कोटा के श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र नसियां जी में कल्पतरु महामंडल विधान के शुभारंभ अवसर पर प्रवचन देते मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज और मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज।

कोटा के श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र, नसियां जी, दादाबाड़ी में रविवार, 18 अक्टूबर 2026 को निर्यापक श्रमण मुनि श्री 108 योगसागर जी महाराज के पावन सान्निध्य में श्री 1008 कल्पतरु महामंडल विधान का शुभारंभ हुआ। शांतिधारा, भव्य घटयात्रा, ध्वजारोहण और सकलीकरण सहित विभिन्न मांगलिक धार्मिक अनुष्ठानों के साथ शुरू हुए इस विधान में लगभग 151 जोड़ों ने इंद्र-इंद्राणी बनने का सौभाग्य प्राप्त किया। इस अवसर पर मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने धार्मिक विधान को आत्मकल्याण और पुण्यार्जन का माध्यम बताते हुए अशुभ उपयोग से शुभ उपयोग की ओर बढ़ने का संदेश दिया।

विधान के शुभारंभ के साथ ही श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में भक्ति और श्रद्धा का वातावरण बना रहा। श्रद्धालुओं ने उत्साह और भक्तिभाव के साथ धार्मिक क्रियाओं में सहभागिता की तथा जिनेंद्र भगवान की आराधना कर धर्म, संयम और आत्मकल्याण के मार्ग पर आगे बढ़ने का संकल्प लिया।

विधान की मांगलिक क्रियाएं इंदौर के उदासीन आश्रम के प्रतिष्ठाचार्य ब्रह्मचारी सुनील भैया जी के निर्देशन में विधानाचार्य के रूप में संपन्न हुईं। विधान के मुख्य संयोजक श्रीमान धर्मचंद जी एवं श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि इस धार्मिक आयोजन में लगभग 151 जोड़ों ने इंद्र-इंद्राणी के रूप में सहभागिता की।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने कल्पतरु महामंडल विधान के आध्यात्मिक महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि धार्मिक विधान केवल पूजा-अर्चना और बाहरी क्रियाओं तक सीमित नहीं हैं। ये आत्मशुद्धि, संयम, श्रद्धा और धर्म के प्रति समर्पण की प्रेरणा देने वाले अनुष्ठान हैं। इनका उद्देश्य व्यक्ति को अशुभ उपयोग से शुभ उपयोग की ओर अग्रसर करना है।

उन्होंने कहा कि कल्पतरु अथवा कल्पवृक्ष का प्रतीक मनुष्य को अपनी इच्छाओं को धर्ममय बनाने और जीवन में सद्गुणों का विकास करने की प्रेरणा देता है। मनुष्य की वास्तविक उन्नति तभी संभव है, जब उसकी इच्छाएं, विचार और गतिविधियां धर्म के अनुरूप हों। धार्मिक अनुष्ठानों के माध्यम से व्यक्ति अपने भीतर सद्भाव, विवेक और आत्मचिंतन की भावना विकसित कर सकता है।

मुनि श्री ने बताया कि जिनेंद्र भगवान की आराधना, जिनवाणी के प्रति श्रद्धा और धार्मिक क्रियाओं में भावपूर्वक सहभागिता से व्यक्ति अपने जीवन को संस्कारित कर सकता है। विधान की वास्तविक सार्थकता केवल विधि-विधान संपन्न करने में नहीं, बल्कि अंतरंग भावों को निर्मल बनाने में निहित है।

उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रेरित करते हुए कहा कि सच्ची भक्ति वही है, जो जीवन में अहिंसा, संयम, त्याग और आत्मकल्याण की भावना को मजबूत करे। पूजा-अर्चना का प्रभाव व्यक्ति के व्यवहार में दिखाई देना चाहिए। धार्मिक क्रियाओं से जीवन में सदाचार, करुणा, आत्मानुशासन और परोपकार की भावना विकसित होने पर ही धर्माराधना अपने उद्देश्य को सार्थक करती है।

मुनि श्री योगसागर जी महाराज ने विधान में सहभागी सभी इंद्र-इंद्राणियों और श्रद्धालुओं को मंगल आशीर्वाद प्रदान किया तथा धर्ममार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा दी। विधान के शुभारंभ के साथ श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में भक्ति, श्रद्धा और आध्यात्मिक उल्लास का वातावरण बना रहा।

श्री पुण्योदय अतिशय क्षेत्र में आयोजित विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के दौरान श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक पुण्यार्जन किया। प्रशासनिक मंत्री श्रीमती अर्चना जैन सर्राफ ने बताया कि श्रावक श्रेष्ठी सम्मान, चित्र अनावरण, दीप प्रज्वलन एवं शास्त्र भेंट का पुण्यलाभ अखण्ड ज्योति राजेन्द्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार ने प्राप्त किया। कलश स्थापना का पुण्यलाभ भी श्रद्धालु परिवार ने अर्जित किया।

श्री सुमित सेंकी एवं श्री मनोज बगड़ा ने बताया कि शांतिधारा का पुण्यार्जन श्रीमान राजेन्द्र, हुकम काका एवं प्रकाश हरसोरा परिवार; श्रीमान महावीर जी, श्रीमती भारती जी एवं नमन मित्तल परिवार; श्रीमान कमलेश जी, अशोक जी एवं संदीप गोयल परिवार तथा श्रीमती सुशीला बाई, अशोक एवं राजकुमार ठोरा परिवार ने किया।

श्री धर्मचंद धनोप्या ने बताया कि भक्तामर विधान में श्रद्धालुओं ने भक्तिभावपूर्वक सहभागिता कर पुण्यार्जन किया।

श्री सुनील माडिया के अनुसार, मुनि श्री योगसागर जी महाराज के आहारदान का पुण्यलाभ कपूर जी, मंजू जी धनोप्या परिवार को प्राप्त हुआ। वहीं, मुनि श्री प्रणवसागर जी महाराज के आहारदान का सौभाग्य अंतिम बगड़ा को प्राप्त हुआ। मंगलाचरण का पुण्य अवसर किसे मिला, इसका विवरण उपलब्ध जानकारी में स्पष्ट नहीं है।

धर्मसभा के समापन पर श्रद्धालुओं ने आचार्य श्री की पूजन-अर्चना की, अर्घ्य समर्पित किए और जिनवाणी वंदना कर धर्मलाभ अर्जित किया।

कल्पतरु महामंडल विधान के शुभारंभ पर मुनि श्री योगसागर जी महाराज के प्रवचनों में आत्मशुद्धि, संयम, श्रद्धा और समर्पण को विशेष महत्व दिया गया। उन्होंने धर्माराधना को जीवन के विचारों और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन लाने वाली साधना बताते हुए संदेश दिया कि इच्छाओं को धर्ममय बनाकर, अशुभ प्रवृत्तियों का त्याग कर तथा अहिंसा और त्याग को जीवन में अपनाकर ही आत्मकल्याण की दिशा में आगे बढ़ा जा सकता है। उनके अनुसार, धर्माराधना तभी सार्थक है, जब वह विचारों को शुद्ध करे, व्यवहार को संयमित बनाए और जीवन को सद्गुणों से सुशोभित करे।

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