पूर्वी दिल्ली में विजयादशमी पर PM मोदी ने रावण दहन से पहले भगवान राम की पूजा की और देशवासियों को संबोधित किया।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पूर्वी दिल्ली के आईपी एक्सटेंशन स्थित डीडीए उत्सव ग्राउंड में आयोजित दशहरा समारोह में भाग लिया। इस अवसर पर उन्होंने रावण दहन किया और समस्त देशवासियों को विजयादशमी की हार्दिक शुभकामनाएं दीं। अपने संबोधन के दौरान प्रधानमंत्री ने राष्ट्र के सम्मान, भारतीय संस्कृति की गरिमा तथा 'राष्ट्र प्रथम' के संकल्प पर विशेष बल दिया।

दशहरा समारोह में रावण दहन के मुख्य कार्यक्रम से पूर्व प्रधानमंत्री मोदी ने विधिवत पूजन-अर्चन किया। उन्होंने भगवान श्रीराम, माता जानकी और भगवान बजरंगबली के श्रीचरणों में नमन करते हुए देशवासियों के कल्याण एवं समृद्धि की कामना की। उन्होंने कहा कि विजयादशमी का यह पावन पर्व हमें यह महत्वपूर्ण सीख और साहस प्रदान करता है कि शत्रु चाहे कितना भी विशाल या शक्तिशाली क्यों न हो, यदि हम सत्य और मानवता के पक्ष में खड़े हैं, तो अंततः विजय हमारी ही होती है।

प्रधानमंत्री ने देश की आंतरिक और बाहरी चुनौतियों की ओर ध्यान आकर्षित करते हुए स्पष्ट कहा कि देश के सम्मान को चोट पहुंचाने वाले, देश को विखंडित करने की चेष्टा करने वाले तथा हमारी समृद्ध संस्कृति से नफरत करने वाले लोग देश के वास्तविक दुश्मन हैं। उन्होंने कहा कि भारतवासियों को मां भारती के महत्व और उसके गौरव को पहचानकर ऐसे दुश्मनों को परास्त करना होगा। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने सभी नागरिकों से मतभेदों को भुलाकर 'राष्ट्र प्रथम' का संकल्प लेने और पूरी एकजुटता के साथ आगे आने का आह्वान किया।

सांस्कृतिक उपलब्धियों की चर्चा करते हुए प्रधानमंत्री ने उल्लेख किया कि भारत आज अपनी सांस्कृतिक धरोहरों और पहचान को पूरे विश्व मंच पर मजबूती से स्थापित कर रहा है। उन्होंने बताया कि पिछले साल दीपावली को भी यूनेस्को द्वारा 'मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत' की सूची में शामिल किया गया। प्रधानमंत्री ने इस वैश्विक उपलब्धि को देश के करोड़ों भारतीयों की सुदृढ़ इच्छाशक्ति और अपनी जड़ों के प्रति अगाध निष्ठा का परिणाम करार दिया।

अपने संबोधन में देश के वर्तमान वातावरण का उल्लेख करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि आज भारत का हर कोना, हर गांव और हर शहर प्रभु श्रीराम की भक्ति भावना से ओत-प्रोत है। पूरे देश में जगह-जगह रामलीलाओं का मंचन किया जा रहा है और पूरा राष्ट्र राममय माहौल में डूबा हुआ है। उन्होंने कहा कि देशभर में आयोजित होने वाली ये रामलीलाएं भगवान श्रीराम के महान विचारों, जीवन मूल्यों और आदर्शों को जीवित रखने की एक अटूट परंपरा हैं। प्रधानमंत्री के अनुसार, विजयादशमी का पर्व अत्याचार, अन्याय और आतंक के अंत का प्रतीक है तथा यह असत्य पर शाश्वत सत्य की विजय में जनता के अटूट विश्वास का प्रत्यक्ष प्रमाण है।

रामराज्य की अवधारणा को रेखांकित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि रामराज्य का वास्तविक अर्थ एक ऐसी शासन व्यवस्था से है, जहां किसी भी नागरिक के साथ कोई भेदभाव न हो, सभी को न्याय सुलभ हो और समाज में हर व्यक्ति को समान अवसर तथा सम्मान प्राप्त हो। उन्होंने कहा कि सत्ता का मूल उद्देश्य केवल शासन चलाना या अधिकार जताना नहीं है, बल्कि जनकल्याण करना ही इसका सर्वोच्च ध्येय होना चाहिए। उन्होंने 'नागरिक देवो भव' के मंत्र पर चलने का संदेश देते हुए कहा कि जनता को जनार्दन मानकर ही तंत्र को सेवा भाव से कार्य करना चाहिए। उन्होंने प्रभु श्रीराम के जीवन आदर्शों को भारतीय संस्कृति, समाज और नैतिक जीवन मूल्यों का सबसे मजबूत आधार बताया।

प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की भूमि, इसकी समृद्ध संस्कृति और हमारे पूर्वजों ने हजारों वर्षों से प्रभु श्रीराम की उपासना की है। यह अटूट आस्था केवल इसलिए नहीं है कि श्रीराम ने राक्षस राज रावण का संहार किया था, बल्कि इसलिए भी है क्योंकि उन्होंने अपने जीवन आचरण से मानवता को ऐसे अतुलनीय आदर्श दिए हैं जो युगों-युगों तक प्रासंगिक रहेंगे।

प्रभु श्रीराम के जीवन चरित्र का उदाहरण देते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि तमाम कठिनाइयों और विपत्तियों के बावजूद श्रीराम ने कभी भी सत्य का मार्ग नहीं छोड़ा। जब उन्हें राज्याभिषेक का समाचार मिला तो उनके चेहरे पर कोई अति-उत्साह नहीं था और न ही १४ वर्ष के कठोर वनवास की घोषणा पर उनके मन में कोई दुख या ग्लानि थी। उन्होंने हर विषम परिस्थिति में धर्म, मर्यादा और कर्तव्य का निष्ठापूर्वक पालन किया। अपने वनवास काल के दौरान उन्होंने सामाजिक समानता का संदेश देते हुए निषादराज को सहर्ष गले लगाया और माता शबरी के आश्रम पहुंचकर उन्हें पूर्ण सम्मान दिया। प्रधानमंत्री के अनुसार, भगवान राम ने अपने आचरण से दया, करुणा, निस्वार्थ प्रेम और सामाजिक सौहार्द के ऐसे मानदंड स्थापित किए जो संपूर्ण मानव जाति के लिए मार्गदर्शक हैं।

जीवन संघर्षों और सामूहिक प्रयास के संदेश पर प्रकाश डालते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि प्रभु श्रीराम का जीवन हमें सिखाता है कि मार्ग में आने वाली कोई भी कठिनाई या बाधा हमारे कदमों को रोक नहीं सकती। जब श्रीराम के समक्ष विशाल समुद्र था और लक्ष्य असंभव प्रतीत हो रहा था, तब भी उन्होंने समाज के हर वर्ग को साथ जोड़कर उस असंभव लक्ष्य को संभव बनाकर दिखाया। प्रधानमंत्री ने कहा कि अपने उपलब्ध संसाधनों पर पूर्ण विश्वास रखना और लक्ष्य के प्रति समर्पित रहना ही सफलता का असली मंत्र है। उन्होंने कहा कि वनवास से अयोध्या लौटने के उपरांत भगवान श्रीराम ने जिस शासन की स्थापना की, उसे आज भी सुशासन का सर्वोच्च मानक माना जाता है।

अपने संबोधन के अंतिम चरण में प्रधानमंत्री ने दोहराया कि विजयादशमी का संदेश हमें राष्ट्र प्रथम के संकल्प से जोड़ता है। उन्होंने सभी देशवासियों से सत्य, साहस, मानवता और भारतीय संस्कृति के महान आदर्शों को अपने दैनिक जीवन में अपनाने की अपील की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने संबोधन का समापन 'जय सिया राम' और 'भारत माता की जय' के उद्घोष के साथ किया।