क्या प्याज ने बचाया था पोखरण परमाणु परीक्षण? जानिए 1998 के इस चर्चित दावे की पूरी सच्चाई|
1998 के पोखरण परीक्षण से प्याज के संबंध को लेकर कई दावे सामने आए, लेकिन प्याज को रेडिएशन से बचाने के लिए इस्तेमाल किए जाने का कोई आधिकारिक सैन्य रिकॉर्ड नहीं है।
1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों को छिपाने में प्याज के इस्तेमाल के दावों को दर्शाती एक यथार्थवादी छवि।
देश में समय-समय पर प्याज की कीमतों में उछाल और उसकी किल्लत को लेकर कई तरह की दिलचस्प चर्चाएं सामने आती रही हैं। ऐसा ही एक चर्चित किस्सा 1998 के पोखरण परमाणु परीक्षणों से जुड़ा हुआ है। देशवासियों के जेहन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या प्याज और आलू जैसी आम सब्जियां परमाणु परीक्षणों से कोई सीधा संबंध रखती हैं। भारत ने 11 और 13 मई 1998 को सुबह के समय 'ऑपरेशन शक्ति' के तहत पोखरण में अपने दूसरे परमाणु परीक्षण को सफलतापर्वक अंजाम दिया था। इस दौरान जमीन के भीतर एक के बाद एक कुल पांच शक्तिशाली धमाके किए गए थे। इससे पहले पोखरण की धरती पर पहला परमाणु परीक्षण 18 मई 1974 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के कार्यकाल के दौरान किया गया था, जबकि 1998 के इन ऐतिहासिक परीक्षणों के समय देश की कमान प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के हाथों में थी।
इन परीक्षणों के दौरान राजस्थान के जैसलमेर के पोखरण इलाके में सुरक्षा और गोपनीयता का स्तर इस हद तक अत्यधिक कड़ा रखा गया था कि राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत तक को इसकी भनक नहीं लगने दी गई थी। इतिहास के पन्नों और विभिन्न मीडिया रिपोर्ट्स में इस बात का जिक्र मिलता है कि उस दौरान मुख्यमंत्री शेखावत को अपने पार्टी नेताओं और स्थानीय जनप्रतिनिधियों से लगातार इस बात की शिकायतें मिल रही थीं कि पश्चिमी राजस्थान के कई जिलों में अचानक से आलू और प्याज की भारी किल्लत पैदा हो गई है, जबकि उन इलाकों में उस सीजन में फसलों की पैदावार बहुत अच्छी हुई थी। जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर, पाली और जालौर जैसे प्रमुख जिलों में बंपर पैदावार होने के बावजूद बाजार से ये जरूरी सब्जियां रहस्यमय तरीके से गायब हो चुकी थीं।
बाद में जब परमाणु परीक्षण सफलतापूर्वक संपन्न हो गए और उससे जुड़े कई राज खुले, तब जाकर लोगों ने इन सब्जियों की कमी के पीछे के संभावित कारणों को जोड़ना शुरू किया। मीडिया रिपोर्ट्स में यह दावा किया जाता रहा है कि उन दिनों भारी मात्रा में आलू और हालांकि इस बात का कोई पुख्ता और आधिकारिक दस्तावेज या सरकारी बयान कभी सामने नहीं आया, लेकिन यह जनचर्चा का एक बड़ा विषय जरूर बन गया। रिपोर्ट्स के मुताबिक, परीक्षण स्थल पर लगभग 1,000 टन आलू और उतनी ही मात्रा में प्याज को जमीन के नीचे दबाए जाने की बातें कही जाती हैं। यह भी कहा गया कि रक्षा अनुसंधान एवं विज्ञान संगठन यानी डीआरडीओ (DRDO) के वैज्ञानिकों की सलाह पर ऐसा किया गया था, क्योंकि यह माना जाता था कि आलू और प्याज परमाणु विकिरण यानी रेडिएशन के असर को कम करने में मददगार हो सकते हैं।
इस संबंध में एक बड़ा दावा यह किया जाता है कि परमाणु धमाके के वक्त भारी मात्रा में अल्फा, बीटा और गामा किरणें निकलती हैं। ऐसी लोक चर्चाएं रही हैं कि प्याज के अंदर इन हानिकारक विकिरणों को सोखने की प्राकृतिक क्षमता होती है, इसी वजह से न्यूक्लियर टेस्टिंग साइट पर बड़े पैमाने पर प्याज का इस्तेमाल किया गया। कुछ वैज्ञानिक अध्ययनों और रिपोर्ट्स का हवाला देकर यह भी कहा जाता है कि प्याज के अर्क या उसके तत्वों से रेडिएशन के संपर्क में आने वाली कोशिकाओं के जीवित रहने की क्षमता को बेहतर किया जा सकता है। प्याज में फ्लेवोनोइड्स और फेनोलिक एसिड जैसे तत्व प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं, जिसके कारण इसमें प्राकृतिक रूप से एंटीऑक्सीडेंट और एंटी-जेनोटॉक्सिक गुण होते हैं। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) जैसी संस्थाओं द्वारा विकिरण और कोल्ड स्टोरेज के संयोजन का अध्ययन करके प्याज की शेल्फ-लाइफ बढ़ाने यानी उसे लंबे समय तक सुरक्षित रखने की तकनीक पर काम जरूर किया गया है, जो वैज्ञानिक अनुसंधान का एक हिस्सा है।
केवल प्याज ही नहीं, बल्कि परमाणु परीक्षणों में आलू की भूमिका को लेकर भी तमाम दावे किए जाते रहे हैं। अमेरिका की टेनेसी यूनिवर्सिटी के प्लांट साइंस रिसर्चर्स ने अपनी एक खोज में यह पाया था कि आलू गामा रेडिएशन को बहुत अच्छी तरह से अवशोषित यानी सोख सकते हैं। इसी आधार पर यह कयास लगाए गए कि इनका इस्तेमाल ऐसे पौधे-आधारित सेंसर विकसित करने में किया जा सकता है जो आम लोगों और समुदायों को खतरनाक रेडिएशन से बचाने में मददगार साबित हो सकें। इसके अलावा यह भी किस्से सुने जाते हैं कि परीक्षण के दौरान आलू की परतों ने रेतीली मिट्टी के बीच बम को स्थिर रखने में सहायता की होगी, जबकि प्याज ने धमाकों पर अपनी प्रतिक्रिया दी होगी। हालांकि, इन सभी दावों की जब ज़मीनी और वैज्ञानिक हकीकत टटोली जाती है, तो तस्वीर पूरी तरह स्पष्ट हो जाती है।
वास्तविक स्थिति यह है कि वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं और रेडियोबायोलॉजी के क्षेत्र में गामा किरणों से होने वाले साइटोलॉजिकल और जेनेटिक नुकसान का गहराई से अध्ययन करने के लिए प्याज और उसकी जड़ों के सिरों (रूट टिप्स) का बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया जाता है। ऐसा इसलिए किया जाता है क्योंकि प्याज की कोशिकाओं में क्रोमोसोम के भीतर होने वाले बदलाव और गड़बड़ियां बहुत साफ तौर पर दिखाई दे जाती हैं। लेकिन इसका मतलब यह बिल्कुल नहीं है कि किसी असली परमाणु बम विस्फोट के वक्त प्याज को रेडिएशन से बचाने वाली ढाल या उसे सोखने वाले उपकरण के तौर पर आधिकारिक रूप से जमीन में दबाया गया था। इस बात का कोई भी ठोस वैज्ञानिक आधार या प्रमाणित सैन्य दस्तावेज मौजूद नहीं है। भाभा एटॉमिक रिसर्च सेंटर (BARC) में प्याज को लेकर अन्य तकनीकी और कृषि संबंधी रिसर्च जरूर होती हैं, लेकिन परमाणु धमाकों में इसके इस्तेमाल के दावे केवल कयासों और मीडिया रिपोर्ट्स तक ही सीमित हैं।
जब 1998 में पोखरण के ये सफल परमाणु परीक्षण पूरे हो गए, तो उसके अगले ही दिन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी, रक्षा मंत्री जॉर्ज फर्नांडीस और मुख्यमंत्री भैरों सिंह शेखावत खुद पोखरण पहुंचे और उन्होंने परीक्षण स्थल का बारीकी से निरीक्षण किया था। इन परीक्षणों के बाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत को कई तरह की प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ा था, और अमेरिका ने भारत पर कड़े आर्थिक प्रतिबंध भी लगा दिए थे। इसके बावजूद प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी अपने देश की सुरक्षा और संप्रभुता के रुख पर पूरी तरह अडिग रहे और किसी भी दबाव के आगे विचलित नहीं हुए। इस प्रकार, प्याज और परमाणु परीक्षणों का कनेक्शन भले ही लोकप्रिय कथाओं और किस्सों में बहुत ज्यादा चर्चित रहा हो, लेकिन तकनीकी और आधिकारिक तौर पर यह केवल वैज्ञानिक प्रयोगशालाओं के अध्ययनों और जनचर्चाओं का ही एक हिस्सा बनकर रह गया है।