अमेरिकी सांसद राइली मूर वॉशिंगटन में भारत के एफसीआरए संशोधन बिल पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं।

भारतीय संसद के मॉनसून सत्र के दौरान पेश किए गए 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल, 2026' को लेकर राजनीतिक गलियारों में बहस तेज हो गई है। इस नए संशोधन प्रस्ताव पर केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं। अमेरिकी कांग्रेसमैन और सत्ताधारी रिपब्लिकन पार्टी के सदस्य राइली मूर ने इस बिल की तीखी आलोचना करते हुए इसे सीधे तौर पर ईसाइयों पर हमला करार दिया है। उनका यह बयान भारत और अमेरिका के द्विपक्षीय संबंधों में नए कूटनीतिक तनाव का संकेत दे रहा है।

अमेरिकी सांसद राइली मूर ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर एक पोस्ट के जरिए अपनी आपत्ति दर्ज कराई। उन्होंने कहा कि प्रस्तावित बदलाव गैर-सरकारी संगठनों (NGOs), ट्रस्ट, शिक्षण संस्थानों और धार्मिक संगठनों को मिलने वाले विदेशी चंदे से जुड़े हैं, जो अंततः भारत सरकार को चर्चों का नियंत्रण अपने हाथ में लेने की अनुमति दे देंगे। मूर ने भारत में ईसाई धर्म के लंबे इतिहास का जिक्र करते हुए कहा कि यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद सेंट थॉमस द एपोसल मालाबार तट पर आए थे और तब से ईसाई समुदाय भारत में मौजूद है। उन्होंने तर्क दिया कि इतने लंबे ऐतिहासिक और सांस्कृतिक अस्तित्व के बावजूद इस प्रकार के नियमों पर विचार करना चिंताजनक है।

इस पूरे विवाद के केंद्र में विदेशी अंशदान विनियमन अधिनियम, 2010 में किए जाने वाले बदलाव हैं। यह कानून देश में एनजीओ, चैरिटेबल ट्रस्ट, शैक्षणिक संस्थानों और धार्मिक संगठनों द्वारा विदेशी चंदे के अधिग्रहण और उसके उपयोग को विनियमित करता है। मौजूदा व्यवस्था के तहत इन संगठनों को विदेशी फंड प्राप्त करने के लिए गृह मंत्रालय के पास पंजीकरण कराना अनिवार्य होता है, जिसे हर पांच साल पर नवीनीकृत (रिन्यू) कराना पड़ता है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, 15 जुलाई 2026 तक देश में 14,449 एक्टिव एफसीआरए रजिस्ट्रेशन दर्ज थे, जबकि 22,498 रजिस्ट्रेशन रद्द किए जा चुके थे और 15,212 की समय-सीमा समाप्त हो चुकी थी। वर्ष 2019 से 2022 के बीच पंजीकृत संगठनों को कुल 55,741 करोड़ रुपये का भारी-भरकम विदेशी चंदा प्राप्त हुआ था।

इस संशोधन बिल के सबसे प्रमुख और बहस का कारण बने बिंदुओं में केंद्र सरकार द्वारा एक 'डेजिग्नेटेड अथॉरिटी' (अधिकृत संस्था) का गठन किया जाना है। नए प्रावधानों के अनुसार, यदि किसी संगठन का एफसीआरए रजिस्ट्रेशन रद्द हो जाता है, वह स्वेच्छा से सरेंडर कर देता है या समयानुसार रिन्यू नहीं होता है, तो इस प्राधिकारी के पास उस संगठन के विदेशी फंड और उससे निर्मित संपत्तियों का प्रबंधन अपने अधिकार में लेने की पूर्ण शक्ति होगी। इसके अलावा, बिल में नवीनीकरण के लिए विदेशी चंदे के इस्तेमाल की न्यूनतम सीमा भी तय की गई है। इसके तहत जिन संगठनों को पिछले दो वित्तीय वर्षों में 10 लाख रुपये से कम विदेशी चंदा मिला है, वे इसके नवीनीकरण के योग्य नहीं माने जाएंगे। साथ ही, फंड्स को अन्य संगठनों में ट्रांसफर करने पर कड़ी पाबंदियां और सख्त समय-सीमा का प्रावधान किया गया है।

विदेशी फंडिंग पर नियंत्रण बढ़ाने वाले इन प्रस्तावों के सामने आने के बाद से ही विभिन्न एनजीओ, सिविल सोसाइटी ग्रुप और धार्मिक संगठनों ने गहरी चिंता व्यक्त की है। चर्चों और धार्मिक संस्थाओं का मुख्य तर्क है कि दशकों की मेहनत से विदेशी चंदे के माध्यम से स्थापित किए गए स्कूल, अस्पताल और कल्याणकारी संस्थान यदि प्रशासनिक जटिलताओं के कारण प्रभावित होते हैं, तो उनका नियंत्रण सरकार के हाथ में चला जाएगा। अमेरिकी सांसद राइली मूर की इन टिप्पणियों और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उठ रहे सवालों ने इस विधाई प्रक्रिया को एक संवेदनशील कूटनीतिक मोड़ पर ला खड़ा किया है, जिस पर सबकी नजरें टिकी हुई हैं।