मेवाड़ प्रवर्तक बने पूज्य कोमल मुनि, धर्मसभा में अडिग श्रद्धा और कषाय विसर्जन का संदेश
खेरोदा में आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि ने पूज्य कोमल मुनि को प्रवर्तक पद से अलंकृत किया। धर्मसभा में उन्होंने अडिग श्रद्धा, गुरु-समर्पण और आत्मकल्याण के लिए स्थिरता का संदेश दिया।
तस्वीर में श्वेत वस्त्र धारण किए और मुख पर पट्टी लगाए हुए पूज्य कोमल मुनि खेरोदा में नजर आ रहे हैं।
खेरोदा, 25 सितंबर 2026। श्रमण संघ के सरताज आचार्य सम्राट डॉ. शिव मुनि म.सा. ने पूज्य कोमल मुनि म.सा. को उप प्रवर्तक पद से प्रवर्तक पद से अलंकृत किया। गुरुदेव को प्रवर्तक पद प्रदान किए जाने की घोषणा के साथ संपूर्ण मेवाड़ क्षेत्र में हर्ष का माहौल बन गया। यह अवसर मेवाड़ के जैन समाज के लिए गौरवमय पल रहा।
प्रवर्तक पद प्राप्त करने के बाद पूज्य कोमल मुनि ने परम पूज्य आचार्य श्री एवं युवाचार्य श्री जी के चरणों में भावपूर्ण वंदन कर इस गुरुतर दायित्व के लिए कृतज्ञता व्यक्त की। उन्होंने पूर्ण निष्ठा और समर्पण के साथ जिम्मेदारी का निर्वहन करने का संकल्प दोहराया। इस उपलब्धि पर वर्द्धमान जैन श्रावक संघ के अध्यक्ष सुनील कूकड़ा, मंत्री मुकेश डांगी सहित सकल जैन समाज ने गुरुदेव के चरणों में भावभीनी विनयांजलि अर्पित की और इसे पूरे क्षेत्र के लिए ऐतिहासिक बताया।
धर्मसभा को संबोधित करते हुए मेवाड़ प्रवर्तक पूज्य कोमल मुनि ने सच्ची श्रद्धा और समर्पण पर उद्बोधन दिया। उन्होंने कहा कि धर्म, ईश्वर और गुरु के प्रति आस्था गहरी और निष्कपट होनी चाहिए तथा यह भय और लालच से पूरी तरह मुक्त हो। उन्होंने कहा कि आज मानव मन भटकाव के दौर से गुजर रहा है। जब तक जीवन में स्थिरता नहीं होगी, व्यक्ति न घर का रहेगा और न घाट का। आत्मा की सुरक्षा के लिए गुरु और श्रद्धा की रक्षा आवश्यक है।
उन्होंने कहा कि आत्मा का कल्याण उतावलेपन या जल्दबाजी से नहीं, बल्कि स्थिरता, निश्चितता और एकाग्रता से संभव है। श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए उन्होंने कहा कि हमारी दृढ़ता सेठ सुदर्शन जैसी, अडिग श्रद्धा सुलसा श्राविका जैसी और गुरु-समर्पण गौतम स्वामी जैसा होना चाहिए, जो किसी भी परिस्थिति या भय में विचलित न हो। ऐसे समर्पित श्रद्धालुओं का जीवन स्वयं एक जीवंत इतिहास बन जाता है, जिसके आगे लाखों प्रवचन भी गौण सिद्ध होते हैं।
धर्मसभा में उपस्थित अध्ययनशील सेवारत्न हर्षित मुनि ने अनंत चतुर्दशी के पावन पर्व पर विचार व्यक्त करते हुए आंतरिक शुद्धि का संदेश दिया। उन्होंने कहा कि आज के दिन स्थापित प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है, लेकिन आध्यात्मिक दृष्टि से विचार करना चाहिए कि वास्तव में विसर्जन किसका करना है। उन्होंने कहा कि यदि विसर्जन करना ही है तो अपनी आत्मा को मलिन करने वाले कषायों का किया जाए।
हर्षित मुनि ने जीवन से व्यर्थ की विकथा, प्रमाद यानी आलस्य और अत्यधिक बोलने की आदत का विसर्जन कर आत्म-कल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संदेश दिया। प्रवर्तक पद प्राप्ति और धर्मसभा में दिए गए संदेशों के साथ खेरोदा में आयोजित यह अवसर श्रद्धा, गुरु-समर्पण और आत्मशुद्धि के विचारों पर केंद्रित रहा।