‘मेरी भावना’ को देशभर के शिक्षण संस्थानों में प्रार्थना के रूप में लागू करने की मांग, जैन समाज की पहल
कोटा के राष्ट्र गौरव पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ ने जुगलकिशोर मुख्तार जी युगवीर की रचना ‘मेरी भावना’ को देशभर के शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम में शामिल कर प्रार्थना के रूप में लागू करने की मांग उठाई है। जानिए, इस पहल के पीछे क्या उद्देश्य है।
कोटा के वरिष्ठ पत्रकार और राष्ट्र गौरव पारस जैन 'पार्श्वमणि', जिन्होंने 'मेरी भावना' रचना को देश भर के शिक्षण संस्थानों के पाठ्यक्रम में शामिल करने की मांग उठाई है।
कोटा (राजस्थान)। जैन धर्म दर्शन के प्रख्यात पंडित श्री जुगलकिशोर मुख्तार जी युगवीर द्वारा रचित ‘मेरी भावना’ को राष्ट्रगान की श्रेणी के योग्य बताते हुए इसे संपूर्ण भारतवर्ष की शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम में शामिल करने और प्रार्थना के रूप में बोलने की मांग उठाई गई है। राष्ट्र गौरव पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ पत्रकार, कोटा (राजस्थान) ने इस रचना को विद्यार्थियों तक पहुंचाने और इसके नैतिक तथा मानवीय संदेशों को शिक्षा का हिस्सा बनाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।
वर्तमान में मध्यप्रदेश शिक्षा बोर्ड ने कक्षा सातवीं के हिंदी विषय के पहले अध्याय में ‘मेरी भावना’ को शामिल किया है। इसे संपूर्ण भारत के जैन समाज के लिए गौरव का विषय बताते हुए पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ ने कहा कि इस महान रचना के प्रत्येक शब्द में गहन अर्थ समाहित हैं। उनका मानना है कि यदि प्रत्येक प्राणी प्रतिदिन श्रद्धा, भक्ति और समर्पण के साथ इसका पाठ करे, तो प्रकृति में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होने के साथ उसके जीवन पर भी गहरा प्रभाव पड़ सकता है और नकारात्मक परिस्थितियों में बदलाव की प्रेरणा मिल सकती है।
‘मेरी भावना’ में प्राणीमात्र के कल्याण और ‘सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः’ की मंगलकामना निहित है। पारस जैन के अनुसार, बचपन में दिए गए सद्संस्कार पचपन की दहलीज तक बने रहते हैं। इसलिए इस रचना को केवल पाठ्यक्रम में शामिल करना ही पर्याप्त नहीं है, बल्कि विद्यार्थियों को इसके प्रत्येक शब्द की व्याख्या और उसके महत्व से भी परिचित कराया जाना चाहिए। इससे उनके भीतर जीवन के महत्व को समझने, जीवदया, जीव रक्षा, नैतिकता, सामाजिकता और परोपकार की भावना विकसित करने के साथ सामाजिक बुराइयों से दूर रहने की इच्छाशक्ति जागृत हो सकती है।
उन्होंने प्रकृति की विभिन्न विरासतों का उल्लेख करते हुए कहा कि वन, उपवन, पहाड़, पर्वत, नदी, सागर, वृक्ष, पेड़, पौधे और फूल सभी देने का संदेश देते हैं। मानव को अपनी सोच सकारात्मक रखनी चाहिए, क्योंकि सोच से ही मनुष्य स्वर्ग और नर्क की यात्रा करता है। उनके अनुसार, संसार को सुधारने का प्रयास करने के बजाय स्वयं को सुधारने की आवश्यकता है। यही भगवान महावीर स्वामी का संदेश है—संसार को नहीं, स्वयं को सुधारो और ‘जियो और जीने दो’ के सिद्धांत को अपनाओ।
पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ का कहना है कि ‘मेरी भावना’ की रचना आज के युग में नर से नारायण, कंकर से शंकर, तीरथ से तीर्थंकर और पाषाण से परमात्मा बनने का मार्ग प्रशस्त करती है। उन्होंने कहा कि इस रचना के महत्व को शब्दों में पूरी तरह व्यक्त करना उनके लिए संभव नहीं है। उनकी मंगलकामना है कि ‘मेरी भावना’ प्रत्येक व्यक्ति की मंगलमय भावना बने और इसके संदेश जन-जन तक पहुंचें।
इस उद्देश्य को लेकर पारस जैन ने बताया कि जब वह परम पूज्य आचार्य 108 वर्धमान सागर जी महाराज के पास ससंघ पहुंचे, तो उन्होंने अपनी इस इच्छा से अवगत कराया कि जीवन की अंतिम सांस तक वह ‘मेरी भावना’ को संपूर्ण भारत की शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम में लागू कराने का प्रयास करना चाहते हैं। उन्होंने आचार्य श्री से इसके लिए मंगल आशीर्वाद मांगा।
पारस जैन के अनुसार, इस विषय को सुनकर आचार्य 108 वर्धमान सागर जी महाराज ने प्रसन्नचित्त मुद्रा में उनके सिर पर हाथ रखकर कहा कि ‘मेरी भावना’ राष्ट्रगान होने वाली थी, लेकिन लंबी होने के कारण रह गई। इस दौरान पारस जैन ने अपना आलेख ‘मेरी भावना’ संपूर्ण भारत की शिक्षण संस्थाओं के पाठ्यक्रम में लागू हो, विषय पर प्रकाशित आलेख की 18 पत्र-पत्रिकाओं में हुई विशाल कवरेज भी उन्हें दिखाई। इसके बाद आचार्य श्री ने उन्हें खूब-खूब मंगल आशीर्वाद प्रदान किया।
पारस जैन ने यह भी बताया कि परम पूज्य मुनि श्री सुधा सागर जी महाराज ने भी जिज्ञासा समाधान के अंतर्गत कहा था कि ‘मेरी भावना’ राष्ट्रगान की श्रेणी में आने वाली थी, लेकिन लंबी होने के कारण रह गई। इन कथनों का उल्लेख करते हुए उन्होंने इस रचना को व्यापक स्तर पर विद्यार्थियों तक पहुंचाने की अपनी इच्छा दोहराई।
अपने विचारों के अंत में पारस जैन ‘पार्श्वमणि’ ने ‘मेरी भावना’ की इन पंक्तियों के माध्यम से विश्वमैत्री और करुणा का संदेश दिया—“मैत्री भाव जगत में मेरा सब जीवों से नित्य रहे, दीन दुखी जीवों पर मेरे उर से करुणा स्रोत बहे।” उनका उद्देश्य है कि इस रचना में निहित जीवदया, सद्भाव, परोपकार और आत्मसुधार के संदेश को देशभर की शिक्षण संस्थाओं में स्थान मिले और विद्यार्थी इन मूल्यों को अपने जीवन में अपनाने की प्रेरणा प्राप्त करें।