खेरोदा में कोमल मुनि का संदेश, सम्यक् ज्ञान को पुस्तकों से निकालकर आचरण में उतारना जरूरी
खेरोदा के जैन स्थानक भवन में मेवाड़ प्रवर्तक कोमल मुनि म.सा. ने सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, मन पर नियंत्रण, स्वास्थ्य, संयम और परोपकार का महत्व समझाया। जानिए मोक्षमार्ग और जीवन में सच्चे आचरण को लेकर उनके प्रवचन का संदेश।
खेरोदा के जैन स्थानक भवन में प्रवचन देते हुए मेवाड़ प्रवर्तक कोमल मुनि म.सा. और उपस्थित श्रद्धालु।
सम्यक् ज्ञान का वास्तविक महत्व तभी है, जब वह केवल पुस्तकों और सिद्धांतों तक सीमित न रहकर व्यक्ति के जीवन और आचरण में दिखाई दे। यह बात मेवाड़ प्रवर्तक कोमल मुनि म.सा. ने 2 नवंबर 2026 को खेरोदा कस्बे के जैन स्थानक भवन में चल रही प्रवचनों की श्रृंखला के दौरान धर्मसभा को संबोधित करते हुए कही।
मुनिश्री ने कहा कि 'सम्यक्' शब्द देखने में भले ही छोटा हो, लेकिन इसका अर्थ अत्यंत गहरा है। सम्यक् आराधना ही सच्चे सुख का मुख्य आधार है। सम्यक्पने में रमने से ही इतिहास और चरित्र जीवंत बने रहते हैं। उन्होंने जोर देकर कहा कि सम्यक् ज्ञान केवल सैद्धांतिक या पुस्तकीय नहीं होना चाहिए, बल्कि उसे पूरी तरह जीवन के आचरण में उतारना आवश्यक है। जिस प्रकार किसी राज्य या नगर की सुव्यवस्था के लिए राजा का होना जरूरी है, उसी प्रकार जीवन रूपी शासन में 'सम्यक्' का होना भी अनिवार्य है। इसके अभाव में मनुष्य की आध्यात्मिक प्रगति रुक जाती है।
वर्तमान समय की भागदौड़ और मानसिक स्थिति पर विचार रखते हुए कोमल मुनि ने कहा कि आज संसार की गतिविधियों में अत्यधिक तनाव व्याप्त है। इसमें उलझकर जीव अपनी आत्मा को ही भूल बैठा है। ऐसे में वीतरागता ही वास्तविक दिग्दर्शन है। इसके मार्ग पर चलकर संक्षिप्त मानव जीवन को भगवान के समान महान बनाया जा सकता है।
मन की चंचलता पर प्रकाश डालते हुए मुनिश्री ने कहा, "स्थिर नहीं है हमारा मन, बड़ा चंचल है हमारा मन; उस पर करो नियंत्रण, मालिक बनकर बैठा है हमारा मन।" उन्होंने समझाया कि यदि समय रहते मन को नियंत्रित नहीं किया जाए, तो वही मन व्यक्ति को अपना गुलाम बना लेता है।
स्वास्थ्य और साधना के संबंध में मुनिश्री ने कहा कि सेवा और साधना के लिए शरीर का स्वस्थ रहना अत्यंत आवश्यक है। स्वस्थ शरीर के बिना धर्म की धुरी संभालना संभव नहीं है। संयम की साधना और श्रद्धा-चरण के दृढ़ संकल्प से शारीरिक और मानसिक सभी रोग दूर हो जाते हैं।
धर्मसभा में हंस और बगुले का दृष्टांत देते हुए उन्होंने बताया कि जिस प्रकार बगुला कीचड़ में रहता है और हंस हमेशा मोती चुगता है, उसी प्रकार मनुष्य को भी अपना जीवन सार्थक बनाने के लिए हंस की तरह सद्विचारों और पवित्रता का चयन करना चाहिए।
कर्मों के बंधन, चिंतन और सेवा-भाव पर चर्चा करते हुए कोमल मुनि ने कहा कि मनुष्य को दूसरों को दोष देना बंद करना चाहिए, क्योंकि अज्ञानता ही सभी दुखों का मूल कारण है। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि किसी के अंधकारमय जीवन के लिए दीपक बनें और किसी के मुरझाए हुए जीवन के लिए मार्गदर्शक की भूमिका निभाएं। प्रत्येक व्यक्ति को परोपकार की राह अपनानी चाहिए। सद्गति और मोक्ष की प्राप्ति के लिए सम्यक् दर्शन और जिनवाणी का आश्रय आवश्यक है।
हृदय में प्रेम के महत्व को बताते हुए मुनिश्री ने कहा कि सच्चा प्रेम व्यक्ति के सभी व्यावहारिक और आध्यात्मिक कार्यों को पुष्ट करता है। हृदय में सच्चा प्रेम होने पर ही प्रभु के प्रति चिंतन गहरा होता है। यह प्रेम हर प्रकार की व्याधि को दूर करने की सामर्थ्य रखता है।
प्रवचन के अंत में कोमल मुनि ने उपस्थित श्रद्धालुओं से सम्यक् ज्ञान, सम्यक् दर्शन, उच्च चिंतन, आत्मपरक दृष्टि और सेवा-भाव को जीवन में अपनाने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि हृदय में सच्चा प्रेम और समभाव बनाए रखना भी आवश्यक है, ताकि मानव जन्म सार्थक, पावन और मोक्षगामी बन सके।
खेरोदा के जैन स्थानक भवन में आयोजित धर्मसभा में मुनिश्री के प्रवचनों के दौरान श्रद्धालुओं को ज्ञान, संयम, आत्मचिंतन, सेवा और परोपकार को जीवन का आधार बनाने का संदेश दिया गया।