्यक है। सुख-दुःख के द्वंद्व से ऊपर उठकर जब आत्मा परपीड़ा हरने और पाप क्षय करने की दिशा में आगे बढ़ती है, तभी पुण्य का बंध और कर्मों की निर्जरा होती है। इन आध्यात्मिक सत्यों को जीवन में उतारने से सच्चा पुरुषार्थ जागृत होता है और साधक हर परिस्थिति में समभाव रखते हुए मोक्ष मार्ग पर दृढ़ता से आगे बढ़ता है।
धर्मसभा में अध्ययनशील, सेवारत्न हर्षित मुनि ने ‘उत्तराध्ययन सूत्र’ का विवेचन प्रस्तुत किया। उन्होंने नमिराजर्षि के जीवन प्रसंग का उल्लेख करते हुए बताया कि देवराज इंद्र द्वारा पूछे गए प्रश्नों के नमिराजर्षि ने जो उत्तर दिए, वे भावपूर्ण और वैराग्य से परिपूर्ण हैं।
हर्षित मुनि ने कहा कि नमिराजर्षि का प्रत्येक उत्तर विरति और संयम के मार्ग पर आगे बढ़ने वाले हर मुमुक्षु जीव के लिए मजबूत आधारशिला के समान है। ये उत्तर सांसारिक मोह का त्याग कर साधना के पथ पर आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं। धर्मसभा में आत्मतत्व, समभाव, संयम और वैराग्य के माध्यम से आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संदेश दिया गया।