गुरु-आज्ञा और आत्म-शोधन से ही संभव है जीवन का कल्याण : उप प्रवर्तक कोमल मुनि म.सा.
खेरोदा में कोमल मुनि म.सा. ने गुरु-आज्ञा, आत्म-शोधन और पर्युषण महापर्व के महत्व पर प्रवचन देते हुए चरित्र निर्माण का संदेश दिया।
तस्वीर में खेरोदा की धर्मसभा में कोमल मुनि श्रद्धालुओं को प्रवचन देते दिख रहे हैं।
खेरोदा कस्बे में मेवाड़ उप प्रवर्तक गुरुदेव कोमल मुनि म.सा. ने धर्मसभा को संबोधित करते हुए कहा कि प्रभु और गुरु के वचनों को जानकर उन्हें तुरंत जीवन में उतार लेना चाहिए, क्योंकि संतों की वाणी सदैव प्राणी मात्र के हित में होती है। उन्होंने कहा कि मनुष्य अक्सर अपनी बात मनवाने के फेर में उलझा रहता है, जबकि वास्तविक आत्म-कल्याण गुरु-आज्ञा को शिरोधार्य करने में ही निहित है।
सच्ची शिक्षा की व्याख्या करते हुए कोमल मुनि श्री ने कहा कि ज्ञान केवल पहचान तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि वह जीवनशैली की त्रुटियों को दूर कर हर दुविधा का धैर्यपूर्वक समाधान निकालने वाला होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विनम्रता के बिना दीक्षा अधूरी है और अहंकारयुक्त दीक्षा मात्र दिखावा बनकर रह जाती है। ज्ञान और शील से युक्त होकर ही दीक्षा सार्थक बनती है।
आगामी पर्युषण महापर्व के मर्म पर प्रकाश डालते हुए कोमल मुनि श्री ने कहा कि पर्युषण का वास्तविक उद्देश्य किसी बाह्य प्रदर्शन के बजाय गंभीर चिंतन, आत्म-शोधन और मन के मैल को धोना है। वर्ष भर में मन, वचन और काया से जो भी पाप या भूलें हुई हैं, उन्हें इस पावन अवसर पर धोकर आत्मा को निर्मल बनाना ही पर्व की सार्थकता है।
उन्होंने कहा कि बाहरी चमक-दमक के स्थान पर भीतर की कमियों, विकारों और आसक्ति को समाप्त करने का संकल्प लेना चाहिए। पाप को पाप और गलत को गलत स्वीकार करने का साहस ही धर्म का मूल है। यदि भीतर तप, संयम और ज्ञान का दीपक प्रज्वलित रहे, तो कोई भी संकट रूपी अंधकार जीवन को विचलित नहीं कर सकता। अतः परनिंदा छोड़कर स्वयं के चरित्र निर्माण में जुटने का आह्वान किया।
सभा में अध्ययनशील, सेवारत्न हर्षित मुनि म.सा. एवं नवदीक्षित अरुण मुनि म.सा. ने प्रेरणा पाथेय देते हुए कहा कि पर्युषण महापर्व स्वयं परमात्मा के आगमन के समान है। इस पावन काल में हमें प्रभु के समक्ष अपने अंतर्मन की फरियाद रखनी चाहिए। उन्होंने कहा कि मनुष्य का सच्चा पुरुषार्थ इसी में है कि वह अपनी कमियों और भूलों को निष्कपट भाव से स्वीकार करे तथा भविष्य में उनमें सुधार लाकर आत्म-उत्थान के मार्ग पर अग्रसर हो।
धर्मसभा में दिए गए संदेश का केंद्र गुरु-आज्ञा, आत्म-शोधन, तप, संयम, ज्ञान और चरित्र निर्माण रहा। पर्युषण महापर्व को बाहरी प्रदर्शन के बजाय आत्मचिंतन और आत्मा को निर्मल बनाने के अवसर के रूप में अपनाने का संदेश दिया गया।