एक पर्व, अनेक रूप: कहीं रावण दहन, तो कहीं देव-मिलन और सिंदूर खेला, जानिए कैसे हर राज्य में बदल जाता है दशहरे का अंदाज़|
देशभर में विजयादशमी का पर्व अलग-अलग परंपराओं के साथ मनाया जाता है, जिसमें दिल्ली के रावण दहन से लेकर मैसूर और कुल्लू के अनूठे उत्सव शामिल हैं।
देशभर में मनाए जाने वाले विजयादशमी पर्व के दौरान कुल्लू, दिल्ली, मैसूर, पश्चिम बंगाल और बस्तर की सांस्कृतिक झलकियां।
विजयादशमी यानी दशहरे का त्योहार पूरे भारत में बड़े ही उत्साह और हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। यह पावन पर्व अधर्म पर धर्म और बुराई पर अच्छाई की विजय का प्रतीक माना जाता है। पौराणिक कथाओं के अनुसार, इसी दिन भगवान श्रीराम ने रावण का वध कर उसके अहंकार को समाप्त किया था, और इसी दिन मां दुर्गा ने महिषासुर नामक राक्षस का संहार कर संसार को उसके पापों से मुक्ति दिलाई थी।
यही वजह है कि देश के अलग-अलग राज्यों और क्षेत्रों में दशहरे को मनाने के तौर-तरीके और परंपराएं एक-दूसरे से काफी अलग और खास हैं। कहीं रावण के पुतले का दहन होता है, तो कहीं मां दुर्गा को अंतिम विदाई दी जाती है; वहीं कुछ स्थानों पर देवी-देवताओं का अनोखा मिलन देखने को मिलता है।
दिल्ली: विशाल रामलीला और भव्य रावण दहन
उत्तर भारत और विशेषकर देश की राजधानी दिल्ली में नवरात्रि के दिनों से ही जगह-जगह रामलीला का मंचन शुरू हो जाता है। विजयादशमी की शाम को लाल किला परिसर, रामलीला मैदान तथा शहर के अन्य प्रमुख स्थानों पर रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के विशाल पुतलों का दहन किया जाता है। इस दृश्य को देखने और लगे मेलों का आनंद लेने के लिए हज़ारों की संख्या में लोग परिवार सहित एकत्र होते हैं।
कुल्लू (हिमाचल प्रदेश): सात दिवसीय अनोखा उत्सव और देव-मिलन
हिमाचल प्रदेश के कुल्लू में दशहरे का आयोजन देश के बाकी हिस्सों से बिल्कुल अलग होता है। जब पूरे देश में दशहरा समाप्त हो रहा होता है, तब कुल्लू में इसकी शुरुआत होती है। विजयादशमी से शुरू होने वाला यह भव्य उत्सव पूरे सात दिनों तक चलता है। यहाँ ढालपुर मैदान में भगवान रघुनाथ जी की विशाल रथयात्रा निकाली जाती है। आसपास के विभिन्न गांवों से देवी-देवताओं की सजी-धजी पालकियां यहाँ पहुंचती हैं। कुल्लू में रावण का पुतला नहीं जलाया जाता, बल्कि यहाँ मुख्य रूप से देवी-देवताओं के मिलन का पवित्र पर्व मनाया जाता है।
मैसूर (कर्नाटक): शाही पैलेस की जगमगाहट और 'जंबू सवारी'
कर्नाटक के मैसूरु का दशहरा अपनी शाही शानो-शौकत और अनूठी भव्यता के लिए पूरी दुनिया में प्रसिद्ध है। यहाँ का उत्सव मां चामुंडेश्वरी द्वारा महिषासुर पर पाई गई विजय की खुशी में आयोजित किया जाता है। लगातार दस दिनों तक ऐतिहासिक मैसूरु पैलेस को ख़ास रोशनी से सजाया जाता है, जिसे देखने दूर-दूर से पर्यटक आते हैं। विजयादशमी के दिन प्रसिद्ध 'जंबू सवारी' निकाली जाती है, जिसमें मां चामुंडेश्वरी की प्रतिमा को एक भव्य रूप से सजाए गए हाथी पर विराजमान करके शोभायात्रा निकाली जाती है।
पश्चिम बंगाल: 'सिंदूर खेला' और मां दुर्गा की विदाई
पूर्वी भारत, विशेष रूप से पश्चिम बंगाल में विजयादशमी का दिन मां दुर्गा की विदाई के रूप में मनाया जाता है। इस दिन विभिन्न पूजा पंडालों में 'सिंदूर खेला' की पारंपरिक रीति निभाई जाती है। इसमें सुहागिन महिलाएं मां दुर्गा को सिंदूर अर्पित करती हैं और फिर एक-दूसरे को सिंदूर लगाकर सुख, शांति और समृद्धि की प्रार्थना करती हैं। इसके बाद गाजे-बाजे के साथ मां दुर्गा की प्रतिमाओं का विसर्जन किया जाता है।
बस्तर (छत्तीसगढ़): 75 दिनों तक चलने वाली जनजातीय परंपरा
छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र में मनाया जाने वाला दशहरा अपनी अनूठी जनजातीय संस्कृतियों और परंपराओं के कारण सबसे अलग पहचान रखता है। यह उत्सव पूरे 75 दिनों तक चलता है। बस्तर के दशहरे का संबंध रावण वध से न होकर, स्थानीय आराध्य मां दंतेश्वरी के प्रति अगाध श्रद्धा और आस्था से जुड़ा हुआ है।