मुख्यमंत्री के रोड शो से निकाय चुनाव में बढ़ी सियासी हलचल, भाजपा-कांग्रेस आमने-सामने
अजमेर में मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के रोड शो ने निकाय चुनाव की सियासत गरमा दी है। भाजपा की रणनीति, स्थानीय मुद्दों, बागी प्रत्याशियों और कांग्रेस की प्रतिक्रिया के बीच कई सवाल चुनावी माहौल पर असर डाल रहे हैं।
मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा ने कल अजमेर में रोड शो किया। महज एक किलोमीटर के मार्ग पर निकला यह रोड शो करीब 45 मिनट में पूरा हो गया। हालांकि इसे भाजपा कार्यकर्ताओं का जमावड़ा कहा जा सकता है, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इसे वास्तविक अर्थों में रोड शो कहा जाए। मुख्यमंत्री के प्रचार के लिए सड़क पर उतरने से पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और कांग्रेस की बेचैनी भी सामने आई है।
जिस मार्ग से मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा का रोड शो निकला, वह लगभग पूरा बाजार क्षेत्र है और आवासीय इलाका नहीं है। प्लाजा रोड, कवंडसपुरा और मदार गेट पर स्थित दुकानों के अधिकांश मालिक और स्टाफ भी रोड शो वाले वार्डों में नहीं रहते। ऐसे में वहां मौजूद लोगों में बड़ी संख्या ऐसे लोगों की थी, जो संबंधित वार्डों के मतदाता ही नहीं हैं।
आम तौर पर रोड शो शहर के मुख्य मार्गों से होकर गुजरता है और सड़क के दोनों ओर आम लोग यानी मतदाता मौजूद रहते हैं। लेकिन अजमेर में हुए रोड शो में ऐसा नजारा देखने को नहीं मिला। पूरे रास्ते मुख्य रूप से भाजपा कार्यकर्ता और कुछ व्यापारी ही दिखाई दिए। अजमेर शहर में 80 वार्ड हैं। अगर प्रत्येक वार्ड से भाजपा के 100 से 150 कार्यकर्ता भी पहुंचते तो आठ से दस हजार से अधिक लोग इकट्ठे हो सकते थे, लेकिन पूरे रास्ते भी इतने लोग नजर नहीं आए।
इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि रोड शो से सीधे वोट नहीं मिलते, लेकिन चुनावी माहौल जरूर बनता है। मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा भी माहौल बनाने के लिए सभी 10 नगर निगम में रोड शो कर रहे हैं और अजमेर भी इसी अभियान का हिस्सा रहा।
नगर निगम चुनाव स्थानीय स्तर पर सड़क, बिजली, पानी, सीवरेज, पार्किंग जैसे मुद्दों पर लड़े जाते हैं। ऐसे में मुख्यमंत्री के भाषण में राजस्थान के जल समझौतों, बिजली, रोडवेज और डेयरी को घाटे से उबारने, पेपर लीक माफिया और नौकरियों जैसे मुद्दों का जिक्र कितना प्रभावी होगा, यह सवाल बना हुआ है। क्या नगर निगम चुनाव में भाजपा के उम्मीदवार इन मुद्दों पर वोट मांगकर चुनाव जीत सकते हैं?
अजमेर में अभी तक स्थानीय समस्याएं ही चुनावी मुद्दा नहीं बन पाई हैं। मतदाताओं ने भी यह मान लिया है कि अजमेर की समस्याएं किसी की भी सरकार या किसी का भी बोर्ड बन जाए, कम होने की बजाय बढ़ती ही जाएंगी। वहीं उम्मीदवार भी जानते हैं कि चुनाव जीतने के बाद उन्हें अपने काम में लगना है और जनता से पांच साल क्या लेना-देना। इसलिए जातिगत समीकरण साधने और पार्टी विचारधारा के स्थायी वोटों के लिए ही मेहनत की जा रही है।
अजमेर में 35 साल से पहले नगर परिषद और फिर नगर निगम में भाजपा का बोर्ड बन रहा है। 22 साल से यहां भाजपा का विधायक है। इसके बावजूद सवाल है कि क्या शहर की कोई भी सड़क बिना गड्ढे के है? क्या पानी नियमित रूप से आ रहा है? क्या यातायात और पार्किंग व्यवस्था ठीक है? क्या मोहल्लों, कॉलोनियों और शहर की सफाई तथा सीवरेज व्यवस्था से लोग संतुष्ट हैं? शायद इन सभी सवालों का जवाब नहीं ही होगा।
ये सभी स्थानीय स्तर पर निपटने वाली समस्याएं हैं। फिर इतने वर्षों में इनमें सुधार क्यों नहीं हुआ, जबकि इन पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते हैं। मुख्यमंत्री राजस्थान में ट्रिपल इंजन सरकार की बात कर रहे हैं, लेकिन अजमेर में तो ढाई साल से ट्रिपल इंजन की ही सरकार है। इसके बावजूद शहर का कितना उद्धार हुआ, यह सवाल चुनाव के बीच खड़ा है।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि नगर निकाय चुनाव में पहली बार किसी मुख्यमंत्री को सड़क पर उतरने की जरूरत क्यों पड़ी। क्या भारतीय जनता पार्टी को इस बात की आशंका है कि इस बार जनता में उसका विरोध है और स्थानीय समस्याओं के साथ महंगाई, बेरोजगारी, यूजीसी नियम और जेन जी जैसे मुद्दे चुनाव में उसे नुकसान पहुंचा सकते हैं?
इसी वजह से क्या पहली बार दूसरे राज्यों से भी नेताओं को लाकर चुनावी मैदान में तैनात किया गया है? सत्ता से जुड़ी जो बुराइयां होती हैं, वे भाजपा में भी तेजी से घर कर गई हैं। इस बार चुनाव में बड़ी संख्या में भाजपा के बागी प्रत्याशी मैदान में हैं। इसके अलावा उन अधिकृत प्रत्याशियों को भी विरोध का सामना करना पड़ रहा है, जो परिवारवाद और बड़े नेताओं की कृपा तथा चापलूसी से टिकट लेकर आए हैं।
खुद को कैडर बेस पार्टी कहने वाली भाजपा का कार्यकर्ता टिकट बंटने के बाद खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहा है। ऐसे में मुख्यमंत्री ने कार्यकर्ताओं को यह कहते हुए उम्मीद दिलाई कि उनके पास ऐसा पिटारा है, जिसे चुनाव के बाद खोला जाएगा और हर कार्यकर्ता की मेहनत को सम्मान मिलेगा। उन्होंने यह भी कहा कि पार्टी की सब पर नजर है।
दरअसल, नगर निकायों और इसके बाद होने वाले पंचायत चुनाव मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के लिए अग्नि परीक्षा से कम नहीं हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद उनके सामने ये पहले बड़े चुनाव हैं। अगर निकाय चुनाव में भाजपा को अच्छी कामयाबी मिलती है तो इसका श्रेय मुख्यमंत्री को दिया जाएगा। लेकिन अगर थोड़ी सी भी गड़बड़ी हुई तो मुख्यमंत्री खुद को 'पर्ची वाले मुख्यमंत्री' के तमगे से मुक्त नहीं कर पाएंगे।
इसके अलावा सवा दो साल बाद विधानसभा के चुनाव होने हैं। अगर निकाय और पंचायत चुनाव में भाजपा को कामयाबी मिलती है तो उसका असर विधानसभा चुनाव पर भी होगा। विशेष रूप से भाजपा नगर निगमों पर फोकस कर रही है और 10 में से आधिकारिक नगर निगमों पर जीत दर्ज करना चाहती है।
हालांकि मुख्यमंत्री के रोड शो से कांग्रेस की तकलीफ समझ नहीं आती। पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने इसे सरकार की उपलब्धि की बजाय सबसे बड़ी नाकामी का संकेत बताया। गहलोत ने कहा कि ऐसा पहली बार हो रहा है जब मुख्यमंत्री को नगरपालिका, नगर परिषद और नगर निगम के चुनाव में रोड शो करना पड़ रहा है। यह सरकार का प्लस पॉइंट नहीं बल्कि माइनस पॉइंट है, क्योंकि अगर ढाई साल में जनता के काम किए होते तो आज मुख्यमंत्री को रोड शो के जरिए माहौल बनाने की जरूरत नहीं पड़ती।
सवाल यह भी है कि जो काम पहले किसी मुख्यमंत्री ने नहीं किया, वह भजनलाल शर्मा भी नहीं करेंगे, ऐसा कहां लिखा है। पहले कभी कोई पहली बार विधायक बना नेता भी मुख्यमंत्री नहीं बना था, लेकिन भजनलाल शर्मा बने। अब अगर वह रोड शो कर रहे हैं तो उसमें गहलोत को परेशानी क्यों हो रही है।
अजमेर में भी शहर कांग्रेस ने मुख्यमंत्री के रोड शो को फ्लॉप बताया। आरटीसी के पूर्व अध्यक्ष धर्मेंद्र राठौर ने कहा कि भाजपा को हार का डर सता रहा है, इसलिए मुख्यमंत्री को रोड शो करने पड़ रहे हैं।
जीत-हार किसकी होगी, इसका फैसला चुनाव परिणाम करेंगे। लेकिन मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के प्रचार के लिए सड़क पर उतरने से इतना जरूर स्पष्ट हो गया है कि उनके लिए और खुद भाजपा के लिए नगर निकाय चुनाव बेहद महत्वपूर्ण हो गए हैं। पार्टी को हर हाल में इसमें कामयाबी हासिल करनी है, ताकि विधानसभा चुनाव के लिए माहौल बनाया जा सके और भजनलाल शर्मा खुद को भाजपा की राजनीति में और मजबूती से स्थापित कर सकें।